राजस्थान : विधानसभा चुनावों का 'ट्रेलर' होगा इन 3 सीटों का उपचुनाव

तीन सीटों 29 जनवरी को होने जा रहे उपचुनावों में कांग्रेस राज्य में वापसी का एक मौका तलाश रही है. साथ ही बीजेपी के लिए ये चुनाव आने वाले विधानसभा चुनावों का एक ट्रेलर साबित होंगे.

राजस्थान : विधानसभा चुनावों का 'ट्रेलर' होगा इन 3 सीटों का उपचुनाव
राजस्थान की दो लोकसभा और एक विधानसभा सीट पर 29 को वोटिंग होगी

जयपुर (आदर्श झा) :  राजस्थान में 1993 के बाद बीजेपी और कांग्रेस, दोनों ही पार्टियों की सरकारें बारी-बारी से रहीं हैं. लेकिन इस बार राजस्थान बीजेपी आने वाले विधानसभा चुनाव में भी अपनी जीत को दोहराने के दावे लगातार कर रही है तो दूसरी तरफ कांग्रेस राज्य सरकार को बस कुछ महीनों का मेहमान बताते नहीं थक रही है. इसलिए इन उपचुनावों के परिणाम दोनों ही पार्टियों के लिए बहुत अहम हो जाते हैं. 

29 को होगा मतदान
राजस्थान में अजमेर और अलवर की दो लोकसभा सीट के साथ भीलवाड़ा जिले की मांडलगढ़ मांडलगढ़ की एक विधानसभा सीट पर 29 तारीख को मतदान होना है. चुनाव प्रचार खत्म होने के साथ ही दोनों पार्टियां के आगे सबसे बड़ी चुनौती परिणाम की होगी. वो इसलिए क्योंकि अगले कुछ महीनों में राज्य में विधानसभा के चुनाव होने हैं. बीजेपी और कांग्रेस, दोनों ही पार्टियां जानती हैं कि इन तीन सीटों के चुनाव परिणामों के साथ आने वाले विधानसभा चुनावों का खाका तैयार हो जाएगा. 

सांसदों के निधन से खाली हुई सीटें
महंत चांदनाथ और सांवरलाल जाट के निधन के बाद अलवर और अजमेर लोकसभा सीटों रिक्त हो गई थीं. अलवर से बीजेपी ने डॉक्टर जसवंत सिंह यादव को अपना उम्मीदवार बनाया है. जसवंत अभी राज्य की वसुंधरा राजे सरकार में श्रम मंत्री की जिम्मेदारी निभा रहे हैं. कांग्रेस ने यहां से डॉक्टर करण सिंह यादव को उतारा है. अजमेर सीट पर बीजेपी ने सांवरलाल जाट के बेटे रामस्वरूप लांबा को मैदान में उतारा है. कांग्रेस ने लांबा के खिलाफ रघु शर्मा को टिकट दिया है. मांडलगढ़ विधानसभा सीट विधायक कीर्ति कुमारी के निधन से खाली हुई थी. 

कांग्रेस के लिए संजीवनी हो सकते हैं चुनाव
पिछले कई चुनावों से अलग-अलग राज्यों में हार का सामना कर चुकी कांग्रेस के लिए ये तीन सीटें राजस्थान में पार्टी के लिए संजीवनी साबित हो सकती हैं. उधर, मुख्यंत्री वसुंधरा राजे भी ये जानती हैं कि इन तीन सीटों को जीतकर ही वह कांग्रेस का मनोबल विधानसभा चुनाव के ठीक पहले तोड़ सकती हैं और अपनी पार्टी के भीतर भी अगले चुनाव के नेतृत्व की दावेदारी पूरे दमखम के साथ ठोक सकती हैं. क्योंकि दबी जुबान में कई बार राजस्थान बीजेपी के अंदर नतृत्व परिवर्तन की आवाजें उठ चुकी हैं. और इनको चुप कराने का इससे अच्छा मौका और कोई नही हो सकता.

कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ नहीं
एक तरफ कांग्रेस के पास जहां इस उपचुनाव में केवल पाने के लिए है, खोने के लिए कुछ भी नहीं. वहीं मुख्यमत्री वसुंधरा राजे के सामने सबसे बड़ा सवाल साख का है. पार्टी ने मुख्यमंत्री की पंसद के सभी उम्मीदवारों को टिकट देकर ये जता दिया था की पार्टी उन पर पूरा भरोसा कर रही है. सवाल ये भी है कि एक तरफ कांग्रेस ने जहां उपचुनाव में प्रचार के लिए केवल राजस्थान से जुडें नेताओं के नाम तय किए थे, वहीं बाजेपी ने अपनी लिस्ट में राजस्थान से जुड़े नेताओं से साथ ही केंद्र के कई नेताओं के नाम भी डाले थे. इनमें पीएम नरेंद्र मोदी के साथ बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह सहित नितिन गड़करी के नाम भी थे. लेकिनचुनाव प्रचार कोई भी नही पहुंचा.

चुनाव प्रचार अब खत्म हो चुका है. दोनों ही पार्टियां जीत का दावा कर रहीं हैं, लेकिन इस उपचुनाव के साथ ही जनता विधानसभा चुनावों के ठीक पहले दोनों पार्टियों को आगे का ट्रेलर दिखा कर विधानसभा चुनावों की दशा और दिशा काफी हद तक तय कर देगी.

असर दिखाएगा 'पद्मावती' विवाद?
उधर, राजनीति के जानकार बताते हैं कि इन चुनावों में फिल्म पद्मावत का विवाद सत्तारूढ़ पार्टी के लिए कुछ असर दिखा सकता है. फिल्म पद्मावत के खिलाफ राजस्थान के राजपूतों ने विरोध किया था और उनका विरोध अब तक जारी है. 

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