राजस्थान में जाति की गोलबंदी तय करेगी हार-जीत का फैसला

राजस्थान के चुनाव में अपनी जीत को पक्की करने के लिए सारे राजनीतिक दलों ने जातियों की गोलबंदी करने के अपने प्रयास तेज कर दिए हैं.

राजस्थान में जाति की गोलबंदी तय करेगी हार-जीत का फैसला
प्रतीकात्मक तस्वीर

जयपुर: चुनावी राज्य राजस्थान में जीत और हार के लिए राजनीतिक दल अपनी चुनावी जीत पक्की करने के लिए मैदान में उतर चुके हैं और अपनी जीत के दांवे कर रहे है. लेकिन देश के सबसे बड़े राज्य राजस्थान में जीत और हार में जाति की सबसे बड़ी भूमिका ही रहेगी.

राजस्थान के चुनाव में अपनी जीत को पक्की करने के लिए सारे राजनीतिक दलों ने जातियों की गोलबंदी करने के अपने प्रयास तेज कर दिए हैं. राजस्थान की राजनीति में लंबे समय तक ब्राह्मण, राजपुतों के अलावा जाट समुदाय और माली समुदाय का बोलबाला रहा है. वैसे राज्य की राजनीति में सत्ता में दुबारा किसी की पार्टी की वापसी नहीं होती है. यह परिपाटी 1990 से राज्य में जारी है. 2008 में हुए चुनाव के दौरान यहां कांग्रेस ने जीत हासिल की थी और माली समुदाय से आने वाले अशोक गहलोत सीएम बने थे. 2013 के विधानसभा चुनाव के दौरान यहां से बीजेपी नेता वसुंधरा राजे ने चुनाव जीता था. मराठा समुदाय से आने वाली राजे के लिए इस बार सत्ता में वापसी काफी मुश्किल दिख रही है. वैसे बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह इस चुनाव में चुनावी जीत पक्की करने के लिए पूरी तरह राजस्थान पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. वहीं कांग्रेस के रणनीतिकार भी राज्य में जातिगत आधार पर वोटो को कांग्रेस के पक्ष में करने के प्रयास में लगे हुए हैं. वैसे राज्य की राजनीति में जातिगत हित को साधे बिना चुनावी जीत को पक्का करना काफी मुश्किल है.

राज्य की क्षेत्रफल के हिंसाब से सबसे बड़े इस राज्य में 300 के करीब जातियां हैं. जिनमें से 51 प्रतिशत हिस्सा ओबीसी का हैं. वही 18 प्रतिशत SC और 13 फीसदी हिस्सा ST का है. वहीं सामान्य जाति की आबादी राज्य में 18 प्रतिशत के करीब है.राज्य के चुनाव में जीत हांसिल करने के लिए जाट, राजपूत, ब्राह्मण, गुर्जर, और मीणाओं की गोलबंदी काफी अहम मानी जाती है. वैसे 2013 के पिछले विधानसभा चुनाव में वसुंधरा राजे ने इनमें से कई जातियों की गोलबंदी कर अपनी चुनावी जीत को पक्का किया था.

वैसे राज्य की सियासत में काफी रसुख रखने वाला राजपूत समुदाय पिछली बार बीजेपी के साथ खड़ा था. जिन्हे राजस्थान की सियासत में जनसंघ के समय से भैरों सिंह शेखावत ने इन्हे बीजेपी के पक्ष में लामबंद किया था. लेकिन इस समुदाय के काफी लोग वसुंधरा राजे से नाराज चल रहे हैं. जिसका एक प्रमुख कारण आनदपाल का इनकाउंटर भी माना जाता है. वहीं इस बार दिग्गज राजपुत नेता रहे जसवंत सिंह के बेटे मानवेंद्र ने कांग्रेस का दामन थाम लिया है. वैसे राजस्थान की 90 सीटों पर राजपूत जीत हार में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं. ऐसा भी माना जाता है कि राजस्थान में राजपूतों का साथ सरकार बनने की राह को आसान कर देता है. फिलहाल विधानसभा में कुल 25 राजपूत विधायक हैं. इनमें से बीजेपी से 20 विधायकों ने चुनाव जीता है.. 

राजस्थान की राजनीति में जाटों का भी काफी गहरा प्रभाव रहा है... फिलहाल राज्य के सीकर, झुंझुनूं, चूरू जिले के अलावा पश्चिमी राजस्थान कहने के बारमेड़, नागौर में जाट काफी बड़ी संख्या में हैं... जाट विधायकों की संख्या राज्य विधानसभा में 31 हैं. कांग्रेस के पारंपरिक वोटर माने जाने वाले जाट समुदाय पिछले दो चुनावों से बीजेपी और कांग्रेस दोनों को पक्ष में वोट कर रहा है... वैसे पिछले कई चुनावों से जाट नेताओं का बीजेपी में प्रभाव बढ़ा है. लेकिन बीजेपी में शामिल जाट समुदाय के कई नेता बीजेपी से नाराज चल रहे हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में जसवंत सिंह को मात देने वाले बाड़मेर सांसद सोनाराम चौधरी भी शामिल है. वैसे भी राजस्थान में बीजेपी में राजपूतों का दबदबा रहा है और जाटों और राजपुतों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भी रहती है. 

बीजेपी के समर्थक माने जाने वाले गुर्जर समुदाय के लोगों का झुकाव इस बार कांग्रेस की तरफ साफ दिख रहा है. फिलहाल राज्य विधानसभा में कुल 13  विधायक हैं. कांग्रेस नेता सचिन पायलट इस बार राजस्थान के चुनाव में पार्टी के प्रमुख चेहरा हैं... उनके पिता राजेश पायलट का नाम कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में शामिल रहे हैं. सचिन पायलट के कारण गुर्जर समुदाय का वोट बीजेपी से कांग्रेस की तरफ पलट सकता है. वैसे लंबे समय से आरक्षण की मांग कर रहे गुर्जर बीजेपी से नाराज हैं. माना जा रहा है कि आरक्षण की मांग को लेकर बीजेपी सरकार में हुए गुर्जर आंदोलन के बाद से यह समुदाय बीजेपी से नाराज है. जियका खामियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ सकता है... वैसे गुर्जर आरक्षण आंदोलन के अगुआ रहे  किरोड़ी सिंह बैंसला ने अपनी अलग राह पकड़ ली है. फिलहाल वो बीजेपी में शामिल हो चुके हैं. माना जा रहा है कि गुर्जरों का वोट का कुछ हिस्सा बीजेपी के पक्ष में भी जा सकता है.

वहीं राजस्थान की राजनीति में मीणा समुदाय को भी काफी प्रभावी माना जाता है. लेकिन राज्य की राजनीति में उनके सबसे बड़े विरोधी के रुप में गुर्जर माने जाते है... मीणा समुदाय का वोट कांग्रेस और बीजेपी दोनों के पक्ष में जाता है.. वैसे इस चुनाव में 2008 में बीजेपी छोड़ने वाले किरोड़ी लाल मीणा बीजेपी में शामिल हो गएं हैं.. 2008 में  वसुंधरा राजे के साथ मतभेद होने के कारण उन्होंने बीजेपी से दूरी बना ली थी. लेकिन मीणा समुदाय को अपने पक्ष में करने के लिए बीजेपी ने किरोड़ी लाल मीणा पार्टी में शामिल करने के अलावा उन्हे राज्यसभा में भी भेज दिया है. किरोड़ी लाल मीणा का मीणाओं के बीच काफी अच्छी पैठ मानी जाती है.

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