जिंदगी लीलती खूनी सड़कें

By Sanjeev Kumar Dubey | Last Updated: Wednesday, June 4, 2014 - 20:49
 
Sanjeev Kumar Dubey  

चंद महीने पहले चेतावनी भरा एक बोर्ड दिल्ली की दौड़ती-भागती सड़कों पर दिखा, जिसपर लिखा था - स्पीड थ्रिल्स बट किल्स। यह बात सभी जानते हैं कि किसी भी वाहन की तेज रफ्तार मौत की तरफ ले जाती है। लेकिन राजधानी दिल्ली में जब यह वाकया किसी बड़े सियासतदान के साथ हो तो सवाल उठने लगते है। इस मसले पर चर्चा शुरू हो जाती है। छानबीन की लंबी कवायद की जाती है। बीजेपी नेता गोपीनाथ मुंडे की मौत सड़क दुर्घटना में जिन हालातों में हुई उनपर कई सवाल उठ रहे हैं। एक बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि जब सड़क पर इतने बड़े नेता की जिंदगी महफूज नहीं है तो फिर भला आम आदमी की क्या बिसात है।

हमारे देश में हर साल आइसलैंड या मालदीव जैसे देशों की कुल आबादी की आधी के बराबर जनसंख्या सड़क हादसों की बलि चढ़ जाती है। एक आंकड़ा यह भी कहता है कि लंदन के मुकाबले भारत की सड़कों पर सड़क हादसे चार गुना ज्यादा होते हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आकड़ों के मुताबिक 2012 के बाद से देश में हर रोज सड़क हादसों में 461 लोगों की मौत हुई है तथा 1,301 व्यक्ति घायल हुए हैं। यानी इसका मतलब यह हुआ कि देश में सड़क हादसों के कारण हर घंटे 19 या हर तीन मिनट पर एक व्यक्ति की मौत होती है। आंकड़ों के मुताबिक सड़क हादसों के कारण पिछले 10 वर्षो में देश में 12 लाख मासूमों को जान गंवानी पड़ी है। एक भयावह सच यह भी है कि सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के ताजा आंकडों के मुताबिक, हर साल करीब एक लाख 37 हजार से ज्यादा लोग सड़क दुर्घटनाओं के शिकार होते हैं। यानी देश भर में रोजाना 477 लोग सड़क हादसों में जान खो रहे हैं।

इस सिलसिले में सड़क सुरक्षा पर जानेमाने अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञ और पंजाब सड़क सुरक्षा परिषद के उपाध्यक्ष कामाजीत सोई ने संयोग से कुछ ही दिन पहले केंद्रीय यातायात मंत्री नितिन गडकरी को चिट्ठी लिखकर इन सड़क हादसों पर लगाम लगाने के लिए पहल करने का अनुरोध किया था। सोई इन दुर्घटनाओं को 'जनसंहार' की संज्ञा देते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ के मुताबिक भारत को दुनिया में सर्वाधिक सड़क हादसों वाला देश माना जाता है। चीन में हर साल जहां 97,551 मौतें सड़क हादसों में होती हैं, वहीं अमेरिका 41,292 और रूस 37,349 मौतों के साथ भारत से कहीं पीछे है, जबकि इन देशों में भारत की अपेक्षा कहीं अधिक संख्या में कारें हैं।

दुनिया में हर वर्ष 14 लाख लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं। एनसीआरबी ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि देश में 2003-2012 के दौरान जनसंख्या वृद्धि दर 13.6 फीसदी रही, जबकि इसी दौरान सड़क हादसों में मरने वालों की संख्या में 34.2 फीसदी वृद्धि दर्ज की गई। 2012 में दुर्घटनाओं में होने वाली कुल मृत्यु का 35.2 फीसदी सिर्फ सड़क दुर्घटनाओं का नतीजा है। रिपोर्ट के अनुसार 2012 में यातायात दुर्घटनाओं के कुल 4,73,416 मामले दर्ज किए गए, जिसमें 4,40,042 मामले सड़क दुर्घटना के, 1,762 मामले रेलमार्ग दुर्घटना के तथा 31,612 मामले रेल से जुड़ी अन्य दुर्घटनाओं के थे।

