विचार के लिए एक मुद्दा दे गई सुप्रीम कोर्ट के जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस

लोकतंत्र के चार खंभों में एक न्यायपालिका ही बची थी जिस पर खुलेआम आरोप नहीं लगते थे. वैसे गाहेबगाहे न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं. 

Suvigya Jain सुविज्ञा जैन | Updated: Jan 13, 2018, 05:23 PM IST
विचार के लिए एक मुद्दा दे गई सुप्रीम कोर्ट के जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस

सुप्रीम कोर्ट के चार जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद देश में सनसनी फैल गई. सनसनी क्यों न फैलती क्योंकि लोकतंत्र के चार खंभों में एक न्यायपालिका ही बची थी जिस पर खुलेआम आरोप नहीं लगते थे. वैसे गाहेबगाहे न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं. लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ था कि खुद सुप्रीम कोर्ट के ही चार जजों ने देश की सर्वोच्च न्यायालय में सबकुछ ठीक नहीं चलने की बात कह दी. मसला सनसनीखेज इसलिए भी है. सुप्रीम कोर्ट के कामकाज पर एतराज खुद उन जजों ने उठाया है जो उस कोलोजियम के सदस्य हैं जिसे एक तरह की सर्वोच्च संस्था माना जाता है. मसला बहुत ही जटिल इसलिए है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के ऊपर हमारे पास कोई भी सस्था उपलब्ध नहीं है.

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मामला लोकतंत्र पर खतरे के अंदेशे के साथ आया है. शायद इसीलिए आरोप या एतराज जताने वाले जजों ने महाभियोग चलाने के सवाल पर यह कहा कि लोकतंत्र में यह फैसला जनता ही कर सकती हैै. अब मुश्किल यह है कि दुनिया में सबसे बड़े लोकतंत्र की जनता इस मसले पर कुछ कहना चाहे तो कैसे कहे? यानी वह कौन सा तरीका हो कि यह पता चल सके कि जनता क्या चाहती है.

आखिर इस मसले की कौन कर सकता है सुनवाई 
ऐसे मामले में सुनवाई का प्रबंध हमने पहले से करके नहीं रखा है. क्योंकि ऐसा कभी सोचा ही नहीं गया कि अगर मुख्य न्यायाधीश पर ही आक्षेप होने लगें तो उसकी अदालती सुनवाई कौन करेगा. हां महाभियोग का उपाय जरूर है, लेकिन इस सवाल पर चारों जजों ने साफ कह दिया है कि वे इसकी शुरूआत अपनी तरफ से नहीं करना चाहते.

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उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में यह फैसला जनता पर ही छोड़ा जाना चाहिए. जनता का कोई व्यावहारिक और संस्थागत रूप हमने अब तक बनाया नहीं है. पचास साल पहले जब लोकपाल की बात सोची गई थी तब जरूर न्यायपाल यानी लोक न्यायपाल का विचार आया था. आज इस तरह की पेचीदगी के बाद हो सकता है कि न्यायपाल बनाने की बात जोर पकड़ जाए.

क्या सर्वोच्च न्यायालय का स्वतः संज्ञान मान सकते हैं प्रेस कॉन्फ्रेंस को
बेशक कईबार अदालतें यानी न्यायाधीश किसी मामले में स्वतः संज्ञान (Suo moto cognizance) लेते हैं. स्वतः संज्ञान यानी जो न्यायाधीश खुद देख रहे हों उसके लिए वे इंतजार नहीं करते कि कोई फरियाद लेकर आए. इस तरह यह मसला स्वतः संज्ञान जैसा दिखता जरूर है लेकिन इसमें एक बड़ी कमी यह है कि यह संज्ञान अदालत के कमरे से बाहर आकर लिया गया है. फिर भी इसकी अहमियत स्वतः संज्ञान जैसी ही मानी जाएगी. इस आधार पर कहा जा सकता है कि आगे की कार्रवाई के लिए सर्वाेच्च न्यायालय औपचारिक तौर पर भी संज्ञान ले सकता है. लेकिन दिक्कत यह है कि प्रेस काॅन्फ्रेंस का संज्ञान खुद मुख्य न्यायाधीश ही ले सकते हैं. वैसी परिस्थिति में फिर एक दिक्कत खड़ी होगी कि प्रतिवादी कौन होगा? क्योंकि सुनवाई करते समय वे खुद प्रतिवादी नहीं हो सकते. बहरहाल यह अभूतपूर्व परिस्थिति है सो ऐसे मामलों में अपराधिक न्याय प्रणाली के अकादमिक विशेषज्ञों की जरूरत पड़ जाती है.

क्या देश में उपलब्ध हैं अकादमिक विशेषज्ञ
संविधान विशेषज्ञ यह काम नहीं कर सकते क्योंकि उनका काम संविधान के प्रावधानों की व्याख्या करने भर का होता है. हां, वे कोई नया प्रावधान सुझा सकते हैं. यानी वे सिर्फ प्रस्ताव रख सकते हैं. उसे मानने या न मानने का फैसला विधायिका का होता है. लोकतंत्र में विधायिका को भी विचार विमर्श के लिए विद्वानों की मदद की जरूरत पड़ती है. वैसे भी यह मसला न्याय दर्शन का ज्यादा बनता है. अपने देश में न्याय का दर्शन खासतौर पर दंड का दर्शन जिस अकादमिक विषय में पढ़ाया जाता है उसे अपराधशास्त्र कहते हैं. लेकिन अपराधशास्त्र में उच्च अध्ययन करने वालों का अपने देश में ऐसा टोटा पड़ा हुआ है कि ढूंढने निकलेंगे तो ढूंढते ही रहे जाएंगे.

(लेखिका, प्रबंधन प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ और सोशल ऑन्त्रेप्रेनोर हैं)
(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं)