International Mens Day: हां, मर्द को भी दर्द होता है

हर साल 19 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस मनाया जाता है. इसकी शुरूआत 1999 में हुई थी.

International Mens Day: हां, मर्द को भी दर्द होता है
प्रतीकात्मक फोटो

19 नवंबर को दुनियाभर में 'अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस' मनाया जाता है. हमसे से अधिकांश लोगों के इसके बारे में जानकारी भी नहीं होगी. कुछ देर पहले तक तो मुझे भी नहीं थी. चलो जानकार अच्छा लगा कि एक दिन तो हम पुरुषों के लिए भी तय है, जैसा कि समाज के अन्य सभी वर्गों के लिए होता है. हालांकि ज्यादातर लोगों का तर्क है कि जब समाज और ये दुनिया है पुरुष प्रधान है तो फिर उनके लिए किसी दिन विशेष का कोई महत्व नहीं रह जाता. खूब तलाशा, लेकिन कोई पुख्ता सा जवाब नहीं मिला, हालांकि मन में ये सवाल लगातार कुलबुला रहा था कि इस समाज से सबसे ज्यादा प्रताड़ित तो बेचारा आदमी ही है, अगर एक दिन उसे अपने पुरुष होने पर घमंड करने का मौका (झूठा ही सही) मिल भी रहा है तो हर्ज क्या है. 

आखिरकार जवाब की तलाश में हम श्रीमती जी की शरणागत हुए और अपने ज्ञान की पोटली खोलते हुए कहा, तुम्हें पता है महिला दिवस की तरह पुरुष दिवस भी मनाया जाता है, हर साल 19 नवंबर को कई देशों में इस दौरान बड़े-बड़े आयोजन किए जाते हैं. इस दिन को मनाने की शुरूआत 1999 में त्रिनिदाद एवं टोबागो से हुई थी. मौका पाते ही सवाल भी उछाल दिया, क्या पुरुष दिवस मनाना चाहिए..?

इस पर हमारी श्रीमती जी हमसे मुखातिब हुई बोली, 'हां, क्यों नहीं, सच में महिलाओं से ज्यादा पुरुषों को दिवस मनाने की ज्यादा जरूरत है.' उनका तर्क था, बेचारे पुरुष, हम महिलाएं तो अपने पति से रोकर-झगड़कर अपनी जिद पूरी करवा ही लेती हैं, पुरुष तो रो भी नहीं सकते, क्योंकि वे 'मर्द' जो ठहरे और 'मर्द को दर्द' भला कहां होता है..?

हमने फरमाया, मजाक नहीं, सही में बताओ कि क्या वाकई 'पुरुष दिवस' मनाने की जरुरत है. इस पर श्रीमती जी ने गंभीरता का लबादा ओढ़े हुए कहा, 'तुम्हें पता है ना कि मैं मजाक नहीं करती.' फिर उन्होंने कहा, हकीकत में पुरुष एक समय में कई रोल अदा कर रहा होता है, ये बात सही है कि एक महिला भी मां, पत्नी, दोस्त आदि का रोल निभाती है, मगर एक छत के नीचे. पुरुष को तो अपने घर में पत्नी, बच्चों की जिम्मेदारी के साथ-साथ अपने बुजुर्ग हो रहे अपने मां-बाप, सामाजिक रिश्तों को निभाने के लिए भाई-बहन समेत अन्य रिश्तेदारों तथा दोस्तों के साथ संबंधों को लगातार सुधारते हुए काम करना होता है. वे बताती हैं कि परिवार समेत समाज की उम्मीदों में खरा उतरना पुरुषों के लिए नाकों चने चबाने के बराबर है. इस बात को उन्होंने 'राभा जनजाति' का उदारण देकर समझाया.

