ZEE जानकारी: कैसे पूरी दुनिया में राजनीति का सामान बने रोहिंग्या मुसलमान

ZEE जानकारी: कैसे पूरी दुनिया में राजनीति का सामान बने रोहिंग्या मुसलमान

हमारे देश में 1990 में कश्मीरी पंडितों पर बड़े पैमाने पर अत्याचार किए गये थे और इसकी वजह से डेढ़ लाख से भी ज़्यादा कश्मीरी पंडित.. कश्मीर घाटी से विस्थापित हो गय़े थे... लेकिन वो कभी भी राष्ट्रीय मुद्दा नहीं बन पाए... क्योंकि ये कुछ लोगों के एजेंडे को सूट नहीं करता. इसीलिए आज हम ये कह रहे हैं कि हमारे देश में जब भी कोई समस्या पैदा होती है . तो सबसे पहले उस समस्या का मज़हब तलाशा जाता है . और जैसे ही मज़हब मिल जाता है. विरोध प्रदर्शन की भूमिका भी तैयार कर ली जाती है. ये बहुत दुख की बात है कि हमारे देश में जाति और धर्म के हिसाब से ये तय किया जाता है कि किस एजेंडे के साथ और कितनी मात्रा में विरोध प्रदर्शन करने से राजनीतिक लाभ होगा . 

रोहिंग्या मुसलमान, ऐसे इंसान हैं.. जिन्हें पूरी दुनिया में राजनीति का सामान बना दिया गया है. इन लोगों का अपना कोई देश नहीं है... अपना कोई सम्मान नहीं है... क्योंकि पूरी दुनिया में इनकी संवेदनाओं और दुखों का राजनीतिक इस्तेमाल हो रहा है. इन्हें लेकर एजेंडा चलाया जा रहा है और इस एजेंडे का Virus भारत में भी फैल रहा है. भारत के कई शहरों में रोहिंग्या मुसलमानों के पक्ष में.. तुष्टिकरण की राजनीति हो रही है. और ऐसा करने वाले लोग राष्ट्रीय सुरक्षा के विषय में नहीं सोच रहे हैं.  रोहिंग्या भी हमारी तरह इंसान हैं लेकिन हमारे देश में उनका भी मजहब तलाश लिया गया है . धार्मिक और राजनीतिक एजेंडे के साथ विरोध प्रदर्शन शुरू हो चुके हैं . दिल्ली, लखनऊ और कोलकाता में रोहिंग्या मुसलमानों को शऱण देने के पक्ष में प्रदर्शन हुआ है . 

लेकिन जम्मू में रोहिंग्या लोगों को बाहर निकालने की मांग की जा रही है . जिस तरह हमारे देश में रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ धार्मिक और राजनीतिक एजेंडा चलाया जा रहा है . उसी तरह पूरी दुनिया में भी रोहिंग्या मुसलमानों के नाम पर कूटनीतिक एजेंडा चल रहा है  बांग्लादेश और म्यांमार... दोनों ही रोहिंग्या लोगों को अपने देश का नागरिक नहीं मानते हैं. ब्रिटेन... म्यांमार पर दबाव बना रहा है कि वो रखाइन इलाके में शांति स्थापित करे . और पाकिस्तान ने भी म्यांमार के राजदूत को बुलाकर अपना विरोध दर्ज कराया है . संयुक्त राष्ट्र संघ भी रोहिंग्या शरणार्थियों के मुद्दे पर राजनीतिक और कूटनीतिक एजेंडा चला रहा है . United Nations अपनी ज़ंग लगी तलवार दिखाकर भारत को उपदेश देने की कोशिश कर रहा है .

संयुक्त राष्ट्र ने रोहिंग्या शऱणार्थियों के मुद्दे को पत्रकार गौरी लंकेश और बीफ के मुद्दे से जोड़ दिया है . संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के प्रमुख ने भारत की चिंताओँ पर कोई गौर नहीं किया और भारत सरकार के रवैये पर खेद जताया .  लेकिन सच ये है कि दुनिया की ज्यादातर समस्याओं के लिए संयुक्त राष्ट्र का सुस्त रवैया ही जिम्मेदार है . संयुक्त राष्ट्र का अपना इतिहास ही नाकामियों से भरा हुआ है . दुनिया में जब भी बड़े युद्ध हुए हैं या फिर मानवता पर संकट आया है... संयुक्त राष्ट्र ने हमेशा चुप्पी साध ली . 

वर्ष 1950 में जब अमेरिका ने साउथ कोरिया का पक्ष लेकर नॉर्थ कोरिया पर हमला किया तब संयुक्त राष्ट्र खामोश रहा . वर्ष 1955 से 1975 के बीच जब अमेरिका ने वियतनाम में जनसंहार किया तब भी संयुक्त राष्ट्र कुछ नहीं कर सका. वर्ष 2003 में जब अमेरिका ने जनसंहार के हथियारों का झूठा बहाना बनाकर इराक पर हमला किय़ा तब भी United Nations ने कुछ नहीं किया .इन युद्धों में बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ . करोड़ों लोग विस्थापित हुए . लाखों लोगों की मौत हुई लेकिन अमेरिका के सामने हर बार संयुक्त राष्ट्र संघ ने घुटने टेक दिए .  संयुक्त राष्ट्र संघ में कुल 193 देश शामिल हैं

वर्ष 2016 की एक रिपोर्ट के मुताबिक यहां 40 हजार 131 लोग काम करते हैं. युनाइटेड नेशन्स का वर्ष 2016-17 का बजट 35 हजार 850 करोड़ था . लेकिन इसके बाद भी संयुक्त राष्ट्र को अपनी ज़ंग खाई वैचारिक तलवार दिखाना और उपदेश देना अच्छा लगता है. 

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