सुविज्ञा जैन

Zee Analysis : हमने नंबर-1 की रैंकिंग को ही तैयारी मान लिया, रक्षात्मक खेल का हुनर भी भूल गए!

Zee Analysis : हमने नंबर-1 की रैंकिंग को ही तैयारी मान लिया, रक्षात्मक खेल का हुनर भी भूल गए!

वन-डे और टी-20 के चक्कर में सुरक्षात्मक और शास्त्रीय क्रिकेट में हम पिछड़ रहे हैं. दूसरे टेस्ट में हार को पचाना मुश्किल पड़ रहा है. विश्व क्रिकेट की रैंकिंग में नंबर एक होने के नाते इस हार की तथ्यपरक जांच-पड़ताल जरूर बनती है.

विचार के लिए एक मुद्दा दे गई सुप्रीम कोर्ट के जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस

विचार के लिए एक मुद्दा दे गई सुप्रीम कोर्ट के जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस

लोकतंत्र के चार खंभों में एक न्यायपालिका ही बची थी जिस पर खुलेआम आरोप नहीं लगते थे. वैसे गाहेबगाहे न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं. 

Analysis : विदेशी निवेश के लिए सरकार की नई कवायद से जुड़े कुछ तथ्य

Analysis : विदेशी निवेश के लिए सरकार की नई कवायद से जुड़े कुछ तथ्य

2013 में हम एफडीआई प्रवाह के मामले में 15वे नंबर पर थे, 2014 में 9वें पर आ गए थे. और 2015 में हम एफडीआई के लिए सबसे अच्छा विकल्प बनकर उभरे थे.

देश की पांच बड़ी संस्थाओं के लिए कैसा रहा साल 2017

देश की पांच बड़ी संस्थाओं के लिए कैसा रहा साल 2017

इस साल (2017) की कुछ घटनाओं के आधार पर देखने की कोशिश करते हैं कि इस साल पांच प्रमुख संस्थाओं की क्या छवि बनी.

लोकतांत्रिक चुनाव में व्यापार का पहलू

लोकतांत्रिक चुनाव में व्यापार का पहलू

जब ये दिख रहा है कि चुनावी नतीजों से शेयर बाजार में ज्वारभाटा आ जाता है तो चुनाव सर्वेक्षण नतीजे भी तो अनिश्चय में निश्चय का आकलन होते हैं. 

Analysis : गुजरात चुनाव में क्या सचमुच पहले से बेहतर है कांग्रेस का प्रदर्शन?

Analysis : गुजरात चुनाव में क्या सचमुच पहले से बेहतर है कांग्रेस का प्रदर्शन?

भाजपा के लिहाज से भी देखें तो इस बार गुजरात में उसने हिंदू-मुसलमान या पाकिस्तान के कोण से प्रचार करने में देर लगाई. पहले चरण के चुनाव के बाद ही उसने इस मुद्दे को बढ़ाया.

निर्भया की याद में : महिला सुरक्षा क्या सिर्फ कानून से संभव है?

निर्भया की याद में : महिला सुरक्षा क्या सिर्फ कानून से संभव है?

आमतौर पर अपराध बढ़ने की दोषी सबसे पहले लचर सुरक्षा व्यवस्था और कमजोर कानून व्यवस्था को मान लिया जाता है. लेकिन क्या महिलाओं के साथ छेड़खानी और बालात्कार जैसे अपराध सिर्फ कमजोर कानून की वजह से हैं?

गुजरात चुनाव के बाद आगे क्या?

गुजरात चुनाव के बाद आगे क्या?

चाहे आईआईटी हों और चाहे आईआईएम या दूसरे सैकड़ों प्रौद्योगिकी संस्थान, क्या इन सबका एक ही काम नहीं है कि विश्वविद्यालयों में सृजित ज्ञान का औद्योगिक इस्तेमाल करने के तरीके ढूंढें.

GDP में वृद्धि आखिर किसकी वृद्धि है, कितना विश्वसनीय है यह पैमाना!

GDP में वृद्धि आखिर किसकी वृद्धि है, कितना विश्वसनीय है यह पैमाना!

