पहले बाढ़ और फिर सूखे की खबरें सुनने के लिए कितने तैयार हैं हम...

अभी पता नहीं है कि मानसून कैसा रहेगा. लेकिन इतना जरूर पता है कि चाहे सामान्य बारिश हो या सामान्य से ज्यादा, देश में अलग-अलग जगह आसमान बारिश और जल कुप्रबंधन के कारण कई जगह बाढ़ और 4-6 महीने बाद कई जगह सूखा पड़ेगा ही. यह पूर्वानुमान पिछले दो दशकों के अनुभव के आधार पर है.  

पहले बाढ़ और फिर सूखे की खबरें सुनने के लिए कितने तैयार हैं हम...

इस साल भी मानसून आने में देरी हो रही है. वैसे विशेषज्ञों ने एक महीने पहले अनुमान ये लगाया था कि मानसून अपने तय समय पर ही आएगा और इस साल सामान्य वर्षा होगी. समय का अनुमान तो गड़बड़ा गया. वर्षा की मात्रा का पता सितंबर के बाद चलेगा. हालांकि इसी बीच देश में नए-नए शुरू हुए नीति आयोग ने पानी को लेकर एक रिपोर्ट जारी की है. कंपोजिट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स नाम की इस रिपोर्ट में बताए गए आंकड़े कुछ डराने वाले हैं. रिपोर्ट में बहुत-सी बातें शामिल हैं लेकिन एक बात चैंकाने वाली है. रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले दो साल में देश के 21 शहरों के पास अपना भूजल भी नहीं बचेगा. उधर सन 2030 तक देश में पानी की मांग या जरूरत आपूर्ति की तुलना में दुगनी हो चुकी होगी.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पानी के मामले में इस समय देश अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है. आने वाले समय में हालात और खराब हो जाने के अंदेशे अलग से जताए गए हैं. नीति आयोग की रिपोर्ट तो खैर अभी पिछले सप्ताह ही आई है, लेकिन अपने देश में जल संकट कोई आज ही उपजी समस्या नहीं है. पिछले दो दशकों से लगातार हम हिसाब लगा रहे हैं, योजनाएं बना रहे हैं, योजनाएं परियोजनाएं लागू कर रहे हैं, फिर भी चिंता कम नहीं हो रही है. भले ही इस साल मानसून आने में अभी कोई बहुत ज्यादा देर न हुई हो लेकिन पानी के मामले में अपनी नाजुक हालत देखते हुए चिंतित हो उठना स्वाभाविक है.

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पहले बाढ़ और फिर पड़ेगा सूखा
अभी पता नहीं है कि मानसून कैसा रहेगा. लेकिन इतना जरूर पता है कि चाहे सामान्य बारिश हो या सामान्य से ज्यादा, देश में अलग-अलग जगह आसमान बारिश और जल कुप्रबंधन के कारण कई जगह बाढ़ और 4-6 महीने बाद कई जगह सूखा पड़ेगा ही. यह पूर्वानुमान पिछले दो दशकों के अनुभव के आधार पर है.

मानसून में हुई देरी तो देश पर कैसा पड़ेगा असर
इस साल नई स्थिति यह है कि देश में कई बांध और पुराने तालाब महीने भर पहले से पूरी तौर पर सूख चुके हैं. मसलन उत्तर प्रदेश के झांसी जिले में सपरार बांध 65 साल पहले अपने निर्माण के बाद पहली बार पूरा का पूरा सूखा पड़ा है. सिंचाई तो दूर की बात है इसके कमांड क्षेत्र में पीने के पानी तक के लिए हाहाकार मचा हुआ है. इससे अंदाजा लगता है कि अगर मानसून में और देरी हो गई तो क्या हालात बनेंगे. सौराष्ट्र और कच्छ में जून महीने की यह रिपोर्ट है कि वहां अब तक सामान्य से 95 फीसदी कम बारिश हुई है. मुख्यधारा के मीडिया का ध्यान भी दूसरी बातों पर ज्यादा लगा है. इसलिए लोगों को पता नहीं है कि आखिरकार देश के किन-किन हिस्सों में हाहाकार मचा हुआ है.

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ये इलाके बाढ़ से होंगे परेशान...
इसलिए आएगी क्योंकि कुछ दिनों के लिए जब झमाझम बारिश आएगी उसे जल निकायों में भरकर रखने का पर्याप्त इंतजाम हमारे पास नहीं है. यह पानी बाढ़ की तबाही मचाता हुआ वापस समुद्र में चला जाएगा. जगह जगह कमजोर तटबंध टूटेंगे. बेबस मवेशी बहेंगे. रिहाइशी इलाकों में पानी घुसेगा और जानमाल का नुकसान होगा.

