राजनीति की 'गंदी बात'

By Sanjeev Kumar Dubey | Last Updated: Tuesday, March 4, 2014 - 10:38
 
Sanjeev Kumar Dubey  

सियासतदानों के सुर अब बेसुरे हो गए हैं। उन्हें यह अंदाजा भी नहीं होता कि वह क्या बोल रहे हैं और ऐसे बयानों का असर क्या होगा। बोल ऐसे कि बच्चे भी सुन नहीं सकते और बड़े-बड़े भी शरमा जाए। हैरानी होती है यह देखकर कि अनाप-शनाप जबान में कुछ भी कहने और बयान देनेवाले इन नेताओं को यह पता होता है कि उनके 'बोल' गलत है और इसपर बवाल मचना तय है। लेकिन फिर भी वह बोलते हैं। राजनीति की यह 'गंदी बात' है जो लोकतंत्र को लंबे समय से गंदला रही है। लोकतंत्र चुनावी मौसम में इस जुबानी 'जहर' से बीमार होता जा रहा है।

इस फेहरिस्त में सबसे पहला नाम सलमान खुर्शीद का आता है। सलमान खुर्शीद वर्ष 2002 के गुजरात दंगों के लिए नरेंद्र मोदी को गुनहगार मानते हैं। जनसभा को संबोधित करते हुए वह संयम खो बैठेते हैं। उनकी जबान ऐसी लड़खड़ाती है कि वह मोदी को 'नपुंसक' कह बैठते हैं। जब मीडिया में उनके बयान की आलोचना होने लगी, हो-हल्ला मचा तो उन्होंने खेद जताने या माफी मांगने के बजाय यह कह दिया कि मैं मोदी को नपुंसक ना कहूं तो क्या कहूं। उन्होंने काम ही नपुंसक कहलाने वाला किया है।

सलमान खुर्शीद साहेब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और देश के विदेश मंत्री भी है। मनमोहन सरकार ने उन्हें विदेश विभाग का जिम्मा दिया है। लेकिन ऐसे नेता को भी अपनी अशोभनीय और शर्मनाक टिप्पणी पर गर्व होता है। खुर्शीद ने सियासी मर्यादा लांघकर देश की सियासत को भी शर्मसार किया। हदें पार करते हुए उन्होंने खेद जताना भी उचित नहीं समझा हालांकि इस बयान से उनकी पार्टी कांग्रेस, यहां तक की पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गाधी भी किनारा करते नजर आए।

यूपी के बड़बोले मंत्री आजम खान ने भी नरेंद्र मोदी पर ऐसा हमला बोला कि सभी सन्न रह गए। उन्होंने मोदी के खिलाफ जो जुबानी जहर उगली उसका कोई अर्थ या मतलब नहीं होता है सियासत में। उन्होंने भी मोदी को दंगों के मामले में लपेटा और कह दिया कि गुजरात के मुसलमान तो मोदी को डरकर वोट देते हैं। अगर वो वोट नहीं दे तो तेजाब से जला दिए जाएंगे। आलोचना अगर करनी है तो उसकी भी मर्यादा होती है। उसकी भाषा में संयम होनी चाहिए ताकि जिसपर वह किया जा रहा है वह जुबानी तेजाब की तरह ना लगे। दुनिया की हर चीज एक मर्यादा से बंधी है और जाहिर सी बात है कि सियासत में भी यह लागू होता है। राजनेता बनने का यह मतलब कतई नहीं कि सियासी मर्यादा का उल्लंघन प्रभुता पाने के अहंकार में करते चले जाए।

कांग्रेस के नेताओं के विवादित बयानों के बीच भाषा के संयम की वकालत करने वाली बीजेपी के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान भी विवादित बयान को लेकर आलोचना का शिकार होते रहे। चौहान ने मध्य प्रदेश के नीमच में नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में राहुल गांधी की तुलना करते हुए कहा कि कहां मूंछ का बाल और कहां पूंछ का बाल। चौहान के समर्थक भी इस बयान को नहीं पचा पाए और उन्होंने कहा कि चौहान कभी भी किसी पर व्यक्तिगत हमले करने पर ज्यादा भरोसा नहीं करते है, यह बात अलग है कि वे बोलने से ज्यादा करने पर भरोसा करते है।

शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने तो हद कर दी। आईएनएस सिंधुरत्न पनडुब्बी हादसे को लेकर एंटनी पर निशाना साधते हुए उद्धव ठाकरे ने अपनी पार्टी के मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में लिखा- 'हिंदुस्तान के रक्षा विभाग को दीमक लग गया है। समुद्र में पनडुब्बियां आग में खाक हो रही हैं या फिर डूब रही हैं। वायुसेना विभाग के लड़ाकू मिग विमान धाराशायी हो रहे हैं। सीमा पर सैनिकों के सिर छांटकर पाकिस्तान में ले जाया जा रहा है। इसके बावजूद देश के रक्षा मंत्री और उनके लोग हिजड़े के समान बैठे हैं।' जिस व्यक्ति पर देश की रक्षा मंत्री की जिम्मेदारी हो उसके खिलाफ ऐसी अभद्र और अशोभनीय टिप्पणीय दिग्गज राजनेता किस प्रकार कर देते हैं, यह समझ से परे हैं।

चुनावी मौसम की ये 'जहरीली बातें' हैं। चुनावी मौसम की ये जुबानी फिसलन है जो जानबूझकर सस्ती लोकप्रियता बटोरने और दूसरों को आहत करने की खातिर की जाती है। ऐसे खराब, भद्दे बयानों को जनता सिरे से खारिज करती है। हां जो ऐसा बोलते हैं उनके चहेते उन्हें उनके बोल के लिए सर आंखों पर बिठाते हैं। लेकिन सियासत 'जुबानी जहर' का नाम कतई नहीं। लोकतंत्र में चुनाव बेहतरीन मौसम होता है जब जनता को अपने फैसले पर मुहर लगाने का मौका मिलता है। सियासत में सियासी बोल तो बोलने चाहिए। लेकिन ऐसे भी नहीं जो बोल बेसुरे बनकर जुबानी तरकश का काम करते हो। इन सियासतदानों को यह सोचना होगा कि वह जो भी बोलते हैं वह पूरे देश में देखा और सुना जाता है। ऐसे में उनके आचरण के साथ उनका जुबानी संयम भी मर्यादित और दायरे में होना चाहिए। रही बात लोकप्रियता हासिल करने की तो वह अपने आचरण और बेहतर काम करके भी की जा सकती है। उसके लिए 'जुबानी जहर' उगलने की जरूरत नहीं होती। जनता वोट काम से देती है जुबानी 'तीर' या फिर अमर्यादित बयान से नहीं।



First Published: Tuesday, March 4, 2014 - 10:38


comments powered by Disqus