पोखरण-2 : बुद्ध की मुस्‍कान के 20 बरस

अमेरिकी सैटेलाइट को चकमा देकर किया परमाणु परीक्षण फिर क्लिंटन को चिट्ठी लिखकर वाजपेयी ने बताई वजह...

पोखरण-2 : बुद्ध की मुस्‍कान के 20 बरस

नई दिल्ली: भारत के दूसरे परमाणु परीक्षण को आज पूरे 20 साल हो गए. 11 मई, 1998 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी मीडिया के सामने आए और उन्होंने घोषणा की- आज दोपहर पौने चार बजे भारत ने पोखरण रेंज में तीन भूमिगत परमाणु परीक्षण किए. दो दिन बाद भारत ने दो और परमाणु परीक्षण किए. इस तरह 1974 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में हुए पहले परमाणु परीक्षण के 24 साल बाद भारत एक बार फिर दुनिया को बता रहा था कि शक्ति के बिना शांति संभव नहीं है. इंदिरा गांधी ने परमाणु परीक्षण का कोड 'बुद्ध मुस्कुराए' रखा था, तो अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे 'शक्ति' का नाम दिया.

अमेरिकी जासूसी सैटेलाइट को कैसे दिया था चकमा
पोखरण-2 के बीस साल होने का मतलब यह भी है कि आज इसके बारे में वह नौजवान पीढ़ी भी चर्चा करेगी, जो तब पैदा नहीं हुई थी. अपने स्मार्टफोन के जरिये पूरी दुनिया को मुट्ठी में लेकर चलने वाली इस पीढ़ी को यह जानने में मजा आएगा कि लैंडलाइनफोन के बड़े चोगेवाले उस दौर में कैसे वाजपेयी सरकार, सेना और वैज्ञानिकों की चुनिंदा टोली ने अमेरिकी जासूसी सैटेलाइट्स को छकाकर परमाणु परीक्षण किए थे. परमाणु परीक्षण के तुरंत बाद जो किस्से उस समय अखबारों में छपे थे, उनमें बताया जाता था कि प्रधानमंत्री नरसिंह राव के समय भी परमाणु परीक्षण की तैयारी हो गई थी, लेकिन अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को देखते हुए इसे टाला गया. परमाणु विस्फोट के बाद पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने कहा था, 'यह चीज हमेशा से थी, परीक्षण से इसकी पुष्टि भर हुई है.' गुजराल इशारा कर रहे थे कि भारत के पास परमाणु शक्ति पहले से थी, बस वह उसे उजागर नहीं कर रहा था.

वाजपेयी सरकार को भी अंदाजा था कि अगर परमाणु परीक्षण की भनक भी अमेरिका को लग गई, तो परीक्षण से पहले ही देश पर बहुत तरह के दबाव आ जाएंगे. इसलिए पोखरण में परीक्षण से जुड़े इंजीनियर्स को भी सेना के लिबास में ही भेजा गया, ताकि ऐसा लगे कि सेना की रूटीन कार्रवाई चल रही है. प्रमुख वैज्ञानिकों को सीधे पोखरण नहीं भेजा गया, बल्कि वे पहले दूसरे शहरों में गए. वहां से फिर वे सेना के साए में गुप्त रूप से पोखरण पहुंचे. अमेरिकी जासूसी उपग्रह को छकाया जा सके, इसके लिए भारतीय सेना की 58वीं इंजीनियर रेजीमेंट को यह काम सौंपा गया. यह रेजीमेंट 1995 से ही इस बात में महारत हासिल कर रही थी कि अमेरिकी जासूसी उपग्रह से भारतीय सेना के कामकाज को कैसे छिपाया जाए. रेजीमेंट ने परमाणु परीक्षण की ज्यादातर तैयारियां रात के समय कीं. रात के समय रेजीमेंट काम करती थी और सुबह होते-होते सारा साजो-सामान वापस अपनी जगह पर पहुंच जाता था, ताकि ऐसा लगे कि सामान वहां से कभी हिला भी नहीं.

1998 में परमाणु परीक्षण क्यों थे जरूरी
यह वह समय था जब दुनिया में सीटीबीटी यानी परमाणु अप्रसार संधि को लेकर चर्चाएं जोरों पर थीं. देश के प्रमुख परमाणु वैज्ञानिक अनिल काकोडकर के मुताबिक वह समय भारत के लिए फैसले की घड़ी थी. अगर भारत बिना परमाणु शक्ति बने सीटीबीटी पर दस्तखत कर देता, तो फिर उसे परमाणु परीक्षण करने का मौका कभी नहीं मिलता. और अगर भारत दस्तखत करने से मना करता तो उससे पूछा जाता कि वह परमाणु हथियारों पर पाबंदी से मुंह क्यों छुपा रहा है. यानी भारत का परमाणु शक्ति बनने का वह रणनीतिक सपना कभी पूरा नहीं हो पाता, जिसे देश के परमाणु कार्यक्रम के जनक डॉ. होमी जहांगीर भाभा ने आजादी से कहीं पहले 1944 में केवल देखा ही नहीं था, बल्कि इसके लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को मना भी लिया था.

भाभा का सपना वहीं नहीं रुका. पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन ने अपनी किताब 'इनसाइड द मेकिंग ऑफ इंडियाज फॉरेन पॉलिसी' में एक वाकये का जिक्र किया है, '80 के दशक में एटॉमिक एनर्जी कमीशन के चेयरमैन राजा रमन्ना और सेनाध्यक्ष कृष्णास्वामी सुंदरजी में अक्सर यह चर्चा होती थी कि भारत में परमाणु हथियारों का भविष्य कैसा हो. जनरल सुंदरजी को यह बात अच्छी लगती थी कि अगर भारत परमाणु हथियार बना ले, तो चीन की सैनिक धौंस का तोड़ मिल जाएगा. वहीं रमन्ना का मानना था कि बम बनाना इसलिए जरूरी है ताकि इसे कभी इस्तेमाल करने की जरूरत ही नहीं पड़े. उसके होने भर से भारत को वह राजनैतिक और सैनिक लक्ष्य मिल जाएगा, जिसकी उसे जरूरत है.' और वाजपेयी सरकार ने नपातुला जोखिम लेते हुए इस कमी को पूरा कर दिया. लेकिन वाजपेयी को पता था कि आगे क्या होने वाला है.

वाजपेयी ने लिखा क्लिंटन को पत्र
वाजपेयी विदेश नीति के मंझे हुए खिलाड़ी थे. तभी तो विपक्ष की मामूली शक्ति होने के बावजूद नेहरूजी ने युवा अटल को संयुक्त राष्ट्र को संबोधित करने भेजा था. और बांग्लादेश निर्माण के बाद वाजपेयी ने इंदिरा गांधी को दुर्गा कहा था. परमाणु परीक्षण के तुरंत बाद वाजपेयी ने अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को पत्र लिखा, 'पिछले कई साल से भारत के इर्द-गिर्द सुरक्षा संबंधी माहौल और खासकर परमाणु सुरक्षा से जुड़े माहौल के लगातार बिगड़ने से मैं चिंतित हूं. हमारी सीमा पर एक आक्रामक परमाणु शक्ति संपन्न देश है. एक ऐसा देश जिसने 1962 में भारत पर हमला कर दिया था. हालांकि उस देश के साथ पिछले एक दशक में भारत के संबंध सुधर गए हैं, लेकिन अविश्वास की स्थिति बनी हुई है, इसकी मुख्य वजह अनसुलझा सीमा विवाद है.' भारत के खिलाफ अमेरिका प्रतिबंध न लगाए इसका इशारा करते हुए वाजपेयी ने क्लिंटन को लिखा था, 'हम आपके देश के साथ हमारे देश के मैत्री और सहयोग की कद्र करते हैं. मुझे लगता है कि भारत की सुरक्षा के प्रति हमारी चिंता को आप समझ पाएंगे.' लेकिन अमेरिका वही सोच रहा था, जिसका अंदेशा पहले से ही था.

