राजस्थान: महंगाई की चपेट में मिट्टी के दीयों का व्यवसाय, इस दिवाली कम हुई मांग

मिट्टी के दीपकों का काम करने वाले कुम्हार परिवारों ने भी मंहगाई व कम मांग के चलते पुश्तैनी व्यवसाय से तौबा करना शुरु कर दिया है.

राजस्थान: महंगाई की चपेट में मिट्टी के दीयों का व्यवसाय, इस दिवाली कम हुई मांग
लोग का अब मिट्टी के दीपकों से दूर होने लगे हैं.

अरविंद सिंह चौहान/सवाईमाधोपुर: आसमान छुती मंहगाई का असर अब त्यौहारों पर भी साफ नजर आने लगा है. मंहगाई के कारण अब त्यौहारों पर भी लोग सदियों पुराने रीति-रिवाजों से दुर होते नजर आने लगें है. मंहगाई का असर दीपावली पर घर घर में जलनें वाले मिट्टी के दीपों पर भी साफ नजर आने लगा है. दीपावली के त्यौहार पर सदियों से महिलाऐं घर घर जाकर दीपक जलानें की परंपरा चली आई है. लेकिन अब बाजारों में तरह तरह की सस्ती और रंग बिरंगी लाईटों की भरमार से लोग दीपावली के पर्व पर भी घरों तक ही सिमट कर रह गये है. 

दिपावली जैसे त्यौहार पर बाजारों में तरह तरह की लाईटों की भरमार के चलते मिट्टी के दीपकों का काम करने वाले कुम्हार परिवारों ने भी मंहगाई व कम मांग के चलते पुश्तैनी व्यवसाय से तौबा करना शुरु कर दिया है. दीपावली के त्यौहार पर कुछ सालों पहले रौशनी की सजावट के लिये मिट्टी के दीपकों की काफी मांग रहती थी लेकिन इस आधुनिक दौर में बाजार में सजावट के लिये इलेक्ट्रॉनिक आइट की भरमार होने से लोगों का मिट्टी के दीपकों के प्रति रुझान कम होता जा रहा है.

आलम ये है कि बाजारों में इलेक्ट्रॉनिक दीपक भी उपलब्ध होने लगें है और आज कल लोग मिट्टी के दीपकों की जगह पर इलेक्ट्रानिक दीपक खरीदना अधिक पंसद करने लगे है. इलेक्ट्रॉनिक दीपको में ना तो तेल की जरुरत है और ना ही बाती की जरुरत पडती है. इन्हे बिजली की सहायता से सरलता से जोड़ दिया जाता है. 

इस मंहगाई में लोग मिट्टी के दिये जलानें के लिये दीपक और तेल खरीदनें की बजाए इलेक्ट्रानिक दीपकों के ही अपने घरों को रौशन करनें में लगे है. जिसके कारण लोग का अब मिट्टी के दीपकों से दूर होने लगे हैं. जिससे दीपक बनानें वाले कुम्हार परिवारों के सामने अब रोजी रोटी का संकट खडा होने लगा है. 

दिपावली के त्यौहार पर मिट्टी के दीपक अब महज औपचारिकता तक ही सिमित होकर रह गये है. दीपावली के त्यौहार पर लोग मिट्टी के दीपक खरिदते तो है लेकिन इनकी संख्या कम ही होती है. जबकी लोगों द्वारा पहले दर्जनों की तादाद में मिट्टी के दीपक खरीदे जाते थे. जिसके कारण अब कुम्हार परिवारों का भी अपने इस कामधंधे में रुझान कम होता जा रहा है.

वहीं शहर के कुम्हार मोहल्ले में इस व्यवसाय से जुडे एक दर्जन परिवार है जो सालो से मिट्टी के दीपक व बर्तनों सहित अन्य आइटम बनाते आ रहे है. लेकिन अब बाजारों में इलेक्ट्रॉनिक आइटमों के आने से मिट्टी के दीपों और बर्तनों की कम मांग और मंहगाई के कारण कुम्हार अपना पुश्तैनी काम छोडकर अन्य व्यवसाय से जुडने लगे हैं. 

हालांकि अब भी मिट्टी के दीपक और अन्य बर्तन बनानें के व्यवसाय से सवाई माधोपुर जिले में करीब 250 परिवार इस व्यवसाय से जुड़े हुए है. भले ही अब मिट्टी के दियों की जगह लोग इलेक्ट्रॉनिक दीयों का उपयोग करने लगे हों पर लेकिन एक हकीकत यह भी है कि मिट्टी के दियों की जगह बिजली के दिये कभी नहीं ले सकते. 

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