आरक्षण के दायरे में 'क्रीमी लेयर’ को लेकर संविधान पीठ 12 साल पुराने फैसले पर करेगी विचार

पीठ ने कहा , ‘‘ बड़ी पीठ द्वारा इस मामले में सुनवाई के लिये इसे भेजा जा चुका है. एम नागराज मामले में 5 न्यायाधीशों के फैसले पर विचार के लिये 7न्यायाधीशों की पीठ गठित करने की जरूरत है. ’’ 

आरक्षण के दायरे में 'क्रीमी लेयर’ को लेकर संविधान पीठ 12 साल पुराने फैसले पर करेगी विचार

नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति वर्गों के लिए पदोन्नति में आरक्षण पर 12 साल पुराने अपने फैसले के खिलाफ अंतरिम आदेश पारित करने से बुधवार को इनकार कर दिया. बता देें कि यह मामला ‘क्रीमी लेयर’ में आरक्षण लागू करने से जुड़ा हुआ था. शीर्ष अदालत ने कहा कि इस विषय पर 7 न्यायाधीशों की पीठ गौर करेगी. प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर एवं न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ की पीठ ने कहा कि वह केवल अंतरिम राहत देने के उद्देश्य से इस मामले में सुनवाई नहीं कर सकती क्योंकि इसे संविधान पीठ को पहले ही भेजा जा चुका है. 

पीठ ने कहा , ‘‘ बड़ी पीठ द्वारा इस मामले में सुनवाई के लिये इसे भेजा जा चुका है. एम नागराज मामले में 5 न्यायाधीशों के फैसले पर विचार के लिये 7न्यायाधीशों की पीठ गठित करने की जरूरत है. ’’ 

वर्ष 2006 के एम नागराज फैसले में कहा गया था कि सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति वर्गों के लिए पदोन्नति में क्रीमी लेयर की अवधारणा लागू नहीं की जा सकती जैसा कि पहले के दो मामलों ....1992 के इंदिरा साहनी और अन्य बनाम भारत संघ तथा 2005 के ई वी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य में फैसले दिये गये थे. ये दोनों फैसले अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में क्रीमी लेयर से जुड़े थे. 

केन्द्र की ओर से पेश अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने कहा कि इस मामले में 7 न्यायाधीशों की संविधान पीठ द्वारा तत्काल विचार करने की जरूरत है क्योंकि रेलवे और सेना की लाखों नौकरियां विभिन्न फैसलों को लेकर पैदा भ्रम के कारण अटकी हुई हैं. 

बता दें कि 28 मार्च को केंद्र ने अनुसूचित जाति और जनजातियों के संपन्न तबके (क्रीमी लेयर) को आरक्षण के लाभ प्राप्त करने से वंचित करने की संभावना से सुप्रीम कोर्ट में इनकार करते हुए कहा कि पूरा समुदाय ही ‘पिछड़ा’ है. प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर की पीठ के समक्ष गैर सरकारी संगठन समता आन्दोलन समिति की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान केन्द्र की ओर से अतिरिक्त सालिसीटर जनरल पीएस नरसिम्हा ने यह तर्क दिया. 

क्या हुआ कोर्ट में ?
नरसिम्हा ने कहा, ‘‘अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए क्रीमी लेयर का सिद्धांत लागू नहीं हो सकता.’’ उन्होंने कहा कि समूची अनुसूचित जाति और जनजाति इतनी अधिक पिछड़ी हुई हैं कि अन्य पिछड़े वर्गो के मामले में लागू होने वाला संपन्न वर्ग का सिद्धांत इन पर लागू ही नहीं किया जा सकता है. 

इस पर गैर सरकारी संगठन के वकील गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि संपन्न तबके को आरक्षण के लाभ से बाहर करने का सिद्धांत लागू नहीं होने की वजह से अनुसूचित जाति और जनजातियों में आरक्षण का लाभ पाने के हकदार लोग इससे वंचित हो रहे हैं. उन्होंने कहा कि यह मुद्दा भी सिर्फ अनुसूचित जाति और जनजातियों के सदस्यों ने ही उठाया है.

केंद्र को चार सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल करने का दिया था निर्देश 
पीठ ने इस पर केन्द्र को चार सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया और जनहित याचिका को अंतिम निबटारे के लिए जुलाई के दूसरे सप्ताह में सूचीबद्ध कर दिया था. इस याचिका में दलील दी गई थी कि अनुसूचित जाति और जनजातियों को मिलने वाला आरक्षण और दूसरी सरकारी योजनाओं का लाभ इन समुदायों में संपन्न तबके की वजह से असली जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच रहा है. याचिका में दावा किया गया है कि प्रभावशाली तबका अधिकांश लाभों पर कब्जा कर लेता है और इन समुदायों के 95 फीसदी लोगों किसी भी प्रकार से लाभ से वंचित रह जाते हैं.

(इनपुट भाषा से)

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