याद करो कुर्बानी: 'परमवीर' मेजर सोमनाथ शर्मा का अंतिम संदेश...

बैटल ऑफ बगदम में अदम्‍य साहस और अद्भुत युद्ध कौशल के लिए मेजर सोमनाथ शर्मा को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्‍मानित किया गया था.

याद करो कुर्बानी: 'परमवीर' मेजर सोमनाथ शर्मा का अंतिम संदेश...
बगदम की लड़ाई में मेजर शर्मा के साथ एक जेसीओ और विभिन्‍न रैंक के 20 सैनिकों ने देश के लिए अपना सर्वोच्‍च बलिदान दिया था. (फाइल फोटो)

नई दिल्‍ली : “दुश्मन हमसे सिर्फ 50 गज की दूरी पर है. दुश्‍मनों की संख्या हमसे बहुत अधिक है. हम लगातार भयानक गोलीबारी का सामना कर रहे हैं. बावजूद इसके, मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूंगा, मैं अपनी आखिरी गोली और आखिरी जवान तक दुश्‍मनों का सामना करता रहूंगा.” यह संदेश भारत और पाकिस्‍तान के बीच 1947 में हुए पहले युद्ध में मेजर सोमनाथ शर्मा ने अपने बटालियन हेडक्‍वाटर्स को भेजा था. इस संदेश को भेजने के कुछ देर बाद ही मेजर सोमनाथ शर्मा ने देश के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्‍च बलिदान दे दिया था. इस युद्ध में अदम्‍य साहस और अद्भुत युद्ध कौशल के लिए मेजर सोमनाथ शर्मा को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्‍मानित किया गया था. शहीद मेजर सोमनाथ शर्मा भारतीय सेना के पहले ऐसे जाबांज थे, जिन्‍हे बहादुरी के सर्वोच्‍च सम्‍मान परमवीर चक्र से सम्‍मानित किया गया था. आइए जानें बगदम की लड़ाई की पूरी कहानी, जिसमें परमवीर चक्र मेजर सोमनाथ शर्मा सहित 21 जांबाजों ने अपने प्राणों की आहूति देकर कश्‍मीर को हमसे छीनने की साजिश को नाकाम किया था.

बैटल ऑफ बगदम की पूरी कहानी ....
भारत-पाक बंटवारे के बाद पाकिस्‍तान किसी भी सूरत में कश्‍मीर को हासिल करना चाहता था. अपने इन्‍हीं मंसूबों के तहत उसने कश्‍मीर को भारत से जबरन छीनने की साजिश रची. इस साजिश को अंजाम देने की जिम्‍मेदारी कबीलाई लड़ाकों को सौंपी गई. साजिश के तहत 22 अक्‍टूबर 1947 को कबिलाई लड़ाकों ने जम्‍मू कश्‍मीर पर हमला बोल दिया. वहीं 26 अक्‍टूबर 1947को जम्‍मू-कश्‍मीर का आधिकारिक रूप से भारत में विलय हो गया. इसके बाद, जम्‍मू-कश्‍मीर को कबीलाई लड़ाकों से बचाना भारतीय सेना की पहली जिम्‍मेदारी बन गई. जम्‍मू-कश्‍मीर को क‍बीलाई आक्रमण से बचाने के लिए भारतीय सेना को श्रीनगर की तरफ रवाना कर दिया गया. दुश्‍मनों को अंजाम तक पहुंचाने के लिए 27 अक्‍टूबर 1947की सुबह भारतीय सेना श्रीनगर पहुंच चुकी थी. 

हाथ में प्‍लास्‍टर बंधा होने के बावजूद जंग में जाने की थी जिद 
इस दौरान, हॉकी मैच में हाथ की हड्डी टूटने की वजह से मेजर सोमनाथ शर्मा अस्‍पताल में भर्ती थे. उनके एक हाथ में प्‍लास्‍टर बंधा हुआ था. डॉक्‍टर ने प्‍लास्‍टर कटने तक आराम करने की सलाह दी थी. इसी दौरान उन्‍हें पता चला कि जम्‍मू-कश्‍मीर में छिड़ी जंग में कुमाऊं रेजीमेंट को श्रीनगर पहुंचने के आदेश दिए गए हैं. यह जानने के बाद उनका मन बुरी तरह से बेचैन हो गया. उन्‍होंने अपने अधिकारियों के सामने कश्‍मीर जाने की जिद पकड़ ली. उन्‍होंने कहा कि वह अपनी कंपनी को मुश्किल के इस दौर में अकेला नहीं छोड़ सकते हैं, उन्‍हें भी कश्‍मीर जाने की इजाजत दी जाए. आखिर में सेना के वरिष्‍ठ अधिकारियों को मेजर सोमनाथ शर्मा की जिद के सामने झुकना पड़ा. जिसके बाद, 31 अक्‍टूबर 1947 की सुबह मेजर सोमनाथ शर्मा के नेतृत्‍व में कुमाऊं रेजीमेंट की डेल्‍टा कंपनी को हवाई जहाज से श्रीनगर के लिए रवाना कर दिया गया. 