अमेरिका ने लगाए प्रतिबंध
अमेरिका किस तरफ सोच रहा है इसका पहला अंदाजा तो 12 मई 1998 को न्यूयार्क टाइम्स में छपी खबर से मिल गया. खबर में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को हिंदू राष्ट्रवादी बताया गया. अखबार ने लिखा, 'परीक्षण और उसके बाद मिसाइलों को परमाणु हथियारों से लैस करने के इरादे को देखते हुए यह लगभग तय है कि अमेरिकी कानूनों के तहत भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाएंगे. चीन के साथ भारत का तनाव बढ़ेगा ही, क्योंकि वह पहले से ही परमाणु शक्ति संपन्न देश है.' जल्द ही अमेरिका ने भारत पर प्रतिबंध लगाए. रूस और फ्रांस को छोड़कर बाकी प्रमुख देशों ने भी भारत प्रतिबंध लगाए. हालांकि काकोडकर ने एक इंटरव्यू में कहा कि प्रतिबंध लगाने वाले कुछ देशों ने भी गैरआधिकारिक चैनलों से भारत को परमाणु परीक्षण की बधाई दी थी.

20 साल बाद क्या रहा नफा-नुकसान
भारत के परमाणु परीक्षणों के तुरंत बाद पहली चीज तो यह हुई कि भारत के पांच परमाणु परीक्षणों का जवाब पाकिस्तान ने तत्काल सात परमाणु परीक्षणों से दिया. लेकिन तकनीक और दूसरी तरह के प्रतिबंधों के मामले में भारत ने एक दशक के भीतर अपनी हैसियत सुधार ली. मनमोहन सिंह के पहले कार्यकाल में अमेरिका के साथ हुए असैनिक परमाणु समझौते के बाद दुनिया के साथ भारत का परमाणु हुक्का-पानी फिर से चालू हो गया. 'इंडियास न्यूक्लियर वैपन' किताब के अमेरिकी लेखक जॉर्ज परकोविच ने अपने एक लेख में लिखा कि वाजपेयीजी के दो मकसद थे.

पहला परमाणु शक्ति बनने के बाद भारत को यूएन सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट दिलाना और दूसरा भारत में परमाणु ऊर्जा का असैनिक इस्तेमाल बढ़ाकर ऊर्जा संकट खत्म करना. पहला काम अब तक पूरा नहीं हुआ है. वाजपेयीजी की तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार अपने विदेश दौरों के जरिए इस काम में लगे हुए हैं. जहां तक दूसरे काम का सवाल है तो 2008 में भारत को न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप से रियायतें मिलने के बाद भारतीय अधिकारियों का आकलन था कि भारत 2020 तक 40,000 मेगावाट न्यूक्लियर पावर का उत्पादन करने लगेगा. हालांकि भारत में इस समय 6780 मेगावाट ही एटॉमिक एनर्जी पैदा करने की क्षमता है. चीन हमारी तुलना में 34500 मेगावाट परमाणु बिजली क्षमता रखता है.

जिस तरह देश पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों से ही जरूरत से ज्यादा बिजली उत्पादन करने लगा है, ऐसे में परमाणु ऊर्जा पर असल में कितना ध्यान दिया जाएगा और इसकी कितनी जरूरत रह जाएगी, यह चिंतन का विषय होगा. लेकिन बीस साल पहले हुए पोखरण परीक्षण ने देश में सुरक्षा का बोध तो दिया ही है. परकोविच कहते हैं, 'परमाणु विस्फोट ने इतना तो किया ही कि चीन परमाणु युद्ध की कीमत पर भारत में कोई बड़ा हमला करने से कतराता है.'