ZEE जानकारीः Russia में हुई 5 साल पुरानी घटना का आज से क्या रिश्ता है?

15 फरवरी 2013 को Russia के चेलियाबिंस्क में एक उल्कापिंड गिरा था. पृथ्वी के वातावरण में दाखिल होने से पहले उस उल्कापिंड का वजन 10 हज़ार टन यानी क़रीब 90 लाख किलोग्राम था.

ZEE जानकारीः Russia में हुई 5 साल पुरानी घटना का आज से क्या रिश्ता है?

हमारा अगला विश्लेषण 'खगोलीय विज्ञान' में रुचि रखने वाले लोगों को बहुत पसंद आएगा. ख़ासकर ऐसे युवा, जो अंतरिक्ष की रहस्यमय दुनिया के बारे में जानना चाहते हैं, उन्हें ये विश्लेषण बहुत ध्यान से देखना चाहिए. हमारा ये DNA टेस्ट 5 साल पुरानी एक ऐसी घटना पर आधारित है, जो आज भी पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय बनी हुई है.

15 फरवरी 2013 को Russia के चेलियाबिंस्क में एक उल्कापिंड गिरा था. पृथ्वी के वातावरण में दाखिल होने से पहले उस उल्कापिंड का वजन 10 हज़ार टन यानी क़रीब 90 लाख किलोग्राम था. और उसकी गति साढ़े 64 हज़ार किलोमीटर प्रति घंटा थी. हालांकि, जैसे-जैसे वो धरती के क़रीब आता गया, वैसे-वैसे वो छोटे टुकड़ों में टूटता चला गया. इसके बावजूद, जब ये उल्कापिंड चेबारकुल की एक झील में गिरा, तब उस वक्त इसका वज़न क़रीब 654 किलोग्राम था. ये एक अनोखी घटना थी. क्योंकि, आम तौर पर पृथ्वी के वातावरण में दाखिल होते ही, इस तरह के उल्कापिंड छोटे-छोटे टुकड़ों में टूटकर बिखरने लगते हैं. लेकिन, इस मामले में ऐसा नहीं हुआ. 

जैसे ही ये उल्कापिंड बर्फीली झील में गिरा, एक भीषण धमाका हुआ. इस धमाके की तीव्रता का अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं, कि उस वक्त जितनी उर्जा पैदा हुई, वो क़रीब 39 करोड़ किलोग्राम TNT से होने वाले धमाके के बराबर थी. इस धमाके का झटका इतना तेज़ था, कि इस जगह से 517 किलोमीटर तक के दायरे में आने वाली इमारतें इससे प्रभावित हुईं. तब कई इमारतों की खिड़कियां ध्वस्त हो गई थीं. और इस धमाके की वजह से डेढ़ हज़ार से ज़्यादा लोग ज़ख्मी हुए थे. यहां आपको ये भी पता होना चाहिए, कि उल्कापिंड होता क्या है.

अंतरिक्ष में मौजूद टूटे हुए तारों और ग्रहों के छोटे-छोटे हिस्सों को उल्कापिंड कहते हैं. ये छोटे-बड़े आकाशीय पिंड होते हैं, जो हमेशा सूर्य की परिक्रमा करते रहते हैं. ये कचरे की तरह अंतरिक्ष में बिखरे रहते हैं. और जब इनमें से कोई पिंड, घूमते-घूमते पृथ्वी के पास आ जाता है, तो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण पृथ्वी की तरफ खिंचने लगता है.

