सबरीमाला मंदिरः महिलाओं के प्रवेश मामले को सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक पीठ को भेजा

सबरीमाला मंदिरः महिलाओं के प्रवेश मामले को सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक पीठ को भेजा
केरल का सबरीमाला मंदिर (फाइल फोटो)

नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने केरल के ऐतिहासिक सबरीमाला मंदिर  में महिलाओं के प्रवेश पर रोक से संबंधित मामला आज अपनी संविधान पीठ को भेज दिया. प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने संविधान पीठ के लिए कई सवाल तैयार किए जिनमें यह भी शामिल है कि क्या मंदिर महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने यह सवाल भी तैयार किया कि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाना क्या संविधान के तहत उनके अधिकारों का उल्लंघन है.

पीठ ने कहा कि संविधान पीठ इस सवाल पर भी विचार करेगी कि क्या इस प्रथा से महिलाओं के खिलाफ भेदभाव होता है. न्यायालय ने मामला संविधान पीठ को भेजे जाने के मुद्दे पर 20 फरवरी को अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था. सबरीमाला मंदिर प्रबंधन ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि 10 से 50 वर्ष की आयु तक की महिलाओं के प्रवेश पर इसलिए प्रतिबंध लगाया गया है क्योंकि मासिक धर्म के समय वे ‘‘शुद्धता’’ बनाए नहीं रख सकतीं.

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क्या है पूरा मामला
सबरीमाला मंदिर में परंपरा के अनुसार, 10 से 50 साल की महिलाओं की प्रवेश पर प्रतिबंध है. मंदिर ट्रस्ट की मानें तो यहां 1500 साल से महिलाओं की प्रवेश पर बैन है. इसके लिए कुछ धार्मिक कारण बताए जाते रहे हैं. वहीं केरल के यंग लॉयर्स एसोसिएशन ने बैन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 2006 में पीआईएल दाखिल की थी. करीब 10 साल से यह मामला कोर्ट में अधर में लटका हुआ है. पिछले साल 7 नवंबर को केरल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी थी कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के समर्थन में है. केरल सरकार ने पिछले साल सात नवंबर को न्यायालय को सूचित किया था कि वह ऐतिहासिक सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश की पक्षधर है. शुरू में, 2007 में एलडीएफ सरकार ने मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की हिमायत करते हुये प्रगतिशील दृष्टिकोण अपनाया था जिसे कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रन्ट सरकार ने बदल दिया था.

यूडीएफ सरकार ने इस साल चुनाव हारने से अपना दृष्टिकोण बदलते हुये कहा था कि वह 10 से 50 आयु वर्ग की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश के खिलाफ है क्योंकि यह परंपरा सदियों से चली आ रही है. शीर्ष अदालत ने 11 जुलाई, 2016 को संकेत दिया था कि 10 से 50 साल की आयु की महिलाओं का सबरीमाला मंदिर में प्रवेश वजित करने संबंधी सदियों पुरानी परंपरा का मसला संविधान पीठ को भेजा जा सकता है क्योंकि यह मौलिक अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित है. न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की थी कि महिलाओं को भी सांविधानिक अधिकार प्राप्त है और यदि इसे संविधान पीठ को सौंपा जाता है तो वह इस बारे में विस्तृत आदेश पारित करेगा.

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शीर्ष अदालत ने इससे पहले सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित करने संबंधी परंपरा पर सवाल उठाते हुये कहा कि वह इस बात की जांच करेगा कि क्या ‘आस्था और विश्वास’के आधार पर लोगों में अंतर किया जा सकता है. सबरीमाला मंदिर के प्रबंधकों ने इससे पहले न्यायालय से कहा था कि 10 से 50 साल की आयु की महिलाओं का इस मंदिर में प्रवेश निषेध है क्योंकि वे मासिक धर्म की वजह से ‘पवित्रता’बनाये नहीं रख सकती हैं.

(इनपुट भाषा से भी)

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