किसान आंदोलन : कर्ज से माफी ही नहीं मुक्ति की बात हो

Updated: Jun 16, 2017, 02:49 PM IST
किसान आंदोलन : कर्ज से माफी ही नहीं मुक्ति की बात हो
कर्जमाफी का उपयोग राजनैतिक दल अपने-अपने हिसाब से करते रहे हैं.

मध्यप्रदेश में अमन शांति की स्थापना के लिए किए गए उपवास से अब तक सात किसानों ने जीवनलीला समाप्त कर ली है. किसान आंदोलन के दौरान भी आत्‍महत्‍या के मामले सामने आए थे. इसका साफ मतलब यह माना जा सकता है कि किसान आंदोलन और उसके बाद मुख्यमंत्री का उपवास और घोषणाओं का समाज में बहुत सकारात्‍मक असर नहीं पड़ा है. यह जरूर रहा कि इस बीच नेताओं ने इन आत्महत्याओं को कर्ज के कारण होने वाली आत्महत्याएं नहीं माना, बल्कि कोई और कारण होना बताया. केन्द्रीय वित्त मंत्री ने कर्ज माफी के लिए राज्यों को ही इंतजाम करने को कहा, और राज्य के कृषि मंत्री ने इससे साफ इंकार कर दिया. लगातार पांच साल कृषि कर्मण अवॉर्ड प्राप्त करने वाले राज्य में विपक्षी दलों को मौका मिला तो उन्होंने कृषि मरण अवॉर्ड दे डाला और कांग्रेस को खुद में जान फूंकने का एक मौका.

पर क्या वाकई कृषि की समस्या को ठीक ढंग से समझा जा रहा है. यह जरूर है कि भारी दबाव के बीच अपनी ब्रांडिंग खराब होते देख इस राजनैतिक संकट को महात्मा के औजार से दूर करने की कोशिश की गई, लेकिन इस बात का कोई स्पष्ट जवाब नहीं है कि कृषि की दशा में आमूलचूल बदलाव के लिए क्या किया जाने वाला है. टिकाऊ खेती की चर्चा केवल कर्जमाफी नहीं है, अलबत्ता कर्जमाफी वोट का एक प्रभावी औजार जरूर है. इसीलिए इसका उपयोग राजनैतिक दल अपने-अपने हिसाब से करते रहे हैं.

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खेती की समस्‍याओं को दूर करने की चर्चा ही उलट है. किसानों की मांग भी उलट है, और उसका समाधान भी उलट ही लगता है, ऐसा इसलिए क्योंकि यह एक आम आदमी भी जानता है कि कर्ज माफी कुछ राहत तो पहुंचा सकता है, लेकिन यह समस्या का स्थायी समाधान हरगिज नहीं कर सकता. बात कर्जमाफी की नहीं कर्जमुक्त खेती की होनी चाहिए और यह तभी संभव है जब खेती की लागत को भी कम करने पर जोर दिया जाए. खेती की लागत को कम करने के लिए जैविक खेती जैसे पद्धतियां बताई जाती हैं, लेकिन जैविक खेती के प्रयोग इतने आसान नहीं हैं, उनमें वक्त लगता है. मुश्किल यह है कि नीतियां बनाए जाने की प्रक्रिया में 'वो' शामिल ही नहीं है, जिसके लिए नीतियां बनाई जा रही हैं. इसलिए जमीनी हालात और कागजी प्रावधानों में बड़ा अंतर दिखाई पड़ता है.

इस साल भी सरकार ने कृषि ऋण के रूप में 10 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया है. इस सवाल का जवाब कौन देगा कि सरकार किसान को कर्जा दे तो देगी, पर वह ऋण चुकाएगा कैसे? इसका तब भी कोई जवाब नहीं था और आज भी कोई जवाब नहीं है. वास्तविकता यह है कि कर्ज ही किसानों की आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण बना है. जिसे मानने से बार-बार बचा जा रहा है, जबकि इसके लिए कोई बड़ी रिसर्च करने की जरूरत नहीं है, यह भी उतनी सही बात है कि कृषि के लिए किए जा रहे खर्चे को गैर-कृषि कार्य में उपयोग करने की प्रवृत्ति उपलब्धता के बाद बढ़ गई हैं. इसलिए जरूरत इस बात की थी कि जो अप्रत्यक्ष रूप से किसानों को खाद बीज, बिजली और संसाधनों पर सब्सिडी के रूप में राहत मिलती थी, उसे ही बढ़ावा दिया जाता, जबकि हो उससे ठीक उलट रहा है. किसानों के हाथ में नगदी दिए जाने का एक बड़ा खतरा इस रूप में भी सामने आया है.

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बहुत जरूरी है कि भारतीय समाज व्यवस्था के अनुरूप औद्योगिकीकरण की नीति को प्रोत्साहित किया जाए, लेकिन पिछले बीस सालों में नीतियों ने खेती के साथ जो कुछ किया है उसका परिणाम हमें वर्ष 2001 से वर्ष 2015 के बीच भारत में 234657 किसानों और खेतिहर मजदूरों की आत्महत्या के शर्मनाक आंकड़े के रूप में मिलता है. यह भी सोचना होगा कि हरित क्रांति के बाद लगातार अवॉर्ड हासिल करने वाले राज्यों में यह स्थितियां ज्यादा गंभीर क्यों हैं. एक बड़ा कारण खेती की लागत का लगातार बढ़ते जाना है. इस दौर में किसानों को न तो लागत के मुताबिक उत्पाद का उचित मूल्य मिल रहा है और न बाजार में संरक्षण. आपदाओं की स्थिति में भी जो फसल बीमा की योजनाएं पिछले सालों में लागू की गईं, वह भी प्रभावी नहीं हो पाईं हैं. इसी के चलते लगातार एक के बाद एक नयी-नयी योजनाओं को लागू करना पड़ा.

दूसरी बात यह है कि सरकार कृषि उत्पादन के बढ़ने की घोषणा उपलब्धि के रूप में कर रही है, किन्तु इस बात को छिपा रही है कि कृषि उत्पाद की उपभोक्ता के स्तर की कीमत और किसान के स्तर की लागू कीमत में 50 से 300 प्रतिशत तक का अंतर होता है. किसान को दाल के 55 रुपए मिलते हैं, पर दाल बेचने वाली कंपनी को 200 रुपए या इससे भी ज्यादा मिलते हैं. सरकार ने इस विसंगति को मिटाने और किसानों की आय सुनिश्चित करने की कोई प्रतिबद्धता जाहिर नहीं की है. न्यूनतम समर्थन मूल्य को किसान हितैषी बनाने के सन्दर्भ में वह मौन ही है. टिकाऊ खेती का रास्ता नगदीकरण के प्रोत्साहन के बजाए अप्रत्यक्ष सब्सिडी को बढ़ाने और फसलों के बेहतर दामों से ही हो सकता है. वरना आज एक आंदोलन है कर्जमाफी के लिए, अगले चार-पांच साल में फिर ऐसा ही एक आंदोलन दोबारा कर्जमाफी के लिए होगा.

(लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)