मध्‍य प्रदेश एवं छत्‍तीसगढ़ चुनाव : बीजेपी के घर 'फूट' के बाद भी क्‍यों घबराए हैं विपक्षी दल?

विपक्षी दलों को यह भी पता है कि बीजेपी से नाराज सवर्णों का वोट उन्‍हें मिल भी जाता है, तब भी अनसूचित जाति और जनजाति के समर्थन के बिना सत्‍ता की दहलीज पार करना मुश्किल है.

मध्‍य प्रदेश एवं छत्‍तीसगढ़ चुनाव : बीजेपी के घर 'फूट' के बाद भी क्‍यों घबराए हैं विपक्षी दल?
बीजेपी के प्रदेश अध्‍यक्ष राकेश सिंह अभी भी यही कह रहे हैं कि हमे सर्व समाज को लेकर आगे चलना होगा. (फाइल फोटो)
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नई दिल्‍ली: सवर्णों को लेकर माना जाता है कि वह भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का पक्‍का वोट बैंक है. एससी-एसटी एक्‍ट में संशोधन बिल से नाराज सवर्ण अब बीजेपी की खिलाफत पर उतर गए हैं. जिसकी बानगी गुरुवार को भारत बंद के रूप में देखने को मिली है. बंद के दौरान मध्‍य प्रदेश में कई जगह बीजेपी के पदाधिकारियों का घेराव कर काले झंडे दिखाए गए. विपक्षी दल सवर्णों की इस खिलाफत को बीजेपी के घर में बड़ी फूट के तौर पर देख रहे हैं. 

इस सब के बीच, हैरान करने वाली बात यह है कि कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दल बीजेपी के घर पड़ी इस फूट का फायदा उठाने की बजाए बेहद सधी हुई प्रतिक्रिया दे रहे हैं. इतना ही नहीं, इस मुद्दे पर बात करते समय कांग्रेस सहित अन्‍य विपक्षी दलों में एक डर नजर आ रहा है. दरअसल, यह डर मध्‍य प्रदेश और छत्‍तीसगढ़ के अनसूचित जात‍ि और जनजाति को लेकर है. विपक्षी दलों को डर है कि कहीं बीजेपी सवर्णों की नाराजगी का इस्‍तेमाल अनसूचित जाति और जनजाति को अपने पक्ष में लाने के लिए न कर ले. 

MP GRF

मध्‍य प्रदेश-छत्‍तीसगढ़ की 76 सीटों पर है सभी राजनैतिक दलों की नजर
सवर्णों की नाराजगी के बावजूद विपक्षी दलों की नाराजगी की बड़ी वजह मध्‍य प्रदेश और छत्‍तीसगढ़ की 76 विधानसभा सीटें हैं. दरअसल, मध्‍य प्रदेश की 230 सीटों में 47 विधानसभा और छत्‍तीसगढ़ की 90 सीटों में 29 सीटें आदिवासी बाहुल्‍य हैं. मध्‍य प्रदेश में आदिवासियों के दबदबे वाली 47 सीटों की बात करें तो इनमें 2003 तक कांग्रेस का बोलबाला था. 

2003 के विधानसभा के चुनावों में समीकरण बदल गए और बीजेपी ने आदिवासी बाहुल्‍य वाली अधिकांश सीटों पर जीत दर्ज की. बीजेपी का यह विजय अभियान 2008 और 2013 के विधानसभा चुनावों में भी जारी रहा. बीते चुनावों में आदिवासी बाहुल्‍य 47 सीटों में 32 सीटें बीजेपी और 15 सीटें कांग्रेस के पाले में गईं थी. वहीं छत्‍तीसगढ़ में स्थिति मध्‍य प्रदेश के उलट है. 

छत्‍तीसगढ़ विधानसभा चुनाव 2013 की बात करें तो आदिवासी बाहुल्‍य वाली इन सीटों पर कांग्रेस अपना दबदबा बनाने में कामयाब रही थी. कांग्रेस इस इलाके की 29 सीटों में से 18 सीटें जीतने में कामयाब रही थी. वहीं बीजेपी ने इस इलाके से 11 विधानसभा सीटें जीतीं थीं. 

CH GRF

नाराज सवर्णों के वोट के साथ सत्‍ता की दलहीज तक पहुंचना मुश्किल 
विपक्षी दलों को डर है कि संशोधन बिल के जरिए बीजेपी अनसूचित जाति और जनजाति को पूरी तरह से अपने पक्ष में न कर लें. यदि ऐसा हुआ तो मध्‍य प्रदेश और छत्‍तीसगढ़ में कांग्रेस और बीएसपी का गठजोड़ का प्रभाव खत्‍म होने की संभावना है. वहीं विपक्षी दलों को यह भी पता है कि बीजेपी से नाराज सवर्णों का वोट उन्‍हें मिल भी जाता है, तब भी अनसूचित जाति और जनजाति के समर्थन के बिना सत्‍ता की दहलीज पार करना मुश्किल है. 

यही वजह है कि सवर्णों के आंदोलन पर जी-डिजिटल को प्रतिक्रिया देते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस सांसद कांतिलाल भूरिया आदिवासियों को यही समझाने में लगे हुए हैं कि सवर्णों का आंदोलन बीजेपी की एक साजिश है. इस आंदोलन के जरिए बीजेपी आदिवासियों के खिलाफ षड्यंत्र रच रही है. वहीं बीजेपी के प्रदेश अध्‍यक्ष राकेश सिंह अभी भी यही कह रहे हैं कि हमें सर्व समाज को लेकर आगे चलना होगा. 

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