बगदम में कबीलाई लड़ाकों की टोह लेने निकली थी टीम
अब तक, श्रीनगर में भारतीय सेना और पाकिस्‍तानी कबीलाई लड़ाकों के बीच लड़ाई बेहद आक्रामक हो चुकी थी. भारतीय सेना ने तेजी से कबीलाई लड़ाकों को नश्‍तेनाबूत कर श्रीनगर को पूरी तरह से अपने सुरक्षा घेरे में ले लिया था. श्रीनगर को सुरक्षित करने के बाद भारतीय सेना के लिए बड़ी चुनौती श्रीनगर के आसपास के इलाकों को सुरक्षित करते हुए कबीलाई लड़ाकों को खत्‍म करना था. इसी चुनौती के तहत, 3 नवंबर 1947 को भारतीय सेना ने उत्‍तरी दिशा से आ रहे कबिलाई लड़ाकों की टोह लेने के लिए कुमाऊं रेजीमेंट की तीन कंपनी को बगदम इलाके की तरफ रवाना किया था. 3 नवंबर 1947 की सुबह करीब 9:30 बजे भारतीय सेना ने बदगम में आपना बेस स्‍थापित कर दिया. कई घंटों तक पूरे इलाके की टोह लेने के बावजूद कबीलाई लड़़ाकों की टोह लेने पहुंची तीनों कंपनियों को कुछ नजर नहीं आया. जिसके बाद, दोपहर करीब 2 बजे तीन में से दो कंपनियों को वापस भेज दिया गया. 

कबीलाई लड़ाकों ने घरों के भीतर से बरसाई गोलियां
वहीं मेजर सोमनाथ शर्मा के नेतृत्‍व में गई डेल्‍टा कंपनी को दोपहर तीन बजे तक वहीं रुकने का निर्देश दिया गया था. भारतीय सेना को अब तक इस बात का इल्‍म नहीं हुआ था कि कबीलाई लड़ाकों ने स्‍थानीय घरों में अपनी पैठ बना ली है. मेजर सोमनाथ शर्मा के नेतृत्‍व में डेल्‍टा कंपनी इलाके में गश्‍त कर रही थी, तभी दोपहर करीब 2:35 बजे घरों के भीतर से जवानों को निशाना बनाकर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी गई. घरों के भीतर से कबिलाई लड़ाकों द्वारा की जा रही फा‍यरिंग का जवाब चाह कर भी मेजर सोमनाथ शर्मा नहीं दे पा रहे थे. मेजर सोमनाथ शर्मा को डर था कि उनकी गोलियों से घर में मौजूद निर्दोष लोग भी हताहत हो सकते हैं. मेजर शर्मा ने तत्‍काल बगदम में उत्‍पन्‍न हुई स्थिति के बाबत अपने ब्रिगेडियर कमांडर को जानकारी दी. 

एयरबेस और श्रीनगर में कब्‍जा करना चाहते थे कबीलाई
उन्‍होंने अपने ब्रिगेडियर कमांडर को बताया कि दुश्‍मनों की संख्‍या 700 से ऊपर है. दुश्‍मन उन पर छोटे हथियारों, मोटार्र और हेवी ऑटोमैटिक से हमला कर रहे हैं. दुश्‍मन की सीधी फायरिंग के चलते उनकी कंपनी के कई जवान हताहत हो चुके हैं. अब तक मेजर शर्मा को दुश्‍मन की चाल समझ में आ चुकी थी. उन्‍हें अंदेशा हो गया कि दुश्‍मन को यहां पर नहीं रोका गया तो  श्रीनगर और एयरबेस को बचाना मुश्किल हो जाएगा. मौके की नजाकत को समझते हुए मेजर शर्मा ने अपनी रणनीति बदल दी. उन्‍होंने एयरफोर्स को दुश्‍मन की सही स्थिति की जानकारी देते हुए हवाई हमले के लिए कहा. इतना ही नहीं, विपरीत परिस्थिति होने के बावजूद वह अपनी कंपनी के साथ दुश्‍मनों को मुंहतोड़ जवाब देना शुरू कर दिया. 

संख्‍याबल में 7 गुना अधिक थे दुश्‍मन, 6 घंटे तक रोके रहे मेजर शर्मा
मेजर शर्मा के लिए दुश्‍मनों को बगदम में रोकना बेहद कड़ी चुनौती थी. इसकी सबसे बड़ी वजह दुश्‍मनों की संख्‍या थी. जहां एक तरफ मेजर शर्मा के साथ महज सौ जवान थे और उसमें से कई दुश्‍मन की गोलियों का शिकार हो चुके थे, वहीं दूसरी तरफ दुश्‍मनों की तादाद उसने करीब सात गुना अधिक थी. तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद मेजर शर्मा ने अद्भुत साहस का परिचय देते हुए दुश्‍मनों से सीधे मोर्चा लेने का फैसला किया. मेजर शर्मा अपने जवानों के साथ एक खुले मैदान में कूद पड़े और वहीं से दुश्‍मनों को मुंहतोड जवाब देना शुरू किया. मेजर शर्मा और उनके जवानों की बहादुरी ही थी कि संख्‍या बल में बेहद कम होने के बावजूद दुश्‍मनों को करीब छह घंटे तक एक ही जगह पर रोके रखा. इस दौरान मेजर शर्मा की कंपनी ने करीब 200 कबीलाई लड़ाकों को मार गिराया.  