महिला प्रधान राभा जनजाति: राभा पश्चिम बंगाल तथा असम में रहने वाली एक जनजाति है. ये लोग जिस भाषा का प्रयोग करते हैं उसे भी 'राभा' ही कहा जाता है. यह जनजाति मातृसत्तात्मक है. यानी परिवार की मुखिया मां होती है, ना कि हमारे घरों की तरह पिता. बेटियों को ही मां की संपत्ति से हिस्सा मिलता है. और यहां शादी में विदा होकर बेटी नहीं जाती, बल्कि लड़के विदा होकर लड़की के घर रहने आते हैं. यानी घर जमाई की यहां परंपरा है. यह नियम प्रेम विवाह में भी लागू होता है. खास बात यह है कि घर जमाई के साथ यहां बिल्कुल ऐसा ही व्यवहार होता है जैसा कि हमारे यहां आम घरों में किसी बहु के साथ. घर जमाई को घर के काम करने के साथ-साथ सास और पत्नी के ताने भी सुनने को मिलते हैं. महिलाओं का कहना है कि चूंकि वे घर संभालती हैं इसलिए घर की मालिकन वे खुद हैं ना कि पुरुष.

पत्नी की गुलामी नहीं करेंगे: घर जमाइयों पर होने वाले अत्याचार का आलम यह है कि यहां के लोगों ने अपनी सास और पत्नियों के खिलाफ मोर्चा ही खोल दिया. दरअसल, राभा मर्दों को घर जमाई बनने की परंपरा अब रास नहीं आ रही है. लड़के इस रिवाज के खिलाफ बोलने लगे हैं. कुछ लोगों ने तो समाज से नाता तोड़कर अन्य शहरों की तरफ रुख कर लिया है. यहां रह रहे युवकों ने तो बकायदा एक समिति बनाकर इस रिवाज के खिलाफ बोलना शुरू कर दिया है. 
उधर, महिलाओं ने साफ चेतावनी दी है कि अगर पुरुष ऐसी मांग करते हैं तो उन्हें वे सब काम करने होंगे जो एक घर में महिलाएं करती हैं. यानी घर के झाड़ूं-पौछा से लेकर बच्चे संभालने तक सारी जिम्मेदारी उठानी होंगी. और महिलाएं घरों से बाहर जाकर काम करेंगी. हालांकि कुछ लड़कों ने शादी के बाद सुसराल ना जाकर अपनी दुल्हन के साथ घर आने की कोशिश भी की थी, लेकिन समाज की अन्य महिलाओं के विरोध के चलते उन्हें वापस सुसराल की शरण लेनी पड़ी. 

श्रीमती जी के पास जानकारी का अथाह भंडार था,  उन्होंने एक और पिटारा खोला और मेरी तरफ सरका दिया. इसमें पुरुष उत्पीड़न से जुड़े मामले थे.

पुरुष उत्पीड़न के खिलाफ SIF ऐप: सेव इंडिया फ़ैमिली फ़ाउंडेशन ने सिफ ऐप को तैयार किया है. फाउंडेशन का कहना है कि घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न के अधिकांश मामले झूठे होते हैं, अब कोर्ट ने भी इस तरह के मामलों की पहले सही से जांच के आदेश दिए हैं, ऐसे मामले को झेल रहे पुरुषों के लिए ये ऐप जारी किया गया है. खास बात यह है कि इस ऐप से लगातार लोग जुड़ रहे हैं. 

महिला हेल्प लाइन में पुरुष ज्यादा: उत्तराखंड के रुद्रपुर जिले में महिला हेल्पलाइन नंबर पर शिकायद दर्ज कराने वालों में पुरुष ज्यादा हैं. इस हेल्प लाइन में साल भर में करीब एक हजार मामले आए, जिसमें से 546 मामले पुरुष उत्पीड़न के हैं. पारिवारिक न्यायालय में जहां तलाक के 158 मुकदमे विचाराधीन हैं, उसमें से 117 पुरुषों ने तलाक के लिए वाद दायर किया. 2015 में मानवाधिकार आयोग को महिला उत्पीड़न की 17,479 शिकायतें दर्ज हुई थीं, जिनमें उन्होंने 14,800 मामले निस्तारित किए. क्योंकि निरस्त मामलों में आरोप झूठे थे. 

एक के बाद एक दलील उछाल कर श्रीमती जी ने सवाल किया क्यों, अब बताओ कि 'पुरुष दिवस' मानने की जरूरत है या नहीं, क्या मर्द को दर्द नहीं होता..?