ZEE जानकारी: अटल बिहारी वाजपेयी ने रमज़ान के महीने में युद्धविराम का ऐलान किया था

गृह मंत्रालय ने आज एक Tweet किया . जिसमें लिखा है कि जम्मू कश्मीर में रमज़ान के पवित्र महीने के दौरान सुरक्षाबल अपने Operation शुरू ना करें . ये फैसला इसलिए लिया गया है ताकी शांतिप्रिय मुसलमान शांतिपूर्ण माहौल में रमज़ान को मना सकें

ZEE जानकारी: अटल बिहारी वाजपेयी ने रमज़ान के महीने में युद्धविराम का ऐलान किया था

दुनिया का हर देश अपनी सेना को इस बात की छूट देता है कि दुश्मन को सिर मत उठाने दो . दुश्मन सिर उठाए, इससे पहले ही उसका सिर कुचल दो . सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ और Military Experts बार-बार ये बात कहते हैं कि Attack is the best Defence . यानी सुरक्षित रहने का सबसे अच्छा तरीका है कि पहले ही हमला करके दुश्मन को खत्म कर दो . लेकिन हमारे देश की सरकार सुरक्षाबलों के हाथ बांध रही है .

गृह मंत्रालय ने आज एक Tweet किया . जिसमें लिखा है कि जम्मू कश्मीर में रमज़ान के पवित्र महीने के दौरान सुरक्षाबल अपने Operation शुरू ना करें . ये फैसला इसलिए लिया गया है ताकी शांतिप्रिय मुसलमान शांतिपूर्ण माहौल में रमज़ान को मना सकें. गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को इसके बारे में सूचित कर दिया है . साथ ही ये भी कहा गया है कि अगर सुरक्षाबलों के ऊपर कोई हमला होता है तो उनके पास जवाब देने का अधिकार है. अगर निर्दोष लोगों की जीवन रक्षा करना जरूरी हो तो भी सुरक्षाबल कार्रवाई कर सकते हैं.

सरकार ये उम्मीद करती है कि हर कोई इस पहल में सहयोग करेगा और मुस्लिम भाई-बहन शांतिपूर्वक और बिना किसी कठिनाई के रमज़ान मना पाएंगे. अब उन ताकतों को अलग-थलग करना जरूरी है जो आतंकवाद और हिंसा का सहारा लेकर इस्लाम का नाम बदनाम करती हैं . अब आप खुद ही सोचिए कि क्या सरकार का ये फैसला आतंकवादियों को इस बात की छूट नहीं है कि वो एक महीने आराम करें और अगले आतंकवादी हमले की तैयारी करें ? 

क्योंकि अब सुरक्षाबलों को उनके खिलाफ Pro Active Operation करने का अधिकार ही नहीं है . क्या सरकार ये कहना चाहती है कि सेना खुद पर हमला होने का इंतज़ार करे ? यानी सेना पहले मार खाएगी, फिर जवाब देगी ? क्या देश का कोई भी नागरिक इस फैसले से सहमत हो सकता है ? आज की ये खबर पूरे देश के लिए, और आप सभी के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि ये फैसला उन जवानों की ज़िंदगी से जुड़ा हुआ है जो हमारी सुरक्षा के लिए अपनी जान को दांव पर लगा देते हैं . ये वो जवान हैं जो कश्मीर के आतंकवाद प्रभावित इलाकों में मौजूद हैं . और इन पर हर पल आत्मघाती हमलों का खतरा मंडराता रहता है. आप इन जवानों को रिमोट कंट्रोल के ज़रिए नियंत्रित नहीं कर सकते. 

यहां ये जानना ज़रूरी है कि आखिर गृहमंत्रालय ने ये फैसला लिया क्यों ? 9 मई को जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में एक सर्वदलीय बैठक हुई थी. इस बैठक के बाद जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने केंद्र से ये मांग की थी कि रमज़ान और अमरनाथ यात्रा के दौरान सुरक्षाबल अपनी तरफ से सीज़फायर करें. जम्मू कश्मीर की सरकार ने ये सिफ़ारिश केंद्र सरकार को भेज दी थी. और उसी सिफ़ारिश को आज गृहमंत्रालय ने भी स्वीकार कर लिया . 

