विनय उपाध्याय

अज़ीम शायर निदा फाज़ली की याद में : कहीं सपना ज़िंदा है...

अज़ीम शायर निदा फाज़ली की याद में : कहीं सपना ज़िंदा है...

राजनीति की रणभूमि पर चल रहे दांव-पेंच के खेल को भी इस अज़ीम शायर ने महसूस किया. कहा, ‘हमारे यहां ये क्यों हो रहा है? कैसे हो रहा है? किसके लिए हो रहा है? इन सवालों का एक ही जवाब है- इलेक्शन

मालिनी अवस्थी : धरती के छंद गाती आवाज़

मालिनी अवस्थी : धरती के छंद गाती आवाज़

कभी किसी सभागार की चार-दीवारी में, कभी आसमान तले भीड़ भरे जलसे के मंच पर, कभी दूरदर्शन के किसी चैनल पर, तो कभी अपनों के बीच किसी छोटी महफिल में. आवाज़ और अंदाज़ के निरालेपन के बीच मालिनी की पेशकश यकीनन सुनने वालों पर करिश्माई असर करती है.

रंगों की ‘रज़ा' थी कि यादों का उजास कायम रहे

रंगों की ‘रज़ा' थी कि यादों का उजास कायम रहे

मध्यप्रदेश को इस बात का फ़क्र है कि दुनिया का यह बुलंदपाया चित्रकार इसी सूबे के एक गांव में पैदा हुआ. नर्मदा के किनारे मंडला ज़िले की सरहद में बसा बबरिया देहात रज़ा की जन्मभूमि है.

विनम्र श्रद्धांजलि : गिरिजा देवी, काशी की कंठ माधुरी पर हर कोई था निहाल

विनम्र श्रद्धांजलि : गिरिजा देवी, काशी की कंठ माधुरी पर हर कोई था निहाल

बनारस के गैल-गलियारों, हवेलियों और मंदिरों से लेकर सीमा पार के मुल्कों की महफिलों तक गिरिजा देवी अपनी निराली तान का तिलिस्म जगा चुकी थीं. मान और शान अपने उत्कर्ष का चरम छू चुके थे लेकिन इन सबके वज़न से उनकी सहजता झुकी नहीं.

रुह में बसे रहते हैं गुरु

रुह में बसे रहते हैं गुरु

गुरु-शिष्य परंपरा के बगैर हमारे संगीत की विकास यात्रा को समझना निरर्थक होगा. आदिकाल से इस परंपरा को सम्मान और महत्व मिलता रहा है. वेद, शास्त्र, पुराण से लेकर आज तक गुरु और शिष्य की नातेदारी बराबर बनी हुई है.

'देखा, सीखा और परख्या ही काम आता है'

'देखा, सीखा और परख्या ही काम आता है'

काशी की कंठ माधुरी से झरता राग रस का सम्मोहन इस मायने में अनोखा था कि इसके साथ तपस्या के ताप में निखरे सुरों की आभा थी. अपनापे की प्रभा थी. ...और इस महिमा को अपने गान-व्यक्तित्व में धारण किए आंखों के सामने थी गंगा किनारे की गिरिजा.

लय-ताल के मन छूते रूपक

लय-ताल के मन छूते रूपक

अगर क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर इन पांच तत्वों से मिलकर हमारी देह का निर्माण हुआ है, तो यही पंचभूत नाद बनकर हमारी चेतना में बार-बार घुलते-मिलते हैं. हमारे राग-विराग, संयोग-वियोग, आंसू और मुस्कुराहटों, चुप्पियों और कोलाहल, जीवन की प्रत्येक हलचल में प्रकृति का कण-कण गूंजता है.

पिता ने कहा था- 'तू और तेरा साज एक हो जाएंगे'

पिता ने कहा था- 'तू और तेरा साज एक हो जाएंगे'

विश्वख्याति प्राप्त संतूर वादक पंडित शिवकुमार शर्मा ने पिछले दिनों भोपाल स्थित कलाओं के घर भारत भवन में संतूर समारोह के दौरान श्रोताओं के बीच अपनी कला यात्रा से जुड़ी स्मृतियां साझा की. उनसे यह संवाद किया वरिष्ठ कला समीक्षक विनय उपाध्याय ने. इस दिलचस्प बातचीत को कथात्मक शैली में बुना गया है.

शताब्दी संगीत पुरुष : पंडित नंदकिशोर शर्मा...

शताब्दी संगीत पुरुष : पंडित नंदकिशोर शर्मा...

सच्चे कर्मयोगी कभी भी अपनी साधना के दिन नहीं गिनते, लेकिन इतिहास के पन्नों पर उनके पुरुषार्थ के सुनहरे हस्ताक्षर खुद-ब-खुद उनकी महिमा बखान करते हैं. वक्त की धूल को बुहारकर जब भी आने वाली नस्लें गुजश्ता दौर को याद करती हैं, ये उजले हस्ताक्षर नुमाया होते हैं और कहानियां बोल पड़ती हैं...

सुर से आगे निकल जाऊं

सुर से आगे निकल जाऊं

किशोरी आमोणकर की तल्लीनता और समर्पण का यह सामर्थ्य यकीनन उनके बुनियादी संस्कार तालीम और तपस्या का ही नतीजा रहा. उनसे मिलना, वाग्देवी की प्रभा से आलोकित होना था. उनके कला स्वाभिमान और ज्ञान-ध्यान से सारी दुनिया परिचित थी.

रेखाओं का साज़ है... रंगों की धुन है

रेखाओं का साज़ है... रंगों की धुन है

चित्रों की रचना करते हुए एक अनोखे संसार में अपने तरीके से रहने की राहें खुलीं. उस संसार में, जहां उसका अपना सुख-दुख, अपने पहाड़, अपनी नदी, अपने मौसम और अपने रंग हैं जो उस ज़मीन पर एक आकाश को असीम और अनंत बनाए हुए हैं. इस रंग-दर्शन में अखिलेश ज़िंदगी के अंधरे-उजालों से खामोश गुफ्तगू करते हैं.

संकीर्तन: गाती-नाचती प्रार्थनाएं

संकीर्तन: गाती-नाचती प्रार्थनाएं

घर्षण, मिश्रण और प्रदूषण के इस दौर में दुर्भाग्य से जीवन को शांति और संबल देने वाली भक्ति की लोकतांत्रिक चेष्टा भी काफी हद तक प्रभावित हुई है.

बादलों के संग बावरी उड़ान

बादलों के संग बावरी उड़ान

दुर्भाग्य से हमारे समय के साहित्य और कला के क्षेत्र में पूर्वाग्रह और अनदेखी का आलम इस कदर व्याप्त हो गया है कि रातों-रात महान बनाने या पुरस्कार-अलंकरणों से नवाज़ने वाली व्यावसायिक फर्मों से फासला बनाने वाले कस्बे के सहज कवि-कलाकारों की टोह लेने की गरज़ भला किसे!

अनबूझा है नाद का रहस्य

अनबूझा है नाद का रहस्य

हमारे संगीत की अनमोल निधि के रूप में पं. हृदयनाथ मंगेशकर आदर के पात्र रहे हैं. कल्पना की असीम उड़ान भरते हुए भाव सरगम की ऐसी विलक्षण, उदात्त और मधुर धुनें उन्होंने रची हैं जिसकी दूसरी मिसाल खोजना कठिन है.