मोदी की हैट्रिक में छिपा सच

Last Updated: Thursday, December 20, 2012 - 17:37

संजीव कुमार दुबे
दबंग फिल्म का एक गाना जो सलमान खान पर फिल्माया गाया था। ...मन बलवान,लागे चट्टान रहे मैदान में आगे हुड़ दबंग,दबंग,दंबग,दबंग...। मोदी बलवान हैं। मोदी की पार्टी बलवान हैं। मोदी का हौसला चट्टान के समान है। वह सियासी मैदान में ऐसे दबंग है जो सिर्फ जीतने में यकीन रखते हैं। गीतकार गुलजार का लिखा यह गीत मोदी पर बखूबी फिट बैठता है। गुजरात चुनाव और नरेंद्र मोदी। लगता है कई सालों से इनके बीच गहरा तालमेल हो गया है तभी मोदी सिर्फ जीतना जानते हैं, हार उन्हें बर्दाश्त नहीं है।
गुजरात में मोदी फिर जीते और लगातार तीसरी बार जीत हासिल कर हैट्रिक लगा ली। मोदी की जीत पर संदेह नहीं था लेकिन रिकॉर्ड मतदान के बाद एक तबका ऐसा भी था जो कह रहा था कि मोदी हार जाएंगे। लेकिन मोदी जीत के पर्यायवाची बन चुके हैं और उन्हें मालूम है कि चुनाव कैसे लड़ा जाता है और जीत कैसे हासिल की जाती है। मोदी ने यह बखूबी साबित कर दिखाया है और उम्मीदों पर खरे उतरे हैं।
2012 गुजरात विधानसभा चुनाव का परिणाम मोदी की बुलंदियों और उनके सियासी दावपेंच की गाथा कहता है। गुजरात का चुनाव इस बार सिर्फ एक राज्य या गुजरात का ही नहीं था बल्कि देश का हो गया था तभी कांग्रेस इस बार गुजरात के चुनाव पर हमेशा से बैकफुट पर रही और उसके कोई भी नेता ऐसे नहीं रहे जो मोदी का चुनावी मैदान में मुकाबला कर पाते।
मोदी की जीत के यूं तो कई मायने हैं लेकिन चुनावी जीत में विकास के मुद्दे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। मोदी ने अपने शासनकाल में विकास के मुद्दे को हमेशा इस प्रकार हाईलाइट किया जैसे यह लगता था कि अगर देश के किसी राज्य में विकास हो रहा है तो वह सिर्फ और सिर्फ गुजरात है। हालांकि यह बात भी दरकिनार नहीं किया जा सकता कि गुजरात में भी ऐसे कई क्षेत्र है जहां विकास करना अभी बाकी है। मोदी विकास के मुद्दे को हवा देना ही नहीं जानते बल्कि वह विकास के मुद्दे को भुनाने में भी कामयाब रहे और यही वजह है कि विकास का मुद्दा और विकास कार्य ने मोदी को तीसरी बार सत्ता से नवाजा।
किसी भी चीज में टारगेट आडियेंस बड़ा ही अहम होता है। मोदी की यह खासियत है कि उनकी रणनीति और सियासी दावपेंच उन्हें शीर्ष राजनेता की कतार में ला खड़ा करता है। मोदी मिडल अर्बन क्लास को टारगेट करते हैं। मोदी को इस बार मिली जीत में भी उन क्षेत्रों या फिर उन सीटों का योगदान रहा है जहां अर्बन क्लास की बहुतायत है। हालांकि ग्रामीण इलाकों से मोदी का जनाधार खिसका जरूर है लेकिन इतना भी नहीं कि वह उन्हें हार में तब्दील कर दे। लिहाजा मोदी ने यहां भी बाजी मारी। आम आदमी,अर्बन आदमी पर मोदी की चोट ऐसे पड़ी जैसे वह सौ सुनार की और एक लुहार की कहावत पर बखूबी चरितार्थ होती नजर आई।
कांग्रेस ने इस चुनाव में मोदी से हार का स्वाद चखा लेकिन यह तो होना ही था। कांग्रेस के पास ऐसा कुछ था ही नहीं जिसके बलबूते पर वह चुनाव में बीजेपी को मात देने का माद्दा रखती। 2012 गुजरात विधानसभा के चुनाव में कई बार तो ऐसा लगा कि यह चुनाव महज औपचारिक रह गया है क्योंकि उसकी चुनावी प्रचार की रणनीति बीजेपी के सामने ताबड़तोबड़ खिसकती नजर आई और नतीजा सामने है।
मोदी बनाम कांग्रेस में मोदी के सामने कांग्रेस का ऐसा कोई नेता नहीं था जो सही मायने में चुनावी कमान संभाल सकें। अर्जुन मोढवाडिया की कोशिश रंग नहीं लाई और वह बुरी तरह नाकाम रहे। यानी कमजोर और बिखरी हुई कांग्रेस भी एक बड़ी वजह रही जो मोदी की जीत में सहायक साबित होती नजर आई। अगर प्रतिद्वंदी कमजोर होता है तो उसका फायदा अगले पक्ष को मिलता है। और यही हुआ। कांग्रेस के दिग्गज नेता नरहरी अमीन चुनाव से ठीक पहले बीजेपी में शामिल हो गए,यह कांग्रेस में फूट पड़ने और उसके कमजोर होने का ही नतीजा था जिसका मोदी ने जबरदस्त फायदा उठाया।

मोदी और प्रधानमंत्री। गुजरात चुनाव से पहले इस चर्चा ने खूब जोर पकड़ा कि नरेंद्र मोदी बीजेपी में प्रधानमंत्री पद की दावेदारी बखूबी रखते हैं। कभी राम जेठमलानी तो कभी सुषमा स्वराज उनकी पीएम पद की दावेदारी की तरफदारी करते रहे,उनके गुण गाते रहे। बीजेपी खेमे से इतर भी यह चर्चा खूब रही कि मोदी पीएम पद की दावेदारी की भरपूर काबिलियत रखते हैं। कहीं समर्थन के सुर दिखे तो कहीं विरोध भी हुआ। लेकिन ऐसा लगता है कि मोदी को इसका लाभ मिल ही गया। इस चर्चा या फिर इन बातों को चुनावी मैदान में भी लाभ मिला और पीएम पद की दावेदारी का मुद्दा उनके लिए वोट में परिवर्तित होता नजर आया। गुजरात के लोगों को यह नजर आया कि मोदी सही मायने में पीएम पद की दावेदारी रखते हैं। लिहाजा यह मुद्दा भी उन्हें सत्ता पर काबिज कर पाने में सहायक रहा।





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