मुंगेर: एक कांस्टेबल की शानदार कहानी, दस साल से बच्चों को दे रहीं फुटबॉल प्रशिक्षण

मुंगेर जिला पुलिस बल की कांस्टेबल रंजीता ने इसे गलत साबित कर दिया. रंजीता ने अपनी मेहनत और जज्बे की बदौलत मात्र 32 साल की उम्र में खुद का कद अपने पद से बड़ा कर लिया है. 

मुंगेर: एक कांस्टेबल की शानदार कहानी, दस साल से बच्चों को दे रहीं फुटबॉल प्रशिक्षण
रंजीता ने अपनी मेहनत और जज्बे की बदौलत मात्र 32 साल की उम्र में खुद का कद अपने पद से बड़ा कर लिया है.

मुंगेर: आमतौर पर माना जाता है कि किसी भी व्यक्ति की पहचान उसके पद से होती है, मगर बिहार के मुंगेर जिला पुलिस बल की कांस्टेबल रंजीता ने इसे गलत साबित कर दिया. रंजीता ने अपनी मेहनत और जज्बे की बदौलत मात्र 32 साल की उम्र में खुद का कद अपने पद से बड़ा कर लिया है. 

बिहार के भोजपुर जिले की रहने वाली रंजीता सिंह मुंगेर जिले के नक्सल प्रभावित क्षेत्र में जब कांस्टेबल के पद पर नियुक्त हुई थीं, तब यह कोई नहीं जानता था कि वह इस क्षेत्र में एक बेमिसाल कहानी रच डालेंगी. भारतीय महिला फुटबॉल टीम की सदस्य रह चुकीं रंजीता पिछले 10 साल से बच्चों को फुटबॉल का प्रशिक्षण दे रही हैं. अब यहां से प्रशिक्षित खिलाड़ी राष्ट्रीय टीम में अपनी जगह बना रहे हैं. 

मुंगेर

रंजीता मुंगेर जिला पुलिस बल में वर्ष 2008 में कांस्टेबल के तौर पर शामिल हुई थीं. उनके लिए यह जगह नई नहीं थी, क्योंकि पिता की नौकरी के दौरान वह कुछ समय तक उनके साथ यहां रह चुकी थीं. उन्होंने आईएएनएस को बताया, 'जब मैं छोटी थी तो गंगा किनारे छोटे बच्चों को लोगों का सामान ढोते देखती थी. इसके बदले मिले पैसों से बच्चे नशा किया करते थे. कांस्टेबल की नौकरी मिलने के बाद मैंने इन बच्चों को इकट्ठा किया और इनका नामांकन स्कूल में कराया. कुछ दिन बाद उन्हें फुटबॉल का प्रशिक्षण देना शुरू किया. उसके बाद से यह काम बदस्तूर जारी है.' 

मलिन बस्तियों में रहने वाले बच्चों को समान अवसर उपलब्ध कराने के लिए रंजीता ने उन्हें फुटबॉल का प्रशिक्षण देना शुरू किया और बाद में उन्हें पढ़ाई से भी जोड़ा. कूड़ा-कचरा बीनने वाले बच्चों को साथ लेकर रंजीता ने 'चक दे फुटबॉल क्लब' बनाया, जिसमें न सिर्फ बच्चों को फुटबॉल का प्रशिक्षण दिया, बल्कि सुबह और शाम में एक निजी शिक्षक की मदद से उन्हें ट्यूशन भी देना शुरू किया. 

विकास, भोला, अमरदीप सहित लगभग आधे दर्जन बच्चे आज दानापुर आर्मी ब्याज और साईं सेंटर का हिस्सा बन चुके हैं. रंजीता के इस कार्य में उनकी सहेली सुषमा बेसरा भी हाथ बंटा रही हैं. रंजीता इन दिनों भागलपुर के मिर्जा चौकी क्षेत्र के 35 आदिवासी बच्चों को प्रशिक्षित कर रही हैं. इन्हें वे मुंगेर स्थित अपने आवास पर नि:शुल्क आवासीय सुविधा तक उपलब्ध करा रही हैं. 

रंजीता बताती हैं कि मुंगेर के चार बच्चे पिछले वर्ष राष्ट्रीय फुटबॉल अंडर-13 टीम में, जबकि दो बच्चे राष्ट्रीय फुटबॉल टीम अंडर-19 में चयनित हुए हैं. सबसे बड़ी बात है कि रंजीता ने पुलिस में अपनी ड्यूटी करते हुए इन बच्चों को फुटबॉल का प्रशिक्षण दिया है.

रंजीता ऐसे बच्चों को प्रशिक्षण देती हैं जो आर्थिक रूप से बहुत कमजोर हैं. बकौल रंजीता, 'इस काम के लिए मुझे न तो किसी औद्योगिक घराने से कोई मदद मिली और न ही सरकार से. अपने वेतन और समय-समय पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की मदद से ही बच्चों को प्रशिक्षण दे रही हूं. उन्हें खेल सामग्री भी समय-समय पर पुलिस अधिकारी ही उपलब्ध कराते हैं.'

रंजीता प्रशिक्षण के दौरान अपने बच्चों को पूर्व राष्ट्रपति ए़ पी़ जे. अब्दुल कलाम की उस पंक्ति को जरूर याद कराती है, जिसमें उन्होंने ऊंचे सपने देखने की बात कही थी. पिछले दिनों राज्य के पुलिस महानिदेशक अभयानंद ने अपने मुंगेर दौरे के दौरान रंजीता से मुलाकात की थी. पुलिस महानिदेशक ने इस काम के लिए शाबाशी देते हुए रंजीता को पांच हजार रुपये का पुरस्कार दिया था. 

पिछले महीने रंजीता को भागलपुर में तिलकामांझी राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित किया गया है. बिहार पुलिस अकादमी के महानिदेशक गुप्तेश्वर पांडेय और तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य नलिनी कांत झा ने उसके कार्यो की सराहना की है. रंजीता इन कामों में मदद के लिए सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार कुमार कृष्णन की भी तारीफ करती हैं. 

रंजीता कहती हैं, 'मुझे खुशी है कि मैं ऐसे बच्चों के लिए कुछ बेहतर कर पा रही हूं. मैंने फुटबॉल खेल के माध्यम से ही पुलिस की नौकरी हासिल की. आज जिला व राज्य को बेहतर फुटबॉल खिलाड़ी देने का प्रयास कर रही हूं.' रंजीता को इस काम में अपने परिजनों का भी सहयोग मिलता है. वह कहती हैं, 'मेरे फैशन डिजाइनर पति रौशन राज भी इस काम खुश हैं. वे जब भी यहां आते हैं, इन बच्चों की जरूरतों के बारे में पूछकर उसे पूरा करने की कोशिश करते हैं.' (इनपुट: IANS से भी)

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