तेलंगाना और सियासी फायदे

साल 1956 में तेलंगाना का आंध्र में विलय कर राज्‍य के तौर पर आंध्र प्रदेश का गठन किया गया था, मगर अब तेलंगाना फिर से आंध्र से अलग होकर देश का 29वां राज्‍य बनने की ओर अग्रसर है। तेलंगाना राज्य का मुद्दा पिछले कई सालों से खासा गरम रहा जबकि अलग राज्य की मांग 60 सालों से चली आ रही थी।

| Updated: Feb 22, 2014, 12:43 AM IST

साल 1956 में तेलंगाना का आंध्र में विलय कर राज्‍य के तौर पर आंध्र प्रदेश का गठन किया गया था, मगर अब तेलंगाना फिर से आंध्र से अलग होकर देश का 29वां राज्‍य बनने की ओर अग्रसर है। तेलंगाना राज्य का मुद्दा पिछले कई सालों से खासा गरम रहा जबकि अलग राज्य की मांग 60 सालों से चली आ रही थी। हालांकि बीच में यह मांग कुछ कुंद भी पड़ी। अब आंध्र प्रदेश को विभाजित कर तेलंगाना राज्य के गठन पर अंतिम मुहर लगने के बाद इस पर सियासत काफी तेज हो गई है। इस बात का अंदाजा पहले से ही था कि नया राज्‍य बनते ही राजनीतिक दल अपने नफे नुकसान को लेकर खासा सक्रिय हो जाएंगे। भले ही आम लोगों की महत्‍वाकांक्षाएं पीछे ही रह जाए। आखिर इसकी परवाह किसे है।

चूंकि आंध्र के विभाजन के पीछे कांग्रेस की रणनीति शुरुआत से यही थी कि दक्षिण भारत में अपने जड़ को और मजबूत किया जाए। एक ओर कांग्रेस जहां इस नए राज्‍य के गठन का पूरा श्रेय लेने पर तुली है, वहीं बीजेपी भी अपना दम भर रही है कि उनके प्रयासों से ही इस नए राज्‍य का गठन संभव हो पाया। कांग्रेस के अलावा भारतीय जनता पार्टी और तेलुगू देशम पार्टी से जुड़े तेलंगाना के नेता भी इसका श्रेय लेने के लिए पीछे नहीं हैं। श्रेय लेने की इस होड़ की असली परीक्षा तो तब होगी तब चुनाव परिणाम के बाद जनता जनार्दन का फैसला आएगा।

यदि आंध्र के विभाजन के घटनाक्रम पर गहराई से नजर डालें तो यह साफ हो जाता है कि सिर्फ सियासी फायदे के लिए ही इस राज्‍य का बंटवारा कर दिया गया। कांग्रेस भले ही इस बात को स्‍वीकार न करे पर हकीकत यही है कि महज राजनीतिक निहितार्थ से आंध्र के बंटवारे की नींव रखी गई।

सीमांध्र में राजनैतिक नुकसान की भरपाई के लिए कांग्रेस नए राज्य निर्माण का श्रेय अकेले लेने की कोशिश में है ताकि आने वाले लोकसभा चुनावों में उसे तेलंगाना की 17 सीटों में अधिकांश पर सफलता मिल सके। कांग्रेस नेता तो दबे छुपे यह मांग भी करने लगे हैं कि नए राज्य के अस्तित्व में आने के बाद टीआरएस को कांग्रेस में अपना विलय कर देना चाहिए।

