गुजरात जंग 2017 : नेहरू और पटेल नदी के दो किनारे नहीं थे...

ये सच है कि सरदार उदार थे, पर उनके अवसान के बाद नेहरू परिवार उनके नाम के साथ न्याय नहीं कर पाया? अब अगर बीजेपी ये कोशिश कर रही है तो नेहरूवाद के नाम पर रेवड़ियां हज़म करने वाले बुद्धिजीवी वर्ग की सत्तागढ़ी अट्टालिका की नित्य ऊंची होती दीवारों को सरदार के नाम की झाड़-फूंककर फेंक दी गई रेत से इतनी किरकिरी क्यों हो रही है?

डॉ. मीना शर्मा | Updated: Nov 8, 2017, 06:00 PM IST
गुजरात जंग 2017 : नेहरू और पटेल नदी के दो किनारे नहीं थे...

कहा जाता है कि बीजेपी बहुत से संदर्भों में कांग्रेस की अनुगामी पार्टी नज़र आती है. दलील ये कि लोकतंत्र अंतत: आंकड़े से चलता है. आंकड़े की जुगत में ही सरदार पटेल की प्रासंगिकता तलाशी जा रही है. नहीं तो गुजरात चुनाव से पहले विरासत की ये तकरार इतनी तीखी कभी नहीं हुई थी. कांग्रेस की मुश्किल यह भी है कि गांधी और नेहरू के नाम का पर्याप्त से सौ गुना ज़्यादा दोहन कर चुकी पार्टी अब किस नैतिक आधार पर सरदार का नाम भुनाने से बीजेपी को रोके?

ये सच है कि सरदार उदार थे, पर उनके अवसान के बाद नेहरू परिवार उनके नाम के साथ न्याय नहीं कर पाया? अब अगर बीजेपी ये कोशिश कर रही है तो नेहरूवाद के नाम पर रेवड़ियां हज़म करने वाले बुद्धिजीवी वर्ग की सत्तागढ़ी अट्टालिका की नित्य ऊंची होती दीवारों को सरदार के नाम की झाड़-फूंककर फेंक दी गई रेत से इतनी किरकिरी क्यों हो रही है? नए मुद्दों की तलाश में जुटे दोनों प्रमुख दलों को यह जान लेना बेहद ज़रूरी है कि युवा पीढ़ी को गुमराह करके वे लोकतंत्र और भारत राष्ट्र को जीत नहीं सकते.

गुजरात चुनाव से पहले सरदार पटेल पर छिड़े महासंग्राम के बीच यह जानना भी ज़रूरी है कि आजाद हिंदुस्तान की बुनियाद रखने वाले लोगों में से अहम रहे पं. जवाहर लाल नेहरू और लौहपुरुष सरदार पटेल के संबंधों पर जारी बयानबाजी विकास के रास्ते पर नहीं है. बेशक इन दोनों नेताओं में गहरे मतभेद थे, लेकिन ये नदी के दो किनारे कभी नहीं रहे.

न तो सरदार पटेल ने, न ही नेहरू ने ऐसे अल्फाजों का इस्तेमाल किया जो उनकी विरासत के दावेदारों की ओर से हो रहे  हैं. राष्ट्रहित के नाम पर हंगामा खड़े करने वालों को मालूम होना चाहिए कि तमाम मतभेदों के बावजूद गांधीजी की हत्या होते ही दोनों ने मुश्किल वक्त में सारेविवादों को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया था.

गांधी की हत्या के तीन दिन बाद जवाहरलाल नेहरू ने वल्लभभाई पटेल को पत्र लिखकर कहा कि गांधीजी के नहीं रहने के बाद अब परिस्थितियां बहुत बदल गईं हैं और अब पुराने विवाद भूलकर हमें साथ काम करना होगा. उतना ही बड़ा दिल दिखाते हुए सरदार पटेल ने नेहरू को लिखा कि सचमुच गांधी की हत्या से सबकुछ बदल गया है. लिहाज़ा वह नेहरू के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अपनी पूरी ताकत लगाने को तैयार हैं. ये अलग बात है कि इस पत्राचार के महज एक सप्ताह पहले पटेल इस्तीफे की पेशकश कर चुके थे.

