झुंझुनू: इस दरगाह में दीपों और पटाखों के साथ दिवाली मनाते हैं हिंदू-मुस्लिम, खास है मान्यता

दरगाह के गद्दीनशीन एजाज नबी ने बताया कि सूफीज्म की खासियत है कि पहले इंसानियत और बाद में धर्म. इन्हीं शब्दों को झुंझुनूं के लोगों ने अपने दिलों में बसा रखा है. 

झुंझुनू: इस दरगाह में दीपों और पटाखों के साथ दिवाली मनाते हैं हिंदू-मुस्लिम, खास है मान्यता

झुंझुनू: राजस्थान के झुंझुनू में दिवाली की अलग ही रोनक देखने को मिली. यहां एक दरगाह में दिवाली के दीप जलाए गए और इसी के साथ एक संदेश भी दिया गया. हालांकि, झुंझुनू की कमरूद्दीन शाह दरगाह में हर साल दिवाली का त्योहार इसी तरह मनाया जाता है और हिंदू-मुस्लिम एक साथ इस त्योहार का जश्न मनाते हैं. यह यहां कि पुरानी परंपरा है, जिसे लोग सालों से निभाते आ रहे हैं. इस मौके पर दरगाह में केवल दीप ही नहीं बल्कि आतिशबाजी भी की जाती है और साथ ही मिठाई खिलाकर एक दूसरे को बधाई दी जाती है. 

250 साल से है ये परंपरा
कमरूद्दीन शाह दरगाह के गद्दीनसीन एजाज नबी ने बताया, इस दरगाह से सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश आज का नहीं, बल्कि सदियों पुराना है. करीब 250 साल पहले सूफी संत कमरूद्दीन शाह हुआ करते थे, जिनकी संत चंचलनाथ जी के साथ गहरी दोस्ती थी. दोनों मिलने के लिए जब दरगाह और आश्रम से निकलते थे तो एक गुफा के जरिए मिलते थे. यही नहीं दोनों का एक ही संदेश था कि झुंझुनूं में सांप्रदायिक सौहार्द और कौमी एकता बनी रहे.

इंसानियत के बाद है धर्म
दरगाह के गद्दीनशीन एजाज नबी ने बताया कि सूफीज्म की खासियत है कि पहले इंसानियत और बाद में धर्म. इन्हीं शब्दों को झुंझुनूं के लोगों ने अपने दिलों में बसा रखा है. यही कारण है कि दीपावली पर दरगाह में दीपों की रोशनी होती है तो ईद भी दोनों धर्म के लोगों मिल जुलकर मनाते है. कमरूद्दीन शाह और चंचलनाथ महाराज ने जो परंपरा 200-250 साल पहले शुरू की थी, वो आज भी जारी है. साथ ही हिंदु मुस्लिम एकता, भाईचारा और सौहार्द आज भी जिंदा है. इसका संदेश पूरे देश में हैं. 

एकता का संदेश देने की करते हैं कोशिश
ऐसा नहीं है कि यह संदेश केवल दिवाली या फिर ईद से ही इस दरगाह से निकलता है. बल्कि हर कार्यक्रम में ऐसा संदेश देने की कोशिश भी होती है और वो पूरी भी हो रही है. खास बात यह है कि जब दरगाह में उर्स होता है तो वहां पर कव्वाली के साथ भजन भी गाए जाते हैं तो उर्स की सबसे बड़ी रस्म फातिहा में विभिन्न दरगाह के गद्दीनशीन के अलावा आश्रमों के महंत भी हिस्सा लेते है और अमन चैन की दुआ करते है. यही कारण है कि चाहे 1947 के दंगे हो या फिर 1992 का तनावपूर्ण माहौल. झुंझुनूं की शांति, अमन और चैन को कभी टस से मस नहीं कर सका.

दिवाली जैसे त्योहार दरगाह में मनाने पर हिंदु समुदाय की युवा पीढी भी खुशी है कि उन्हें ऐसे संस्कार मिल रहे है. जो आज के वक्त में पूरे देश के लिए मिसाल है. युवा कार्यकर्ता दिनेश सुंडा ने बताया कि दिवाली को दरगाह में मनाने के लिए सभी उत्सुक रहते है और इस खास पल का भी इंतजार करते है. उन्होंने बताया कि जब दोनों समुदाय के बच्चे एक साथ पटाखे चलाते और दीपक जलाते हुए दिखते है तो हमारी अखंड भारत की तस्वीर सामने होती है. साथ ही बिना कोई स्वार्थ के एक-दूसरे की खुशी भी देखते ही बनती है. मुस्लिम समुदाय के लोग भी काफी खुश दिखते है.