अब जबकि राज्‍य का गठन तय हो गया है, सबसे बड़ी मुश्किल कांग्रेस के समक्ष ही आएगी। तेलंगाना के अस्तित्‍व में आने के बाद सीमांध्र से जुड़े कांग्रेसी नेताओं ने इस्तीफे देने शुरू कर दिए हैं। राज्य के पुनर्गठन का पूरी तरह मुखालफत कर रहे किरण कुमार रेड्डी ने भी इस्तीफा दे दिया है। चर्चा तो यह भी है कि किरण रेड्डी अब नई पार्टी का गठन करेंगे। वहीं, कांग्रेस के तेलंगाना विरोधी नेताओं का मानना है कि अलग राज्य बन जाने से कांग्रेस को कोई फायदा नहीं होगा। कांग्रेस की यह पूरी कवायद 2014 के आम चुनावी में सियासी फायदा उठाने के लिए है।
कांग्रेस को यह नहीं भूलना चाहिए कि के चंद्रशेखर राव ने करीब 14 साल पहले तेलंगाना आंदोलन को पुनर्जीवित करने में अहम भूमिका निभाई थी। उसके बाद के सालों में भी राव ने इस आंदोलन को सघन तरीके से चलाया। बीते दो-तीन सालों में राव ने आंदोलन की ऐसी पटकथा लिखी कि उनका नाम और तेलंगाना पर्याय सरीखा हो गया। उस दौरान सालों तक चले आंदोलन और विरोध प्रदर्शन में हजारों लोगों ने प्राणों को आहुति दी। अलग तेलंगाना के पक्ष एवं विपक्ष में जबरदस्‍त आंदोलन चला। विधायकों का सामूहिक इस्तीफा, सैकड़ों युवकों की खुदकुशी, विधानसभा एवं संसद के अंदर ड्रामा जैसी कई घटनाएं देखने को मिलीं। आखिरकार केंद्र सरकार को मांग के आगे झुकना पड़ा और नए राज्य के गठन का फैसला किया।

समर्थकों के बीच केसीआर के नाम से लोकप्रिय राव ने 2009 में भूख हड़ताल से जन आंदोलन खड़ा किया, जिसके बाद केंद्र सरकार तेलंगाना गठन की प्रक्रिया शुरू करने के लिए मजबूर हुई। उस समय रायलसीमा और तटीय आंध्र में केंद्र के इस कदम का भारी विरोध हुआ था। कांग्रेस की असली दुविधा उसी समय शुरू हुई कि नए राज्‍य के निर्माण के बाद क्‍या असली राजनीतिक लाभ उन्‍हें लाभ मिल पाएगा।

आंध्र के बंटवारे को लेकर इतनी घटनाएं हुई कि एक समय कांग्रेस को भी लगने लगा कि कहीं यह दांव उलटा न पड़ जाए। अब मौजूदा परिस्थितियों में कांग्रेस की कोशिश यह होगी कि राव को पूरी तरह अपने पाले में किया जाए। राव की पार्टी (तेलंगाना राष्‍ट्रनिर्माण समिति) टीआरएस के इस क्षेत्र में प्रभुत्‍व को देखते हुए कांग्रेस की कोशिश यह होगी कि कांग्रेस और टीआरएस एक हो जाए। मगर अब बदले हालात में यह राव के ऊपर निर्भर करेगा कि वह कांग्रेस के साथ आते हैं या नहीं।
केसीआर का तो यहां भी कहना है कि उन्‍होंने अपने बूते इस आंदोलन को चलाया और अब जाकर उसे इसका फल मिला। उन्‍होंने 70 के दशक के बाद लगभग मृतप्राय पड़े तेलंगाना आंदोलन को पुनर्जीवित किया। आज यह राज्‍य जब हकीकत में बना तो राव भला कैसे इसे अपने पाले से निकल जाने देंगे।