बाढ़ नियंत्रण के इंतजाम क्या हुए?
इस काम के लिए राज्यों के सिंचाई विभाग पारंपरिक रूप से कवायद करते हैं. हर साल मानसून के पहले तटबंधों को मजबूत करने और बांधों से गाद मिट्टी निकालने का चलन है. हर साल मानसून के पहले बाढ़ नियंत्रण की खबरें छपती रहती थीं, लेकिन इस साल ये खबरें कम दिखाई दीं. यहां तक कि बुंदेलखंड के जो बांध इस साल की गर्मियों में पूरे के पूरे सूख गए, उनकी गाद मिट्टी निकालने का यह अच्छा मौका था. उन बांधों में जल संभरण क्षमता बढ़ जाती, लेकिन वह काम होता नहीं दिखा. मानकर चलना चाहिए कि देश में दूसरी जगहों पर भी इस तरह के इंतजाम तत्परता से नहीं हो पाए. ये अलग बात है कि कागजों में हुए हो और इसका पता किसी को चला न हो. अब इसका पता अगर चलेगा तो तभी चलेगा जब बाढ़ से तबाही का आकलन होगा.

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बारिश का पानी को इकट्ठा करने का होगा इंतजाम
यही वह इंतजाम है जो दुनिया सदियों से करती आई है. इसी से बाढ़ रूकती है और इसी से जरूरत के दिनों में पानी का इंतजाम होता है. यानी बाढ़ रोकने के उपाय करने का एक मतलब यह भी है कि सूखे को भी रोकना. लेकिन दिक्कत यह है कि पानी को रोककर रखने के लिए हमारे पास एक ही तरीका है कि बांध बनाएं. लेकिन दो तीन दशकों से बांधों के खिलाफ ऐसा माहौल बनाया गया कि अब कोई सरकार इस उपाय की बात ही नहीं कर पाती. अलबत्ता छोटे तालाबों और झीलों का विकल्प जरूर बचता है. हद की बात ये है कि भारत में पिछले डेढ़ हजार साल में जो लाखों तालाब बनाए गए उनकी सार संभाल तक हम नहीं पाए. छोटे-बड़े इन पुराने तालाबों की संख्या कोई 15 लाख बैठती है. ये तालाब कूड़ाघर के तौर पर इस्तेमाल होने लगे. बहुत से तालाब पूरे पुर कर सपाट हो गए और वहां अतिक्रमण होकर मकान बन गए. क्या ये हैरत की बात नहीं है कि जहां हमें साल दर साल बढ़ती पानी की जरूरत के कारण बारिश के पानी की रोकने के इंतजाम करने चाहिए वहां हम अपने पुराने इंतजाम को ही खत्म कर रहे हैं.

भूजल पर बढ़ा ली निर्भरता
देश में जलप्रबंधन का सनसनीखेज तथ्य है कि बारिश के पानी यानी सतही जल के संभरण की बजाए भूजल का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है. नवीनतम सूचना ये है कि भूजल का स्तर खतरनाक स्तर से भी नीचे चला जा रहा है. इसी बात पर नीति आयोग को चिंता जतानी पड़ी है. कृषि के आंकड़ों पर नज़र डालें तो इस समय देश की आधी से ज्यादा खेती की ज़मीन असिंचित यानी वर्षा आधारित ही है. इस जमीन पर बारिश के अलावा दो तीन बार पानी देने के लिए किसान भूजल पर ही निर्भर हैं. पेयजल के लिए भी हम भूजल पर ही निर्भर होते जा रहे हैं. भूजल का इस्तेमाल करने में कोई हर्ज नहीं था बशर्ते भूजल का स्तर बनाए रखने के लिए भूजल को रिचार्ज करने का काम भी उसी रफतार से बढ़ाते. भूजल को रिचार्ज करने का काम भी नए बांध और पुराने तालाब ही किया करते थे. लेकिन जहां देश के बांध और पुराने तालाब मानसून आने के बहुत पहले से सूखने लगे हों तो इसे खतरे की घंटी नहीं बल्कि खतरे का हूटर माना जाना चाहिए.

भविष्यवाणियों से उम्मीद लगाना बेकार
देश के मौसम विभाग की भविष्यवाणियों से खुशफहमी का चलन भी बढ़ रहा है. आए दिन यह प्रचार सुनने को मिलता है कि बारिश के पूर्वानुमान के नए वैज्ञानिक मॉडल के मुताबिक इस बार मानसून समय पर आने का अंदाजा है. मानसून सामान्य से बेहतर रहने का अनुमान है, जबकि उसके गलत होने पर ऐन मौके पर दूसरे अनुमान बताए जाने लगते हैं. इस बार मानसून के गलत पूर्वानुमान जीता जागता उदाहरण है. जून गुजरने को है और उत्तर भारत में मानसून पूर्व की फुहारों तक का अता पता नहीं है. कृषि प्रधान देश में मानसून की गड़बड़ी को साधारण बात नहीं माना जाना चाहिए. देश के किसानों को आपात स्थिति के अंदेशे से खबरदार किया जाना चाहिए और उन्हें जरूरी मशविरे दिए जाने का काम किया जाना चाहिए.         

(लेखिका, प्रबंधन प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ और सोशल ऑन्त्रेप्रेनोर हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं)

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