केजरीवाल पर कितना भरोसा करेगी जनता

By Alok Kumar Rao | Last Updated: Saturday, March 8, 2014 - 20:55
 
Alok Kumar Rao  

ईमानदारी और पारदर्शिता के नारे पर दिल्ली में सरकार बनाने के बाद उसे तिलांजलि दे चुके आम आदमी पार्टी (आप) के संयोजक अरविंद केजरीवाल लोकसभा चुनाव में भी अपनी सफलता दोहराना चाहते हैं। अपनी पार्टी के प्रचार और अपनी मौजूदगी का अहसास कराने के लिए वह लगातार भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर हमले कर रहे हैं। देश में वैकल्पिक राजनीति पेश करने का दावा करने वाले केजरीवाल के समक्ष यह चुनौती है भी कि वह भाजपा और कांग्रेस दोनों से अलग दिखें। लेकिन अलग दिखने के लिए एक अच्छी सरकार चलाने की विरासत जो होनी चाहिए वह उनके पास नहीं है। एक बेहतर सरकार देने का मौका केजरीवाल को दिल्ली में मिला था लेकिन उन्होंने इस अवसर को हाथ से जाने दिया।

केजरीवाल हालांकि दावा करते हैं कि उन्होंने अपनी 48 दिनों की सरकार में इतने काम किए जितने कि अब तक की किसी भी राज्य सरकार ने नहीं किया। इसमें कोई दो राय नहीं कि उन्होंने अपनी अल्प दिनों की सरकार में कई अहम फैसले किए। दिल्लीवासियों को एक सुशासन का रास्ता दिखाया। जनता और सरकार के बीच एक सीधा संवाद कायम करने की कोशिश की। केजरीवाल के इन कदमों से लोगों में यह उम्मीद जगी कि आप सरकार आने वाले दिनों में जनता के हित में और कई सारे फैसले करेगी। केजरीवाल सरकार उन वादों को पूरा करेगी जिसने उन्हें अपने घोषणापत्र में शामिल किए थे लेकिन इस आम आदमी की सोच को आप पार्टी की चुनावी महात्वाकांक्षा से गहरा धक्का लगा। जन लोकपाल विधेयक विधानसभा में पेश करने में विफल होने पर केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और दिल्ली की जनता राष्ट्रपति शासन के अधीन आ गई।

दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद केजरीवाल पर सवालों के बौछार होने लगे। केजरीवाल पर आरोप लगा कि लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए उन्होंने दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। दिल्ली विधानसभा में मिली कामयाबी ने केंद्र की सत्ता में भागीदारी बढ़ाने की उनकी महात्वाकांक्षा को जगा दिया। केजरीवाल को लगा कि दिल्ली सहित देश के शहरी इलाकों में कांग्रेस के खिलाफ जो जनमत बना है और वैकल्पिक राजनीति का जो उभार हो हुआ, उसे और धार देकर वह केंद्र में नए राजनीतिक समीकरण को रूप दे सकते हैं।

आप पार्टी के लोकसभा चुनाव लड़ने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। राजनीतिक महात्वाकांक्षा भी बुरी चीज नहीं है लेकिन केजरीवाल ने जिस तरह से दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया, उससे सहमत नहीं हुआ जा सकता। सवाल है कि केजरीवाल क्या मुख्यमंत्री रहते हुए लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी का नेतृत्व कर सकते थे। शायद नहीं, क्योंकि आप पार्टी का एक मात्र चेहरा केजरीवाल ही है। केजरीवाल ही वह धुरी हैं जिस पर आप पार्टी पूरी तरह से टिकी है। शायद मुख्यमंत्री रहते हुए वह अपनी पार्टी को उतना समय नहीं दे पाते जितना समय वह अभी दे पा रहे हैं। मुख्यमंत्री की अपनी कुछ जिम्मेदारियां होती हैं, उसका एक प्रोटोकाल होता है। मुख्यमंत्री रहते हुए केजरीवाल शायद रोजाना सड़क पर नहीं उतर पाते और न ही मोदी और अऩ्य राजनीतिक दलों को अपने लहजे में ललकार पाते।

रोड शो पर निकले केजरीवाल के निशाने पर मोदी हैं। वह जानते हैं कि आगामी लोकसभा चुनावों में उनके सामने राहुल गांधी नहीं बल्कि पीएम पद की तरफ कदम बढ़ा रहे नरेंद्र मोदी हैं। इसीलिए वह रोजाना मोदी से सवाल कर रहे हैं। केजरीवाल बार-बार लोगों को यह समझाने की कोशिश भी कर रहे हैं कि भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टियां एक जैसी हैं। मुकेश अंबानी के साथ मोदी और राहुल को खड़ा कर केजरीवाल यही संकेत दे रहे हैं कि इऩ दोनों ही पार्टियों से देश का भला नहीं होने वाला क्योंकि उनकी नजरों में देश को मुकेश अंबानी चला रहे हैं। क्रोनी कैप्टिलिज्म का जाल देश में किस कदर फैला है उसे 2जी स्पेक्ट्रम और कोयला घोटाले में देखा जा सकता है। राजनीतिक दलों में औद्योगिक घरानों का दखल भी लोगों के सामने है। केजरीवाल का पूरा जोर इन्हीं मुद्दों का हवा देकर चुनावी ताल ठोकने की है। केजरीवाल भ्रष्टाचार और महंगाई की जड़ में इन्हीं समस्याओं को देखते हैं।

केजरीवाल के आरोप बहुत कुछ हाइपोथेटिकल हैं, केवल आरोप लगाकर राजनीतिक जमीन हासिल नहीं की जा सकती। देश की जनता समझदार है। बेहतर होता कि केजरीवाल अपने शासन से दिल्ली को एक आदर्श राज्य बनाने की कोशिश करते। विधानसभा में भले ही उनके पास स्पष्ट बहुमत नहीं था लेकिन अच्छे कार्यों के लिए कांग्रेस उनसे समर्थन वापस नहीं लेती। केजरीवाल दिल्ली में विकास का मॉडल बनाने का प्रयास करते तो आने वाले दिनों में उनकी राजनीतिक महात्वाकांक्षा का रास्ता आसान हो सकता था।



First Published: Saturday, March 8, 2014 - 20:55
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