गृहमंत्रालय के इस फैसले पर जब विवाद हुआ तो उसने एक स्पष्टीकरण जारी किया. गृहमंत्रालय ने कहा है कि ये आतंकवादियों के लिए रियायत नहीं है . ये फैसला इसलिए लिया गया है ताकि लोगों को रमज़ान के पवित्र महीने के दौरान कोई कठिनाई ना हो . लोग शांति और अच्छा जीवन चाहते हैं . इस दौरान भी सुरक्षा में कोई ढील नहीं दी जाएगी . हम उम्मीद करते हैं कि आतंकवादी भी लोगों के लिए मुश्किल नहीं खड़ी करेंगे. 

इस स्पष्टीकरण की भाषा से ये भी लगता है, जैसे सरकार को इस बात का भरोसा है कि आतंकवादी एकदम शांत हो जाएंगे और कोई हमला नहीं होगा. आतंकवादियों से शराफत की उम्मीद करना मूर्खता है. इधर सरकार आतंकवादियों से सुधरने की उम्मीद पाल कर बैठी है . लेकिन ऐसा लगता है कि आतंकवादियों के हौसले गृहमंत्रालय के इस फैसले के बाद बुलंद हो गए हैं . आज दोपहर करीब साढ़े 3 बजे गृहमंत्रालय ने Tweet करके अपने इस फैसले की जानकारी दी और इसके करीब डेढ़ घंटे बाद ही कश्मीर के शोपियां में कुछ आतंकवादी, शाम 5 बजे सुरक्षाबलों की एक टीम पर हमला करके फ़रार हो गए. इससे पहले कल ही अनंतनाग में एक आतंकवादी हमला हुआ था जिसमें बिलाल नाम के एक पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे. 

आज इस मौके पर हम आप सभी से और केंद्र सरकार से भी एक बात कहना चाहते हैं . क्या सबक लेने के लिए ज़रूरी है कि एक गलती की जाए . क्या हमें इतिहास में हुई गलतियों से सबक नहीं लेना चाहिए? हम वर्तमान सरकार को सन 2000 की याद दिलाना चाहते हैं जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने रमज़ान के महीने में युद्धविराम का ऐलान किया था . तब अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि मुझे उम्मीद है कि हमारे इस फैसले की पूरी तरह से प्रशंसा की जाएगी . राज्य में हिंसा बंद होगी . नियंत्रण रेखा और अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर घुसपैठ खत्म हो जाएगी और शांति स्थापित होगी .  

उस वक्त कश्मीर में सक्रिय सभी आतंकवादी संगठनों ने अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के इस फैसले को खारिज कर दिया था . आंतकवादी हाफिज़ सईद ने उस वक्त भारत सरकार को जो जवाब दिया था वो मौजूदा सरकार को ध्यान से सुनना चाहिए. हाफिज़ सईद ने कहा था कि "रमज़ान के महीने के दौरान भारत के प्रधानमंत्री ने युद्धविराम की जो पेशकश की है वो धोखाधड़ी है . युद्धविराम इसलिए किया गया है ताकि उनकी थकी हुई सेना आराम कर सके ."

ऐसे में क्या आतंकवादियों पर और बेईमान पाकिस्तान पर यकीन किया जा सकता है ? ये विचार करने वाली बात है . वैसे इस बार भी आतंकवादियों के खिलाफ ऑपरेशन को एक महीने के लिए रोकने के फैसले पर आतंकवादी संगठन लश्कर ए तैयबा ने ऐसा ही जवाब दिया है. लश्कर ए तैयबा ने भारत के गृहमंत्री के फैसले को नाटक बताया है . वैसे रमज़ान में सीज़ फायर से सुरक्षाबलों को ही ज्यादा नुकसान हुआ है . क्योंकि ऐसे हालात में उनके पास Pro Active Operation करने का अधिकार खत्म हो जाता है. हमारे पास कुछ आंकड़े हैं जिनसे ये बात साबित होती है . वर्ष 2000 के नवंबर महीने में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने सीज़फायर का ऐलान किया था . 

