Rekha Garg

काश कि खुशियां सबके दामन में हों, वह दिन कब आएगा

काश कि खुशियां सबके दामन में हों, वह दिन कब आएगा

वर्तमान की मूलभूत आवश्यकता है हर घर-परिवार में किसी भी एक व्यक्ति का रोजगार जरुर बना रहे. महंगाई के दौर में घर का हर सदस्य काम से लगा रहे, आजीविका का साधन बना रहे, तभी परिवार चलता है.

हम कब समझेंगे पानी की एक बूंद की कीमत

हम कब समझेंगे पानी की एक बूंद की कीमत

जीवन स्त्रोत पानी हमारी जिन्दगी के लिए कितना जरुरी है, ये किसी को बताने की आवश्यकता नहीं है. पानी नहीं तो हमारा अस्तित्व भी नहीं. पानी को व्यर्थ न बहने के लिए कितने ही प्रयास किए जा रहे हैं.

प्रेम का बन्धन अटूट है

प्रेम का बन्धन अटूट है

विवाह करके गृहस्थी की बागडोर संभाले हुए, एक दूसरे के साथ चलते-चलते अचानक ऐसा क्या हो जाता है कि एक-दूसरे से कटु हो जाते हैं औेर अलग होने का मन बना लेते हैं, आजादी सबको अच्छी लगती है पर इस आजादी का

केवल बेटियां ही नहीं बेटे भी संस्कार लेकर बड़े हों...

केवल बेटियां ही नहीं बेटे भी संस्कार लेकर बड़े हों...

आज समाज में चारों तरफ हिंसा, निराशा भय, एक दूसरे को नुकसान पहुंचाने की प्रवृति, तोड़-फोड़ गलत ढंग से सुविधा प्राप्त करने की चेष्टा करना, महिलाओं से अभद्र व्यवहार करना और बड़ों का अपमान करना आम सी बात

Opinion: योग ही साधना है, देश का एक अनमोल वरदान है

Opinion: योग ही साधना है, देश का एक अनमोल वरदान है

कहते हैं मानव जन्म बड़ी मुश्किल से मिलता है. श्रेष्ठतम मानव शरीर का मिलना अच्छे कर्मो का ही फल है.

उदासीन रिश्ते

उदासीन रिश्ते

व्यस्तताओं से घिरी जिन्दगी में हम बहुत कुछ खोते जा रहे हैं .खो रहे हैं घर आंगन की चहल-पहल, रिश्तों का संसार, दादी-नानी की रसोई का तड़का, छुटिटयों की मौज-मस्ती और त्योहारों को मनाने का पारम्परिक ढंग.

मायूसियों में दबी जिन्दगी

मायूसियों में दबी जिन्दगी

जब-जब भी किसी दुखी, दीन या गरीब को देखती हूं तो मन उसकी करुणावस्था से विचलित हो जाता है. सोचती हूं इनके लिए कुछ करूं पर घर की व्यस्तताएं और समाज के बंधन के कारण कुछ कर ही नहीं पाती.

'मायका बेटियों की विरासत है'

'मायका बेटियों की विरासत है'

उच्च शिक्षा देकर बेटी के जीवन के अध्यायों से कन्यादान,

'दिव्यांगों को प्रेम और समय दें'

'दिव्यांगों को प्रेम और समय दें'

कई वर्षों से ठहरी, थकी; उबाऊ जिंदगी देखकर मन तीव्र वेदना के अहसास तले दबता चला गया. करीब 22 वर्ष पहले मैने एक विद्यालय में अध्यापिका के पद पर अपना काम संभाला था.

आरक्षण का सहारा न लें, स्वावलंबी बनें

आरक्षण का सहारा न लें, स्वावलंबी बनें

जिधर दृष्टि डालों कुछ पाने की ही चाह है करने का ठेका सिर्फ देश के शहीदों का ही है, क्या मांगते हैं ये सैनिक फौजी हमसे कुछ नहीं सिर्फ देश की रक्षा में जीवन लगा देते हैं.

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