देहरादून: सरकारी मदद के अभाव में बंद होने की कगार पर 'इंदिरा अम्मा कैंटीन'

देहरादून में 6 इंदिरा अम्मा कैंटीन हैं. सरकार को इन कैंटीन के 29 लाख बकाया देने हैं जो अभी तक नहीं मिले हैं.

देहरादून: सरकारी मदद के अभाव में बंद होने की कगार पर 'इंदिरा अम्मा कैंटीन'
(फोटो साभार सोशल मीडिया)

देहरादून: गरीबों को सस्ते दर पर भोजन उपलब्ध कराने वाले इंदिरा अम्मा कैंटीन पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं. आलम ये है कि कैंटीन बंदी के कगार पर पहुंच रहे हैं. कैंटीनों को सरकार की तरफ से न तो सस्ता राशन मुहैया कराया जा रहा है और न ही इन्हें सब्सिडी की राशि मिल पा रही है. हालत ये है कि सरकार की तरफ से पांच महीने की सब्सिडी के लगभग 29 लाख रुपए भी जारी नहीं हो पाए हैं. 15 अगस्त 2015 को तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने देहरादून में इंदिरा अम्मा कैंटीन योजना की शुरूआत की थी. घंटाघर स्थित MDDA कॉम्प्लेक्स में पहला इंदिरा अम्मा कैंटीन खोला गया. यहां महज 20 रुपए में भरपेट खाना मिलता है. यह कैंटीन लोगों को बहुत रास आया और बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचने लगे. तत्कालीन हरीश रावत सरकार द्वारा कैंटीनों के संचालन की जिम्मेदारी महिला स्वयं सहायता समूहों को सौंपी गई.

उस वक्त तय किया गया था कि राज्य सरकार संचालक समूह को प्रति थाली दस रुपए सब्सिडी देगी. इसके अलावा कैंटीन संचालकों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम) के तहत APL (अपर पोवर्टी लाइन) कोटे की दर राशन- चावल और गेहूं भी उपलब्ध कराया जाएगा ताकि उनका नुकसान न हो. देहरादून में करीब 10 इंदिरा अम्मा कैंटीन संचालित किए जा रहे हैं. इनमें से 6 कैंटीन को सब्सिडी दी जाती है, लेकिन अब सब्सिडी बंद कर दी गई है जिसकी वजह से संचालकों को परेशानी हो रही है. सब्सिडी नहीं मिलने के वजह से कैंटीन संचालक कर्ज के बोझ तले दब गए हैं.

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एक कैंटीन संचालक ने जी मीडिया से बात करते हुए कहा कि कैंटीन खोले जाने के बाद जिस तरह लोगों का रिस्पांस रहा उसके बाद हरीश रावत सरकार ने 2015 में 19 नवंबर को इंदिरा गांधी के जन्मदिवस पर पूरे राज्य में कैंटीन खोलने का निर्णय लिया और कुल 40 स्थानों पर कैंटीन शुरू कर दिया गया. कांग्रेस की मानें तो राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद से ही बीजेपी सरकार ने इंदिरा अम्मा कैंटीन की उपेक्षा शुरू कर दी और आज आलम ये है कि कैंटीन बंद होने के कगार पर पहुंच गए हैं. वर्ष 2018-19 में केवल राजधानी के ही 6 कैंटीनों को सब्सिडी के 29 लाख रुपए न मिल पाना बीजेपी सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करता है.

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