एक ही हाथ से दुश्‍मनों पर कहर बरसाते रहे मेजर शर्मा 
दुश्‍मनों की भारी गोलाबारी के बीच अब तक डेल्‍टा कंपनी के कई जवान अपनी शहादत दे चुके थे. हाथ में प्‍लास्‍टर चढ़ा होने के चलते मेजर शर्मा खुद लाइट मशीनगन नहीं चला सकते थे. ऐसी स्थिति में अपने जवानों का मनोबल बढ़ाने के लिए मेजर शर्मा जवानों की खाली हो रही लाइट मशीन गन में गोलियों से भरी मैगजीन लगाने लगे. भारी गोलाबारी के बीच वह दौड़-दौड़ कर कभी अपने जवानों की मशीनगन में मैगजीन लगाते , तो कभी उन्‍हें दूसरे हथियार उपलब्‍ध करा रहे थे. इसी बीच, दुश्‍मनों की तरफ से चलाया गया एक मोटार्र सेल उनके करीब आकर गिरा, जब तक मेजर शर्मा संभलते, तब तक वह तेज धमाके के साथ फट गया. इस धमाके में मेजर शर्मा गंभीर रूप से घायल हो गए. अपनी शहादत से चंद मिनट पहले अपने ब्रिगेड हेडक्‍वाटर्स को भेजे गए संदेश में उन्‍होंने कहा था,  “दुश्मन हमसे सिर्फ 50 गज की दूरी पर है. दुश्‍मनों की संख्या हमसे बहुत अधिक है. हम लगातार भयानक गोलीबारी का सामना कर रहे हैं. बावजूद इसके, मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूंगा, मैं अपनी आखिरी गोली और आखिरी जवान तक दुश्‍मनों का सामना करता रहूंगा.”

मेजर शर्मा के साथ 21 अन्‍य जांबाजों ने दी थी शहादत
बगदम की लड़ाई में मेजर शर्मा के साथ एक जेसीओ और विभिन्‍न रैंक के 20 सैनिकों ने देश के लिए अपना सर्वोच्‍च बलिदान दिया था. मेजर सोमनाथ शर्मा के अदम्‍य साहस और अद्भुत युद्ध कौशल को देखते हुए उन्‍हें बहादुरी के लिए मिलने वाले सर्वोच्‍च सम्‍मान परमवीर चक्र से सम्‍मानित किया गया था. शहीद मेजर सोमनाथ शर्मा की तरफ से यह सम्‍मान उनके पिता मेजर जनरल अमरनाथ शर्मा ने ग्रहण किया था. शहीद मेजर सोमनाथ शर्मा देश के पहले परमवीर चक्र लेने वाले भारतीय सेना के योद्धा भी हैं.  

सैन्‍य पृष्‍ठभूमि से थे शहीद मेजर सोमनाथ शर्मा
शहीद मेजर सोमनाथ शर्मा सैन्‍य पृष्‍ठभूमि से आते थे. उनका पूरा परिवार सेना में रहकर देश की सेवा कर रहा था. शहीर मेजर सोमनाथ शर्मा के पिता अमरनाथ शर्मा सेना में डायरेक्‍टर जनरल के पद से सेवानिवृत्‍त हुए थे. वहीं उनके भाई जनरल वीएन शर्मा सेना में 1988 से 1990 तक बतौर चीफ आफ आर्मी स्‍टाफ तैनात रहे. इतना ही नहीं, शहीद मेजर सोमनाथ शर्मा के मामा किशनदत्‍त वासुदेश सेना में बतौर लेफ्टीनेंट 4/19 हैदराबादी बटालियन का हिस्‍सा रहे. 

द्वितीय विश्‍व युद्ध में भी मेजर सोमनाथ शर्मा ने दिखाया था अद्भुत साहस
मेजर सोमनाथ शर्मा का जम्‍न 31 जनवरी 1923 को हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में हुआ था. उनकी शुरूआती शिक्षा नैनीताल में पूरी हुई, जिसके बाद उन्‍हें उच्‍च शिक्षा के लिए देहरादून भेज दिया गया. 22 फरवरी 1942 को वे चौथी कुमाऊं रेजीमेंट का हिस्‍सा बने थे. सेना में भर्ती होने के कुछ दिनों बाद ही उन्‍हें द्वितीय विश्‍व युद्ध के तहत जंग लड़ने के लिए मलाया भेजा गया था. द्वितीय विश्‍व युद्ध के दौरान मेजर सोमनाथ शर्मा की बहादुरी ने उन्‍हें सेना में नई पहचान दिलाई थी.

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