नेहरू और पटेल के बीच के इस विवाद की शुरुआत दिसंबर 1947 में हुई थी जब देश के कई हिस्से सांप्रदायिक दंगे की आग में झुलस रहे थे. नेहरू और पटेल की पूरी कोशिशों के बावजूद हालात हाथ से निकलते जा रहे थे. राजस्थान का अजमेर भी दंगों का दंश झेल रहा था. पटेल ने मामले की जांच के लिए गृह मंत्रालय की एक टीम भेज दी और इसी बीच प्रधानमंत्री नेहरू ने ऐलान कर दिया कि दिसंबर में वह खुद अजमेर जाकर हालात का जायजा लेंगे. पटेल को यह बात बहुत बुरी लगी, लेकिन नेहरू का लिहाज करते हुए वे चुप रह गए.

बात तब बढ़ गई जब पीएम नेहरू की अजमेर यात्रा के ठीक पहले नेहरू ने खुद के सेक्रेटरी को भेज दिया. पटेल ने इसका अर्थ निकाला कि नेहरू को गृह मंत्रालय के कामकाज पर भरोसा नहीं है. उन्होंने नेहरू से सीधे सीधे कह दिया, 'मुझे आपके पर्सनल सेक्रेटरी को अजमेर भेजने पर सख्त आपत्ति है.' नेहरू ने किसी रिश्तेदार की मृत्यु का हवाला देकर पटेल का जख्म भरने की कोशिश की लेकिन लगे हाथ ये भी कह दिया कि प्रधानमंत्री सरकार का मुखिया होता है और जहां चाहे जा सकता है.
 
गृहमंत्री पटेल प्रधानमंत्री की इस बात पर भड़क उठे और बोले लोकतंत्र में प्रधानमंत्री सबसे बड़ा नहीं होता, बल्कि 'FIRST AMONG THE EQUAL' यानी बराबरी के लोगों में पहले नंबर का होता है. पटेल यहां तक कह बैठे कि लोकतंत्र में प्रधानमंत्री से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह अपने मंत्रियों पर अपना हुक्म चलाएगा.

बात इस कदर बिगड़ गई कि नेहरू और पटेल दोनों ने गांधी से कह दिया कि वह साथ-साथ काम नहीं कर सकते. दोनों ने अपने इस्तीफे की पेशकश कर दी. गांधी ने दोनों से यही कहा कि वे दोनों से अलग अलग मुलाकात करेंगे, लेकिन फिलहाल दोनों अपना अपना काम पहले की तरह करते रहें, क्योंकि देश को दोनों की जरूरत है.

तीनों नेताओं के एक साथ बैठकर बातचीत करने का मौका उसी दिन आया जिस दिन गांधीजी की हत्या हो गई. 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी ने दिल्ली में शाम को अपनी प्रार्थना से पहले सरदार पटेल को बातचीत के लिए बुलाया. गांधी ने पटेल को समझाया कि देश के सामने ढेर सारी चुनौतियां हैं और उनका नेहरू के साथ मिलकर काम करना जरूरी है. गांधी ने यह भी कहा कि अगले दिन वह नेहरू को बुलाकर बात करेंगे और हमेशा के लिए ये विवाद खत्म हो जाएगा. लेकिन गांधी, नेहरू और पटेल की ये बैठक कभी नहीं हो सकी. उसी दिन यानी 30 जनवरी 1948 की शाम को प्रार्थना सभा के समय नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर गांधीजी की हत्या कर दी. लेकिन गांधी का बलिदान व्यर्थ नहीं गया. निधन के बाद नेहरू और पटेल बिना किसी मध्यस्थता के एक हो गए.

नेहरू को अपने किस्म का राष्ट्रवादी बताने वालों को यह जानना होगा कि कड़क मिजाज होने के बावजूद पटेल सांप्रदायिकता से नफरत करते थे. साल 1937 में सेंट्रल असेंबली में भाषण देते हुए पटेल ने कहा था- ‘हम 25 करोड़ हिंदुओं की आजादी नहीं, बल्कि 35 करोड़ भारतीयों की आजादी चाहते हैं, जिसमें हिंदू, मुसलमान, सिख और ईसाई सभी हैं.’

1950 में एक सार्वजनिक सभा में बोलते हुए उन्होंने कहा- ‘हम एक धर्मनिरपेक्ष राज्य हैं और अपनी नीतियों व तौर-तरीकों को पाकिस्तान के तौर-तरीकों पर आधारित नहीं कर सकते. हमें देखना चाहिए कि हमारे धर्मनिरपेक्ष विचार और आदर्श व्यवहार में भी उतरें.’

