लड़की हूं, हिंदुस्तानी हूं, भारत में खुद को सेफ मानती हूं- हुमा कुरैशी

इस फिल्म की निर्देशक गुरिंदर चड्ढा ने बताया, मुझे यह फिल्‍म बनाने का आइडिया तब आया जब मैं अपने दादा का पुश्तैनी मकान खोजते हुए पाकिस्‍तान के झेलम शहर पहुंची थी. वहां मैंने बहुतों से पूछा कि क्‍या वो लोग मेरे दादा को जानते हैं

ज़ी न्यूज़ डेस्क | अंतिम अपडेट: Aug 13, 2017, 04:12 PM IST
लड़की हूं, हिंदुस्तानी हूं, भारत में खुद को सेफ मानती हूं- हुमा कुरैशी
इस तरह आया 'पार्टीशन: 1947' का ख्याल (फाइल फोटो)

नई दिल्ली: बॉलीवुड की एक्ट्रेस हुमा कुरैशी हाल ही में अपनी फिल्म 'पार्टीशन: 1947' के प्रमोशन के लिए दिल्ली पहुंची थीं. यहां एक प्रतिष्ठित अखबार को दिए गए इंटरव्यू में हुमा कुरैशी ने कहा कि मैं खुद एक लड़की हूं, हिंदुस्तानी हूं और यहां खुद को पूरी तरह महफूज महसूस करती हूं. बता दें कि हुमा ने यह बयान पूर्वउपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के कार्यकाल के अंतिम दिन दिए गए विदाई भाषण में मुसलमानों को असुरक्षित बताए जाने पर दिया है. हुमा ने आगे कहा कि भारत को आजाद हुए 70 वर्ष पूरे हो गए और इतने अच्छे माहौल में सकारात्म बातें ही अच्छी लगती हैं. भारत की आजादी के 70वें वर्ष में महिलाओं की आजादी की बात पर हुमा बोलीं, भारत में काफी सुधार हुआ है. बेसिक सुरक्षा तो सरकार लड़कियों को दे जा रही है मगर लड़कियों को खुद भी इतना मजबूत होना पड़ेगा कि उन्‍हें इसकी जरूरत न पड़े. दिल्‍ली विश्वविद्यालय से हिस्ट्री ऑनर्स में डिग्री हासिल कर चुकीं हुमा ने कहा, इतिहास मेरा हमेशा से पसंदीदा विषय रहा है.  

इस तरह आया 'पार्टीशन: 1947' का ख्याल

इस फिल्म की निर्देशक गुरिंदर चड्ढा ने बताया, मुझे यह फिल्‍म बनाने का आइडिया तब आया जब मैं अपने दादा का पुश्तैनी मकान खोजते हुए पाकिस्‍तान के झेलम शहर पहुंची थी. वहां मैंने बहुतों से पूछा कि क्‍या वो लोग मेरे दादा को जानते हैं. तब पता चला कि वो सभी सन 1947 में ही वहां आकर बसे हैं. इससे मुझे अंदाजा लग गया था कि कैसे रातों रात एक पूरा शहर अपना घर-जमीन छोड़कर दूसरी जगह बस गए. उसी प्लॉट को लेकर यह फिल्म बनाई गई है. 

विभाजन के सालों बाद हुई मुलाकात 

हुमा ने बताया, विभाजन के वक्त मेरे दादा जी पाकिस्‍तान छोड़ दि‍ल्ली में बस गए थे मगर मेरे पिताजी की दो बुआओं की शादी पाकिस्‍तान के एक शहर में हुई थी. पापा और दादा के भारत आ जाने के बाद उनका बुआ लोगों से मिलना-जुलना बंद हो गया था. काफी साल बाद दिल्ली में पापा के होटल में एक आदमी उन्हें ढूंढता हुआ आया और उसने उनका नाम पूछा. उसने बताया कि वह पापा की बुआ के बेटे हैं. सालों बाद पापा से मुझे जब इस बात का पता चला तो हम लोग काफी इमोशनल हो गए.