अगर गौर से देखें तो इस बार केवल मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में वृद्धि से जीडीपी सुधरी. वैसे हमेशा से ही मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज के आंकड़े ही जीडीपी के आंकड़ों को प्रभावित करते आए हैं. लेकिन इसमें देश की कुल आबादी की आधी से ज्यादा वह आबादी छूट जाती है जो कृषि से जुडी है.

'पद्मावती' के बहाने पनपते ढेरों सवाल

'पद्मावती' के बहाने पनपते ढेरों सवाल

साहित्य का एक रूप हिस्टोरिक फिक्शन भी होता है. हिस्टोरिक फिक्शन यानी वह रचना जो इतिहास के किरदारों को लेकर एक कथा का रूप धारण करती है. 

केजरीवाल के 5 साल और 6 सवाल...

केजरीवाल के 5 साल और 6 सवाल...

कोई राजनीतिक दल जनता के सरोकार का निकाय ही होता है सो यह देख लेने में हर्ज क्या है कि इस समय आम आदमी पार्टी और राजनीतिज्ञ केजरीवाल कहां तक पहुंचे हैं. इस बहाने मौजूदा राजनीतिक माहौल पर भी नज़र पड़ जाएगी. सरसरी तौर पर देखना चाहें तो छह सवालों पर सोच सकते हैं. 

स्मॉग : स्वच्छता अभियान की समीक्षा की दरकार

स्मॉग : स्वच्छता अभियान की समीक्षा की दरकार

देश में जब से नई सरकार बनी है उसने नए नए काम करके आजमाएं. कालाधन, स्मार्ट सिटी, स्टार्टअप, मेक इन इंडिया, सबको पक्के मकान, स्वच्छ मारत, नोटबंदी, जीएसटी वगैरह वगैरह. इन सभी कामों में एक बात समान है कि लगभग सभी पाइपलाइन में हैं. हालांकि सरकार कोई कसर नहीं छोड़ रही. सरकार दावा कर रही है कि कार्य प्रगति पर है. और सरकार के विरोधी कह रहे हैं कि देश का भट्टा बैठा जा रहा है.

पर्यावरण सुधार कर दो फीसदी जीडीपी बढ़ाने का खर्चा क्या बैठेगा?

पर्यावरण सुधार कर दो फीसदी जीडीपी बढ़ाने का खर्चा क्या बैठेगा?

पर्यावरण की चिंता करने वाले लोग तर्क दे रहे हैं कि अगर पर्यावरण को सुधार लिया जाए तो देश की जीडीपी दो फीसद बढ़ जाएगी, लेकिन इस सुझाव में यह हिसाब ग़ायब है कि वैसा पर्यावरण बनाने में जीडीपी का कितना फीसद खर्चा हो जाएगा. अगर यह सवाल पूछा जाएगा तो वे खर्चे की बात छोड़कर खराब पर्यावरण के कारण देश में लाखों लोगों की मौत का आंकड़ा देने लगते हैं.

विकास, वृद्धि और प्रगति के फ़र्क पर एक नज़र

विकास, वृद्धि और प्रगति के फ़र्क पर एक नज़र

कोई आर्थिक विकास को विकास मानता है. कोई समग्र जनता की खुशहाली को विकास मानता है. कोई मानव की सुख समृद्धि को महत्त्व देता है और कोई देश के समग्र आर्थिक विकास को.

पटाखा बैनः अदालत पर सवाल के मायने

पटाखा बैनः अदालत पर सवाल के मायने

हर एक व्यवस्था के सुचारू रूप से चलते रहने के लिए कुछ मूल नियम सर्वसम्मति से तय हैं और उन्ही को सर्वमान्य मानकर एक देश का कामकाज चलता है.