नेहरू और पटेल को एक-दूसरे का दुश्मन बताने वाले शायद यह भी नहीं जानते होंगे कि बीमारी के कारण दिल्ली छोड़ते समय सरदार पटेल ने एनवी गाडगिल का हाथ पकड़कर कहा था- ‘लगता नहीं कि मेरी जिंदगी अब बचेगी, मैं जवाहरलाल को छोड़कर जा रहा हूं, लेकिन तुम कभी उसका हाथ मत छोडऩा.’

पटेलजी उम्र में नेहरूजी से बड़े थे और उन्हें वह तुम कहकर पुकारते थे. जिस तरह का प्रेम और विश्वास उन दोनों में था, वैसा आजाद भारत के इतिहास में कहीं नहीं मिलता. अंतिम वक्त में भी सरदार पटेल ने गाडगिल से हमेशा नेहरू का साथ निभाने का वायदा लिया था, आज सरदार पटेल को नेहरू के विरुद्ध एक अलग ही ध्रुव पर खड़ा करने की कोशिश की जा रही है लेकिन जिस तरह वे एक-दूसरे का सम्मान करते थे, उस तरह आज नहीं दिखता.

2 अक्टूबर 1950 को इंदौर में एक महिला केन्द्र का उद्घाटन करने गए सरदार पटेल ने कहा था कि चूंकि महात्मा अब हमारे बीच नहीं हैं, नेहरू ही हमारे नेता हैं. बापू ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था और इसकी घोषणा भी की थी. अब यह बापू के सिपाहियों का कर्तव्य है कि वे उनके निर्देशों का पालन करें. मैं जिस स्थान पर हूं, उसके बारे में मुझे कभी विचार भी नहीं आया. मैं तो बस इतना जानता हूं कि उन्होंने मुझे जहां रखा है, मैं वहीं हूं.'

ऐसे में दोनों नेताओं को एक-दूसरे से बड़ा साबित करने की कोशिश का सकारात्मक उद्देश्य समझ से परे है. नेहरू और पटेल को लेकर यह बहस दोनों नेताओं के योगदान व आपसी संबंधों को गलत तरीके से परिभाषित करने के कारण जन्म ले रही है. इस बहस से जुड़े लोगों को राजसी फायदा होने की कुछ उम्मीद तो हो सकती लेकिन मूल मुद्दा जनता का ध्यान भटकाने का नज़र आता है. “पटेल’ राजनीति के बीच सरदार को “हथियार” बनाने की ताक में बैठे नेताओं की नज़र गुजरात के वोट बैंक पर है.

लेकिन इस वोट बैंक पर नज़र गड़ाए बैठे मौजूदा दौर के नेताओं को नहीं मालूम कि बारडोली और खेड़ा सत्याग्रह में अहिंसा के अनूठे प्रयोग से मुक्ति संग्राम को नया मुकाम देने वाले पटेल ने दांडीयात्रा के संदेश को जन जन तक पहुंचाकर गांधी का दिल जीता तो स्थानीय महिलाओं ने उन्हें सरदार बना दिया था. लेकिन भारतीयता और स्वदेशी के आधार पर आंदोलन चलाने वाले महात्मा गांधी ने देश की बागडोर संभालने के लिए जवाहरलाल नेहरू के नाम पर वीटो कर दिया. इंग्लैंड से पढ़े नेहरू पटेल के मुकाबले ज्यादा मॉडर्न और प्रगतिशील नज़र आते थे.

यही नहीं अप्रैल 1946 में जब अंग्रेज सत्ता भारतीयों को हस्तांतरित करने का मन बना चुकी थीऔर तब कांग्रेस का अध्यक्ष चुने जाने का मतलब प्रधानमंत्री चुनना था. कांग्रेस के बड़े नेताओं के जेल में होने के चलते लंबे समय से अबुल कलाम आजाद अध्यक्ष पद पर जमे थे और उनके भीतर भी प्रधानमंत्री बनने की महात्वाकांक्षा हिलोरें मार रही थी. लेकिन बतौर कांग्रेस अध्यक्ष सुभाषचंद्रबोस की जीत के बाद से गांधीजी संगठन पर पकड़ को लेकर आश्वस्त नहीं थे. कहते हैं महात्मा गांधी इस पद पर हर हाल में अपने चहेते को ही बिठाना चाहते थे.

