सचिन कुमार जैन

WTO - क्या भारत को खाद्य सुरक्षा और खेती का नैतिक पक्ष याद रहेगा!

WTO - क्या भारत को खाद्य सुरक्षा और खेती का नैतिक पक्ष याद रहेगा!

अमेरिका सरीखे विकसित देशों का तर्क रहा है कि जब सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य देकर किसानों से सीधे अनाज खरीदती है, तो इससे खुले बाजार में प्रतिस्पर्धा कमजोर पड़ती है.

भारत की खेती, खाद्य सुरक्षा और विश्व व्यापार संगठन

भारत की खेती, खाद्य सुरक्षा और विश्व व्यापार संगठन

अमेरिका की पूरी कोशिश है कि दोहा विकास चक्र (डब्ल्यूटीओ में विकास के मुद्दों पर वार्ता का वह दौर जो वर्ष 2001 में शुरू हुआ था) में शामिल विषयों को बिना सहमति-बिना निर्णय के ही छोड़ दिया जाए और अब ई-कामर्स सरीखे नए विषयों पर बात शुरू हो. 

WTO में ई-कामर्स: आर्थिक उपनिवेशवाद की नई इबारत

WTO में ई-कामर्स: आर्थिक उपनिवेशवाद की नई इबारत

विश्व व्यापार संगठन में कोशिश यह है कि दुनिया में कहीं भी ई-कामर्स पर किसी भी तरह के शुल्क न लगें, उपकरण, तकनीक, सॉफ्टवेयर और इंटरनेट के जरिये होने वाले व्यापार को सीमा शुल्कों से मुक्त रखा जाए और स्थानीय कानून की बंदिशें भी न रहें. भारत और अफ्रीका सरीखे देश इन कोशिशों का विरोध कर रहे हैं.

भुखमरी सूचकांक से कहीं ज्यादा बड़ी है!

भुखमरी सूचकांक से कहीं ज्यादा बड़ी है!

भारत में जीवन की शुरुआत की भूखे रहने के पाठ से होती है. देश में 6 से 8 महीने की उम्र में केवल 42.7 प्रतिशत बच्चों को ऊपरी आहार मिलना शुरू होता है. यानी लगभग 57 प्रतिशत बच्चे भूख के साथ ही बड़े होते हैं. इसके साथ की देश में छह महीने की उम्र से दो साल की उम्र तक केवल 8.7 प्रतिशत बच्चों को स्तनपान के साथ पूरा जरूरी आहार मिलता है. यानी दो साल तक के 91.3 प्रतिशत बच्चे भूखे रहते हैं और जीना सीखते हैं. 

क्या हिंसक प्रतिस्पर्धा का दबाव मौत को आसान बना देता है?

क्या हिंसक प्रतिस्पर्धा का दबाव मौत को आसान बना देता है?

जिस आर्थिक विकास की अवधारणा और नीति को हमने अपनाया है, उसमें सबसे आगे रहना ही मायने नहीं रखता है; इसमें जरूरी है सबको पीछे छोड़कर आगे बढ़ना. जीवन के पहले दूसरे साल में ही बच्चों को यह जता दिया जा रहा है कि आगे निकलो, सब कुछ रट डालो. चौबीसों घंटे कुछ न कुछ सीखते रहो. कुदरत से, समाज से, अपने आस-पड़ोस से कुछ मत सीखना. यह 100 प्रतिशत का दौर है, इससे कम पर जीवन संभव नहीं है.

बीमार, बीमारी से नहीं, आत्महत्या से मर रहा है!

बीमार, बीमारी से नहीं, आत्महत्या से मर रहा है!

भारत में इस सदी के पहले 15 सालों में लगभग 3.84 लाख लोगों ने आत्महत्या की, जिसका कारण थीं बीमारियां. अस्थमा, अवसाद, डिमेंशिया, कैंसर, पैरालिसिस और अन्य लंबी असाध्य बीमारियां...

नैराश्य में घिरे किसान के सामने आत्महत्या ही विकल्प क्यों?

नैराश्य में घिरे किसान के सामने आत्महत्या ही विकल्प क्यों?

•परंपरागत रूप से किसान और खेती का काम गरिमा और आत्मनिर्भरता के आधार रहे हैं, लेकिन आर्थिक विकास के इस दौर में ये 'अति नैराश्य और आत्महत्या' के कारण चर्चा में हैं. किसानों की आत्महत्या के पीछे एक बड़ा कारण उन्हें उपज का सही दाम न मिलना, आपदाओं-फसल की खराबी की खराबी की स्थिति में व्यवस्थागत संरक्षण न मिलना, कृषि कार्यों की लागत का बढ़ना और नीतिगत रूप से खेती को कमज़ोर करने वाले कदम हैं.

भारत में आत्महत्या का 'संकट काल'...

भारत में आत्महत्या का 'संकट काल'...

गरीबी का सबसे गहरा जुड़ाव बेरोज़गारी और आजीविका के संकट से हैं. राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के प्रतिवेदनों के मुताबिक, भारत में वर्ष 2001 से 2015 के बीच 72,333 लोगों ने गरीबी और बेरोज़गारी के कारण आत्महत्या की.

रोजगार में महिलाओं से समाज कर रहा भेदभाव

रोजगार में महिलाओं से समाज कर रहा भेदभाव

विश्व बैंक द्वारा प्रकाशित शोध पत्र रिपोर्ट (रीअसेसिंग पैटर्न्स आफ फीमेल लेबर फ़ोर्स पार्टिसिपेशन इन इंडिया, मार्च-अप्रैल 2017) ने कुछ गंभीर संकेत उजागर किये हैं. इसके हिसाब से भारत में श्रम शक्ति में महिलाओं की सहभागिता दर केवल 27 प्रतिशत है, यानी 100 संभावित कार्यशील आयुवर्ग की महिलाओं में से 27 महिलायें ही रोज़गार में शामिल हैं.

मेहनत ज्‍यादा, लेकिन वेतन में पुरुषों से पीछे हैं महिलाएं

मेहनत ज्‍यादा, लेकिन वेतन में पुरुषों से पीछे हैं महिलाएं

श्रम ज्यादा करें पर पारिश्रमिक पुरुषों से कम मिले; यह प्रमाण है व्यवस्था पर मर्दों के जबरिया कब्ज़े का. आंध्र प्रदेश में बुआई के काम के लिए पुरुषों को 276.5 रुपये मजदूरी मिलती है, जबकि महिलाओं को 206.5 रुपये (25.3 प्रतिशत कम) मजदूरी मिल रही है. बिहार में इस काम के लिए पुरुषों को 252.6 रुपये रोज मिल रहे हैं, पर महिलाओं को 214.6 रुपये.