वहीं, कांग्रेस को तेलंगाना की फिक्र से ज्यादा सीटों का मोह है। पार्टी के रणनीतिकार नफा नुकसान तौल रहे हैं। पार्टी नेता इस बात को लेकर पसोपेश में हैं कि एकला चलो की नीति अपनाएं या गठबंधन करें। खैर जो भी हो कांग्रेस को सिक्का तो उछालना ही होगा। जिक्र योग्‍य है कि आंध्र की 42 लोकसभा सीटों में से 17 तेलंगाना क्षेत्र की हैं, जिनमें से 12 सीटों पर कांग्रेस का कब्जा है। वहीं, विधानसभा की 294 सीटों में से 119 सीटें तेलंगाना क्षेत्र से आती हैं और 50 से ज्यादा अभी कांग्रेस के पास हैं। सीटों के इस समीकरण में कांग्रेस कुछ उलझती दिख रही है। श्रेय लेने की होड़ में उसे न कुछ निगलते बन रहा है और न ही उगलते।

दूसरी ओर, तेलंगाना के गठन के बाद सीमांध्र और राज्य के अन्य हिस्सों में कांग्रेस के इस फैसले को जनता के बीच लेकर भारी गुस्सा है। इस पूरे प्रकरण में रायलसीमा और तटीय आंध्र में वाईएसआर कांग्रेस ने अभी तक जो रणनीति अपनाई, उसका लाभ अब उसे मिलता नजर आ रहा है। पार्टी के प्रमुख वाईएसआर जगनमोहन रेड्डी शुरू से ही आंध्र के बंटवारे का पुरजोर विरोध करते रहे। उनके इस आंदोलन में क्षेत्र के जनता का पूरा समर्थन भी मिला। अब बदले हालात में कांग्रेस के लिए यहां भी वाईएसआर से कड़ी चुनौती मिलने की संभावना दिखने लगी है।
बात यहीं खत्‍म होती नजर नहीं आ रही है। टीडीपी और बीजेपी का यदि गठबंधन हो जाता है तो यह भी कांग्रेस के लिए खासा नुकसानदेह साबित होगा। यानी तेलंगाना में लाभ पाने की मंशा के बीच सीमांध्र में अपने लिए पुख्‍ता जमीन हासिल करने की जद्दोजहद कांग्रेस के रणनीतिकारों के माथे पर बल डाल दिया है।

अलग तेलंगाना राज्य के गठन के बावजूद कांग्रेस को चुनावी फायदा होने की उम्मीद नहीं है। राव की अगुवाई में टीआरएस कांग्रेस के समर्थन के बिना भी तेलंगाना में क्लीन स्वीप कर सकती है। वाईएसआर कांग्रेस सीमांध्र में बड़ी पार्टी के तौर पर उभर सकती है। फिलहाल आंध्र की अधिकांश सीटों पर बीजेपी का खास असर नहीं है। यदि बीजेपी का टीडीपी से गठबंधन हो जाता है तो तेलंगाना में टीआरएस को कड़ी टक्‍कर मिल सकती है। हो सकता है कि देश भर में मोदी की लहर का कुछ लाभ बीजेपी को यहां मिल जाए। चूंकि चंद्रबाबू नायडू की अगुवाई वाली टीडीपी अपने बूते इन दोनों क्षेत्रों में खास प्रभाव नहीं डाल सकती है। ऐसे में टीडीपी का बीजेपी के साथ गठबंधन करने की पूरी उम्‍मीद है। साथ ही, जिस तरीके से इस राज्‍य का गठन किया गया उससे देश की एकता पर भी खतरा हो सकता है। चूंकि देश भर में इस समय कई नए राज्‍यों के गठन की जोरदार मांग उठ रही है।

अलग राज्य बनने के बाद आंध्र के एक बड़े हिस्से के लोगों की उम्मीदों को धक्का लगा है। हो सकता है कि यह आक्रोश कांग्रेस के खिलाफ जाए। आम चुनाव में कांग्रेस ने तो तेलंगाना में भारी जीत मिलने की उम्‍मीद में विभाजन को अंजाम दिया। मगर जिस तहर की प्रतिक्रियाएं आंध्र से सामने आ रही हैं, उससे यह लग रहा है कि कांग्रेस को आम चुनाव में ही नहीं, विधानसभा चुनावों में अपनी इस राजनीतिक भूल की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।