इस खिंचाव के कारण इसकी गति काफी तेज़ होती है. और जैसे ही ऐसे उल्कापिंड हमारे वायुमंडल में प्रवेश करते हैं, तो घर्षण की वजह से इनमें आग लग जाती है. और उसी की चमक आपको आसमान में दिखाई देती है. वैसे तो, ज्यादातर उल्कापिंड पर्यावरण में प्रवेश करने के बाद ही बिखर जाते हैं. और इनसे कोई ख़तरा नहीं होता. लेकिन, कुछ ऐसे भी होते हैं, जो घर्षण को बर्दाश्त कर लेते हैं और ज़मीन पर गिरते हैं. एक अनुमान के मुताबिक, प्रति वर्ष कम से कम 500 उल्कापिंड पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश करते हैं. लेकिन, तेज़ दबाव के कारण वो हवा में ही नष्ट हो जाते हैं. और Research के लिहाज़ से वैज्ञानिकों को सिर्फ 5 या 6 उल्कापिंडों के बारे में ही पता चल पाता है. एक शोध के मुताबिक, हर 180 साल में एक बार कोई उल्कापिंड, किसी इंसान पर गिरता है. अमेरिका के Alabama के रहने वाले Ann Hodges, दुनिया के इकलौते ऐसे इंसान थे, जिनके ऊपर कोई उल्कापिंड गिरा था. ये घटना वर्ष 1954 में हुई थी.
और अगर इसे दूसरी नज़र से देखें, तो मुमकिन है, कि अगली बार कोई उल्कापिंड किसी व्यक्ति पर 116 साल बाद यानी वर्ष 2,134 में गिरे. वैसे ये सिर्फ एक अनुमान है.

सवाल ये है, कि Russia में हुई 5 साल पुरानी घटना का आज से क्या रिश्ता है ? और हम ये विश्लेषण आपको क्यों दिखा रहे हैं ? इसे समझने के लिए आपको हमारे साथ Russia के चेबारकुल में मौजूद उसी झील पर चलना होगा, जहां ये उल्कापिंड गिरा था. Zee News की टीम ने इस झील से एक रिपोर्ट तैयार की है. क्योंकि, वहां पर आज भी 654 किलोग्राम के वज़न वाले उल्कापिंड के सबूत ज़िन्दा हैं. Russia ने इसे एक धरोहर बनाकर संग्रहालय में रख दिया है और इसके कुछ हिस्सों पर आज भी रिसर्च चल रहा है. अपने ऊपर फेंके गये पत्थरों को धरोहर बना लेना और उनसे प्रकृति के रहस्यों को Decode करना... एक बहुत बड़ा प्रयास है. आज चश्मदीदों और तस्वीरों की मदद से 5 साल पुरानी इस अनोखी घटना को देखना, आपके लिए एक दिलचस्प अनुभव होगा.

इस उल्कापिंड में धरती से क़रीब 22 किलोमीटर ऊपर विस्फोट हुआ था. और विस्फोट के वक्त निकलने वाली उर्जा अमेरिका द्वारा जापान के हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम से 30 से 40 गुना ज्यादा थी. इसके बाद ये रशिया के चेलियाबिंस्क में गिरा और उस वक़्त जो धमाका हुआ था उसकी धूल कई महीनों तक वहां के वातावरण में फैली रही थी. उस वक्त लोग बहुत डर गये थे और उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था. लेकिन अब 5 साल बाद वो डर... एक रिसर्च में तब्दील हो गया है.

वैसे Russia और उल्कापिंडों से होने वाले धमाके का इतिहास बहुत पुराना है. एक ऐसा ही वाक्या 110 साल पहले Russia के साइबेरिया इलाक़े में हुआ था. इस Blast से आग का जो गोला उठा था, उसके बारे में कहा जाता है कि वो 50 से 100 मीटर चौड़ा था. जिसकी वजह से जंगल के क़रीब 2 हज़ार वर्ग मीटर इलाक़े पल भर में राख हो गए थे. और 8 करोड़ पेड़ जल गए थे. साइबेरिया में हुए इस धमाके में इतनी ताक़त थी कि धरती कांप उठी थी. जहां धमाका हुआ था, वहां से क़रीब 60 किलोमीटर दूर स्थित क़स्बे के घरों की खिड़कियां टूट गई थीं. और तो और धमाके की वजह से वहां के लोग उछलकर कई मीटर दूर जा गिरे थे. क़िस्मत से जिस इलाक़े में ये भयंकर धमाका हुआ, वहां पर आबादी बेहद कम या ना के बराबर थी. दुनिया इसे 'तुंगुस्का विस्फोट' के नाम से जानती है. कई वैज्ञानिक तो ये भी मानते हैं, कि इस धमाके से ज़मीन के अंदर जो हलचल पैदा हुई थी, उसे हज़ारों किलोमीटर दूर ब्रिटेन तक महसूस किया गया था.

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