इसके बाद इस सीज़फायर को तीन बार बढ़ाया गया था यानी Extend किया गया था. लेकिन जो कदम कश्मीर में शांति बहाल करने के लिए उठाया गया उसकी कीमत सुरक्षाबलों को चुकानी पड़ी थी . सीज़फायर के दौरान सुरक्षाबलों के कुल 197 जवान शहीद हुए थे. अगर हम अनुपात देखें तो सीजफायर के दौरान 3 आतंकवादियों को मारने में सुरक्षाबलों के 2 जवान शहीद हो गए . लेकिन सीज़फायर से पहले और उसके बाद 6 से ज़्यादा आतंकवादियों को मारने में, 2 जवान शहीद होते थे.यानी हमारे आतंकवादियों की मौत का अनुपात सीज़फायर के दौरान कम हो गया था. जबकि हमारे जवान उतनी ही संख्या में शहीद हो रहे थे. ये दुख की बात है कि हमारे देश की सरकारें ना तो इतिहास से कोई सबक लेती हैं और ना ही वर्तमान से . 

मुसलमानों का धार्मिक कैलेंडर चांद के अनुसार चलता है . चांद के नवे महीने को रमज़ान का पवित्र महीना कहा जाता है . दुनिया भर के मुसलमान इस पूरे महीना को उत्सव की तरह मनाते हैं . इस पूरे महीने में उपवास रखा जाता है . जिसे रोज़ा कहा जाता है . इन दिनों सूर्योदय से सूर्यास्त तक कुछ भी खाना-पीना मना होता है . इन दिनों आचार-विचार की पवित्रता पर विशेष ज़ोर दिया जाता है . रमज़ान का चांद दिखते ही अगले दिन के रोज़े की तैयारियां शुरू हो जाती हैं . सूर्यास्त के वक़्त रोज़ा खोला जाता है . और इसे इफ़्तार करना कहा जाता है . ईद-उल-फितर का त्यौहार रमज़ान के महीने के अंत में होता है.

एक तरफ हम ये कहते हैं कि आतंकवाद का धर्म नहीं होता
और उसके बाद रमज़ान के महीने में सीज़फायर करते हैं ?
आखिर ये सीज़फायर रमज़ान के महीने में ही क्यों किया जाता है?
दीवाली के महीने में क्यों नहीं ?
होली के महीने में क्यों नहीं ?
क्रिस्मस के महीने में क्यों नहीं ?

दुनिया का कोई भी देश अपनी सुरक्षा से समझौता बर्दाश्त नहीं करता. इज़राइल ने अपने इतिहास से सबक लिया है . एक हज़ार वर्षों तक भटकने के बाद यहूदियों ने दोबारा अपना देश हासिल किया, जिसका नाम इज़राइल है . इजराइल के लोगों को ये पता है कि जिसका देश नहीं होता, उसके साथ दुनिया कितनी बेरहमी से पेश आती है . इजराइल को राष्ट्र के महत्व की पूरी जानकारी है . इसीलिए वो अपने देश के दुश्मनों को कभी माफ नहीं करता है . सिर उठाने से पहले ही दुश्मन का सिर कुचल देना, इजराइल की  राष्ट्रीय नीति है . 

अमेरिका, इजराइल में अपना दूतावास Tel Aviv से Jerusalem में शिफ्ट कर रहा है और फिलिस्तीन के लोग इसका विरोध कर रहे हैं . पिछले 6 दिनों में इज़राइल के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने वाले 60 से ज़्यादा लोगों को इज़राइल की सेना ने मार दिया है. फिलिस्तीन की सरकार की तरफ से ये कहा गया है कि सोमवार को इज़राइल की सेना की कार्रवाई में 2 हज़ार 700 लोग घायल भी हुए हैं . Gaza में वर्ष 2014 के युद्ध के बाद ये सबसे बड़ी हिंसा है .

फ़िलस्तीन ने इस घटना को नरसंहार बताया है . संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इसे मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन बताया है . लेकिन इज़राइल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने कहा है कि सेना ने आत्मरक्षा में कार्रवाई की है . क्योंकि हमास Israel को खत्म करना चाहता है . 

बड़ी बात ये है कि इज़राइल के लिए उसके देश की सुरक्षा ही महत्वपूर्ण है . इज़राइल को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसकी कार्रवाई पर किस तरह की प्रतिक्रिया होगी? Israel के प्रधानमंत्री भी अगर चाहते तो शांति के कबूतर उड़ाते हुए ये कह सकते थे कि रमज़ान का महीना आने वाला है इसलिए वो हिंसक विरोध प्रदर्शनों को बर्दाश्त करते रहेंगे . लेकिन उन्होंने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया, जिससे उनके देश के सुरक्षाबलों का मनोबल कमज़ोर हो. आज हमें इज़राइल की इस निडर सुरक्षा नीति से सबक लेना चाहिए .

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