क्या इस बार भी विवाद से बच पाएगा साहित्य का नोबेल

क्या इस बार भी विवाद से बच पाएगा साहित्य का नोबेल

यह नोबेल पुरस्कारों के ऐलान का हफ्ता है. भौतिकी, रसायन, अर्थशास्त्र, चिकित्सा, साहित्य और शांति के क्षेत्र में योगदान के लिए विश्व के सबसे बड़े पुरस्कारों को लेकर पूर्वानुमान भी विश्वस्तर पर लगाए जाते हैं. लगभग हर देश में हर साल लगते हैं. हर साल ग़लत भी साबित होते हैं. फिर भी लगते हैं क्योंकि भविष्य के प्रति मानव का कुतूहल छूटता नहीं. इन पूर्वानुमानों को अटकलबाजी कहना ज्यादा ठीक है.

क्या वाकई गांधी को मानने का वक्त आ गया?

क्या वाकई गांधी को मानने का वक्त आ गया?

महात्मा गांधी के दर्शन और उनके खुद के आचार में सबसे काम की बात छांटनी हो, और खासतौर पर आज के लिहाज़ से वह बात छांटनी हो तो आत्मनिर्भरता को याद किया जा सकता है. जीवन के हर पड़ाव में गांधी आत्मनिर्भरता की महत्ता समझते चले गए. अपना खाना खुद बनाना हो, अपने खुद के बाल काटना हो या अपने कपड़े धोबी से न धुलवाकर खुद धोना हो. 

BHU: छेड़खानी का विरोध और पीड़ितशास्त्र की याद

BHU: छेड़खानी का विरोध और पीड़ितशास्त्र की याद

बीएचयू में लड़की को छेड़ा गया. लड़कियों ने अपनी सुरक्षा की मांग की. उस पर घ्यान देने की बजाए प्रशासन ने पीड़ित लड़की को ही अपनी सुरक्षा के लिए सावधानी बरतने की समझाइश दे डाली. जबकि लड़कियां ये मांग कर रही थीं कि विवि परिसर में जहां अंधेरा रहता है वहां रोशनी और सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं. अपनी मांग के लिए वे धरने पर बैठ गईं.

मीडिया विमर्श से लुप्‍त होते मूल मुद्दे

मीडिया विमर्श से लुप्‍त होते मूल मुद्दे

हर जरूरी बात की चर्चा करने वाला देश का मीडिया खुद भी इस समय चर्चा में है. विश्व मीडिया भारत की खबरें यहां के मीडिया से ही उठाता है. यानी अपने देश के मीडिया पर विश्व मीडिया की नज़र भी है. इसीलिए हमें सतर्क हो जाना चाहिए कि इस मामले में दुनिया में हमारे मीडिया की कैसी आलोचना हो रही होगी. हालांकि इस मामले में मीडिया रिसर्च या सर्वे बिल्कुल नहीं दिखते.

अब बाज़ार ही बचा-बढ़ा पाएगा हिन्दी को...

अब बाज़ार ही बचा-बढ़ा पाएगा हिन्दी को...

अगर यह मान लें कि हिन्दी खासतौर पर अच्छी हिन्दी या प्रभावी हिन्दी दुर्लभ होती जा रही है तो अपनी दुर्लभता के कारण उसका भाव बढ़ना चाहिए.

आखिर कुपोषण पर क्या सोचा नीति आयोग ने

आखिर कुपोषण पर क्या सोचा नीति आयोग ने

सत्ता में आने के बाद एनडीए सरकार के कामों और ऐलानों की लिस्ट बहुत लंबी है. इन कामों में एक यह था कि उसने योजना आयोग को खत्म करके नीति आयोग बनाया था.

शिक्षा और रोज़गार की बढ़ती दूरी

शिक्षा और रोज़गार की बढ़ती दूरी

आजकल पढ़ाई के लिए विषय चुनने से लेकर किस संस्थान से पढ़ाई करनी है, ऐसा हर फैसला सिर्फ यह ध्यान में रखकर हो रहा है कि उस क्षेत्र में कितनी नौकरियां हैं.

गांव अगर शहर से कहे अपनी व्यथा

गांव अगर शहर से कहे अपनी व्यथा

‘किसान बदहाल है.' 'किसानी घाटे का सौदा है.' 'किसान आत्महत्या कर रहे हैं.' 'खेती में लागत तक नहीं निकल रही.' 'इस मौसम की फसल भी बर्बाद हो गई.'