SC भी फ्लैट खरीददारो को लेकर चिंतित, कहा-'आंसू नहीं देख सकते'

भाषा | Updated: Sep 14, 2017, 07:30 AM IST
SC भी फ्लैट खरीददारो को लेकर चिंतित, कहा-'आंसू नहीं देख सकते'

नई दिल्लीः उच्चतम न्यायालय ने घर खरीदने वाले लोगों की आंखों में आंसुओं पर दुख जाहिर करते हुए कहा है कि बिल्डर उनके साथ दगाबाजी नहीं कर सकते हैं. शीर्ष न्यायालय ने जेपी ग्रुप को अपने दस ग्राहकों को फ्लैट सौंपने में देर करने को लेकर 50 लाख रूपये का अंतरिम मुआवजा देने का निर्देश दिया .

न्यायालय ने यह भी कहा कि घर खरीदारों से सामान्य निवेशकों जैसा बर्ताव नहीं किया जा सकता क्योंकि उन्होंने अपने सिर पर छत के लिए अपनी गाढ़ी कमाई खर्च की है. इससे पहले, शीर्ष न्यायालय ने जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड को अल्प अवधि की सावधि जमा के तौर पर बैंक में चार करोड़ रूपये जमा करने और नोएडा - ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे पर इसकी कलिप्सो कोर्ट परियोजना में घर खरीदारों को फ्लैट सौंपने का निर्देश दिया था.

दरअसल, रियल एस्टेट कंपनी ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) के दो मई 2016 के आदेश को चुनौती दी थी. आयोग ने घर खरीदारों को फ्लैट सौंपने में हो रही देर को लेकर 12 फीसदी सालाना की दर से जुर्माना लगाया था. प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने कहा कि वह घर खरीदारों की आंखों में आंसू देख कर चिंतित हैं . इन लोगों से बिल्डर दगाबाजी नहीं कर सकते हैं. उनके साथ सामान्य निवेशक जैसा बर्ताव नहीं किया जा सकता...उन्होंने सिर पर छत पाने के लिए अपनी गाढ़ी कमाई खर्च की है.

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पीठ के सदस्यों में न्यायमूर्ति अमिताभ रॉय और न्यायमूर्ति एएम खानविलकर भी शामिल थे. न्यायालय ने अंतरिम उपाय के तौर पर कंपनी को निर्देश दिया कि वह 10 फ्लैट खरीदारों को ब्याज के तौर पर 50 लाख रूपया दे. फ्लैट खरीदारों के वकील ने कहा कि उन्हें 2016 में फ्लैट सौंपे गए, जबकि ये 2011 में दिये जाने थे. साथ ही ब्याज पर न्यायिक निर्णय किए जाने की जरूरत है.

वरिष्ठ अधिवक्ता कृष्णन वेणुगोपाल ने कहा कि 12 फीसदी पैनल्टी लगाने का आयोग का आदेश अनुचित और मनमाना है. आयोग ने अपने आदेश में नोएडा स्थित बिल्डर को निर्देश दिया था कि वह खरीदारों को अपार्टमेंट 21 जुलाई 2016 तक सौंप दे, जिसमें नाकाम रहने पर उसे परियोजना पूरी होने तक प्रति दिन प्रति फ्लैट 5000 रूपए जुर्माना अदा करना होगा. गौरतलब है कि जेपी कलिप्सो कोर्ट परियोजना कंपनी ने 2007 में शुरू की थी. साल 2016 तक कंपनी ने 16 टावर में से सिर्फ पांच टावर का निर्माण कार्य पूरा किया , जबकि अन्य टावर का निर्माण कार्य अधूरा रहा.