बांसवाड़ा: कम मांग के कारण हाशिए पर धनुष बाण बनाने वाला तीरगर समाज

करीब दो हजार की आबाजी वाले इस कस्बे में तीरगर समाज की जनसंख्या अधिक है. यहां करीब 50 परिवार आज भी अपने घरों में पुश्तेनी तीर कमान बनाने का काम कर रहे हैं. 

बांसवाड़ा: कम मांग के कारण हाशिए पर धनुष बाण बनाने वाला तीरगर समाज
प्रतीकात्मक तस्वीर

बांसवाड़ा: राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में एक गांव ऐसा है जहां कई सालों से 50 परिवार तीर कमान बनाने का काम कर रहे हैं लेकिन आजतक इन्हें कोई पहचान नहीं मिल पाई है. यह गांव जिला मुख्यालय से 17 किलोमीटर दूर स्थित है और इस गांव का नाम चंदुजी का गढ़ा है. यहां पिछले कई सालों से तीर कमान बनाए जाने का काम किया जा रहे है और धीरे धीरे राष्ट्रीय स्तर पर भी इनकी पहचान तो होने लगी है लेकिन अब भी यहां काम करने वालों की मेहनत के बारे में देश अनजान है. 

करीब दो हजार की आबाजी वाले इस कस्बे में तीरगर समाज की जनसंख्या अधिक है. यहां करीब 50 परिवार आज भी अपने घरों में पुश्तेनी तीर कमान बनाने का काम कर रहे हैं. इन तीर कमान को बनाने के लिए पहले यहां के परिवार उसकी खेती करते हैं और जब लकड़ी अच्छी होती है तो उससे तीर कमान बनाते हैं. पहले यहां 100 से अधिक परिवार यह काम करते थे लेकिन कभी सरकार द्वारा ध्यान न दिए जाने के कारण कई परिवारों ने इस काम को छोड़ दिया. 

इस गांव में अलग अलग प्रकार के तीर कमान बनाए जाते हैं. इसमें सामान्य से लेकर फोलिंग सिस्टम वाले कमान और तीर भी अलग-अलग रेंज के होते हैं. यहा पर बनने वाले तीर मजबुद तेज धार वाले और नुकीले होते हैं. यहां बने तीर सामान्य रूप से मेलों में ही बिकते हैं. जिसमें प्रमुख मेला बेणेश्वर धाम पर लगने वाले मेले में इसकी बिक्री खुब होती है. 

इसके अलावा बांसवाडा, डूंगरपुर, उदयपुर, चित्तोड़गढ़, राजसंमद जेसे जिलो में लगने वाले मेलों में भी इनकी ब्रिकी होती है. हालांकि, अगर सरकार ने इस धंधे की और इन परिवारों के प्रति ध्यान नहीं दिया तो अब ये 50 परिवार भी कुछ समय बाद इन तीर कमानों को बनाना छोड देंगे.