ट्रैफिक नियमों में बदलाव कर सड़क हादसों में 80 फीसदी तक कमी लाई जा सकती है। देश में सड़क हादसों में मरने वालों की बढ़ती संख्या के मद्देनजर यूपीए-1 ने ट्रैफिक नियमों को सख्त बनाने के लिए मोटर वाहन संसोधन विधेयक-2007 संसद में पेश किया था। सड़क परिवहन व पर्यटन संबंधी स्थायी संसदीय समिति ने 2008 में इस विधेयक में मामूली बदलाव किया था। 2012 में राज्यसभा में यह विधेयक पारित हो गया, लेकिन लोकसभा में लटक गया।

अगर देखा जाए तो देश की सड़कों पर ज्यादातर हादसे ओवर स्पीड, लालबत्ती की अनदेखी, गाड़ी चलाते हुए मोबाइल पर बात करना और नशे में गाड़ी चलाने के कारण होते हैं। आंकड़ों के मुताबिक, 80 फीसदी से अधिक हादसे चालक की गलती से होते हैं। नियम तोड़ने वालों को मामूली जुर्माना वसूल कर छोड़ दिया जाता है, जबकि व्यवस्था ऐसी हो कि जुर्माने के साथ गलती दोहराने पर ड्राइविंग लाइसेंस रद्द होना चाहिए। इसके आलवा उन्हें प्रशिक्षण देने और जागरूक करने की भी जरूरत है। लेकिन अफसोस ऐसा कुछ भी नहीं होता। नियम बनते जरूर है लेकिन वह सिर्फ कागजों पर ही सिमटकर रह जाते हैं।

देश की सड़कों पर हादसे कई साल से होते रहे हैं लेकिन सबसे दुख की बात यह है कि इसे रोकने की कभी कोई ठोस कवायद नहीं की गई। मसलन दिल्ली में अगर क्लोज टीवी सर्किट कैमरे की बात करे तो वह सिर्फ चुनिंदा ट्रैफिक सिग्नलों पर ही लगे है। दूसरी बात यह है कि जब ट्रैफिक रश खत्म हो जाता है यानी रात के वक्त दिल्ली की ज्यादातर सड़कों पर रेड लाइट जंप करने की परंपरा किसी दादागिरी की तरह धौंस दिखाती नजर आती है। यह भी देखा जाता है कि जिन ट्रैफिक सिग्नल पर ट्रैफिक पुलिस नहीं होता है तो वहां चालक रेड लाइट तोड़ने पर आमादा होता है। दरअसल हादसों की वजह के बाद उसे रोकने को लेकर एक कारगर कोशिश किसी ने अबतक नहीं की। रेड लाइट तोड़ने को लेकर अनुशासन के रूप में लोगों में डर की कमी है जो दुर्घटना को जन्म देने की बड़ी वजहों में से एक है।

वाहन चालकों को सहायता संबंधी प्रबंधन, ड्राइविंग लाइसेंस, ड्राइविंग में लापरवाही, दिशा-संकेत सूचक जानकारियां सड़क हादसों को रोकने में कारगर भूमिका निभा सकते हैं। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि वाहन लाइसेंसे के दौरान ज्यादातर मामलों में घालमेल होता है और सिर्फ पैसे लेकर ही लाइसेंस बनाए जाते हैं। ऐसे चालक सड़कों पर जब चलते हैं तो अपने साथ मौत को लेकर चलते हैं।

दरअसल जागरूकता के साथ अब कुछ ऐसे ठोस पहल की जरूरत है जो सड़कों को खूनी बनने से रोके। इसके लिए जो सड़क पर चलनेवाले गाड़ियों और वाहनों के चालकों को ट्रैफिक नियमों को सख्ती से पालन करना होगा। एक और बात यह भी कि ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन को लेकर भारत में जुर्माना या सजा काफी कम है लिहाजा उसे सख्त किए जाने की जरूरत है। यह नियम सिर्फ ट्रैफिक नियमों की बेहतरी के लिए नहीं बनाए जाएं बल्कि इसलिए बनाए जाएं ताकि जिंदगी सड़कों पर खुशहाल हो और उसके दुर्घटना या मौत में तब्दील होने की नौबत नहीं आए। सड़कें जीवन की सुगमता के लिए है और वह खूनी बनकर विनाशलीला की पटकथा लिखे इससे पहले एक कठोर रोडमैप की जरूरत है।



First Published: Wednesday, June 4, 2014 - 20:49
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