यही वजह है कि जब प्रधानमंत्री पद के लिए कांग्रेस की 15 राज्य इकाइयों में से 12 ने सरदार के नाम का प्रस्ताव रखा तो महात्मा गांधी हतप्रभ रह गए. सरदार गांधी के बहुत प्रिय थे लेकिन नेहरू के लिए उनका मोह इतना ज्यादा था कि वो संगठन के संविधान और उसूलों को भी ताक पर रखने से नहीं चूके. नेहरू के पक्ष में एक भी राज्य का वोट न होने के बावजूद गांधी, नेहरू को अध्यक्ष बनाने की जिद पर अड़ गए. आख़िरकार कांग्रेस के संविधान की धज्जियां उड़ाते हुए नेहरू के  हाथ देश की बागडोर सौंप कर ही बापू ने दम लिया.

नेहरू के मुकाबले गांधीजी सरदार पटेल को कट्टरपंथी मानते थे. गांधीजी को लगता था आगे चलकर सरदार पटेल के कट्टरपंथी दृष्टिकोण के मुकाबले नेहरू की नरम और लचीली नीति भारत के लिए ज्यादा सफल साबित हो सकेगी. पर छुपा हुआ सत्य यह भी था कि गांधीजी की मर्जी के खिलाफ एक बार सुभाषचन्द्र बोस के कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने के बाद से गांधीजी कांग्रेस पार्टी पर अपनी पकड़ को लेकर आश्वस्त नहीं थे.

बौद्धिक और सांस्कृतिक तौर पर नेहरू और पटेल अलग अलग दुनिया के लोग थे. सरदार कड़क थे, खांटी भारतीय थे तो नेहरू युवावस्था से ही खुद को अंतरराष्ट्रीय नागरिक के तौर पर देखते थे. आधुनिक और प्रगतिशील नेहरू जेबी कृपलानी को देश का पहला राष्ट्रपति बनाना चाहते लेकिन सरदार पटेल डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के नाम पर अड़ गए. आखिरकार नेहरू के न चाहते हुए भी राजेंद्र प्रसाद देश के पहले राष्ट्रपति बनने में कामयाब हुए. कांग्रेस के भीतर चल रहे शीतयुद्ध में ये नेहरू की करारी हार देखी गई थी.

इसमें कोई दो राय नहीं कि दोनों की सोच और तौर-तरीकों में बहुत अंतर था. आजादी से पहले सरदार पटेल ने रियासतों के एकीकरण के लिए पूरी ताकत झोंक दी. पटेल छोटी-छोटी रियासतों को एक मजबूत डोर से जोड़ने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन नेहरू देशवासियों पर बल प्रयोग के खिलाफ थे. सरदार पटेल कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाने के खिलाफ थे लेकिन नरमदिल नेहरू कश्मीरियों से सहानुभूति नहीं छोड़ सके. चीन के मसले पर दोनों के बीच मतभेद साफ थे. पटेल ने नेहरू को इस मामले में भी आगाह किया था. लेकिन दुनिया में अमन का झंडा फहराने के ख्वाहा नेहरू चीन से होने वाले खतरे को काल्पनिक मान बैठे थे. नेहरू ये सोच नहीं पाए कि हिंदी चीनी भाई भाई का नारा दगाबाजी का प्रतीक बन जाएगा.

नेहरू और पटेल के बीच के मतभेद वैसे ही थे जैसे किन्हीं दो बुद्धिजीवियों के बीच होते हैं. विचारों का ये द्वंद्व दुश्मनी का सूचक नहीं वरन सकारात्मक विचारों की निशानी था. लेकिन वैचारिक विरोध के बावजूद परस्पर सम्मान से भरी दो बड़े नेताओं की राजनीति उन आलोचकों की समझ में कभी नहीं आ सकती जिनका राष्ट्रवाद वोट बैंक की चिंता में डूबा हो. इसलिए पटेलों की पंचायत लगाकर जाति की सीढ़ी के सहारे विधानसभा की जंग का हथियार पटेल को न बनाएं.

(डॉ. मीना शर्मा Zee News में एंकर हैं.) 
(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)