'वॉल ऑफ काइंडनेस' का संदेश 'अगर ज़रूरत है तो ले जाओ और अगर है, तो दे जाओ...'

श्रीनगर शहर में ज़रूरतमंदों की ज़रूरत पूरी करने के लिए खड़ी हुई " वॉल ऑफ़ काइंडनेस"

'वॉल ऑफ काइंडनेस' का संदेश 'अगर ज़रूरत है तो ले जाओ और अगर है, तो दे जाओ...'

 

श्रीनगरः शहर के दिल लालचौक में प्रसीद झेलम दरिया के किनारे एक आम सी दीवार कुछ दिनों से लोगों के आकर्षण का केंद्र बना गई है. 30 फ़ीट लम्बे एक जले हुए होटल की इस दीवार को नाम दिया गया है "वॉल ऑफ़ काइंडनेस" यानी मेहरबानी की दीवार. इस दीवार पर आज कल आम आदमी की रोज़मर्राह की ज़रूरत की चीज़े लटकी हुई मिलती है. कड़ाके की ठण्ड से बचने के लिए गर्म कपड़ों, जूतों से लेकर खाने की सामग्री भी लटकी मिलेगी आपको. श्रीनगर शहर के कुछ वॉलेंटियर युवाओं और एक एनजीओ द्वारा यह कदम उठाया गया है. जहां ज़रूरतमंद लोग बिना किसी के सामने हाथ फैलाए अपने हिसाब से अपनी ज़रूरत की चीज़ हासिल कर रहे है.

इन युवाओं का कहना है इसका मकसद लोगों में यह समझाना है कि हमें एक दूसरे के साथ मिल बांट कर आगे बढ़ना चाहिए और अगर कोई कुछ दान करना चाहता है तो वो ऐसे दान करे कि लेने वाले को महसूस ना हो. क्योंकि हमारे समाज में ऐसे लोग है जो ज़रूरतमंद तो होते है, मगर किसी से मांग नहीं सकते और ऐसे लोगों की ज़रूरत को पूरा करेगा हमारा यह कदम.

वॉलेंटियर सदफ हुसैन कहती है " कुछ ऐसे लोग है जो अपनी ज़रूरत सामने नहीं ला पाते. किसी से कुछ नहीं कह पाते. उनकी ज़रूरतों को हमारा यह कदम पूरा करेगा और साथ में उनकी पहचान भी गुप्त रखी जाएगी. इसकी खूबसूरती यह है कि ना तो देने वाले और ना ही लेने वाले को पहचाना जाता है".  

यह दशकों पुरानी दीवार अचानक कश्मीर के लोगों में मशहूर हुई है और इस पर लिखे जो शब्द है वो हर किसी के दिल को छू रहे है. इस दीवार पर लिखा गया है कि " अगर ज़रूरत है तो ले जाओ और अगर है तो दे जाओ" Take if you need, hang if you have" यह शब्द कश्मीर के लोगों को बड़ी तादाद इस तरफ आकर्षित कर रही है. दो ही दिन में भारी तादाद में दान करने वाले इस दीवार पर अपने हिसाब से चीज़ों को दान करने पहुंच रहे है.

इस एनजीओ ने शहर में छह जगहों पर ऐसी दीवारें बनाने की नगर निगम से अनुमति मांगी थी लेकिन पहले इन्हे झेलम किनारे इसकी शुरुआत करने की अनुमति मिली. अच्छा आकर्षण देखे और लोगों का सहयोग मिलने पर इन्हें शहर की दूसरी जगहों पर भी इस तरह की दीवारें खडी करने की अनुमति दी जायेगी. यह आईडिया पहले ईरान में शुरू हुआ था, फिर भारत के दो राज्यों में भी इसे अपनाया गया और अब पहली बार कश्मीर में यह शुरू हुआ है.

इस एनजीओ के लोगों का कहना है की कश्मीर में कड़ाके की ठंड से ज़रूरतमंदों को बचने के लिए यह कदम उठाया गया और लोगों बड़े पैमाने पर इस कदम को सराह रहे है. आफ़ियत हुसेन (एनजीओ के सदस्य) कहते हैं," यह ईरान में शुरू हुआ था हम उसे प्रभावित हुए. वो चीज़ देखकर हमने सोचा कि यहां पर सर्दियां कड़ाके की पड़ती है, हम ऐसा कुछ करें कि जो गरीब है हमारे समाज में वह यहां से गरम कपडे हासिल करे और जिसके पास हो वो यहां टांग जाए. अभी तक काफी अच्छा रेस्पॉन्स मिला है हम आगे भी ऐसे कदम उठाते रहेगे".   

इस एनजीओ का कहना है की वह देने वाले और लेने वाले के बीच एक पुल का काम करना चाहते है. वह मानते है की दान करने से कोई गरीब नहीं होता. इस एनजीओ जिसका नाम " हू इज़ हुसैन " है. इसके 30 सदस्य इस वाल ऑफ़ काइंडनेस से जुड़े है और अब धीरे धीरे यह कपड़ों के अलावा आम आदमी की ज़िन्दगी में इस्तेमाल होने वाली चीज़ों को इस प्लेटफार्म में शमिल करने वाले है. एनजीओ के वॉलेंटियर शिजान कहते है " अभी तक हम लोगों की दिलचस्पी देख रहे थे ,हमें लगा रहा है लोग इसे बहुत अच्छा कदम मानते है, अब हम इसको बड़ा करेंगे हम इसमें वो सब शामिल करेंगे जो आम ज़िन्दगी में लोगों की ज़रूरत होती है".  

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