Zee जानकारी: हम पाकिस्तान के खिलाफ ICJ जाने से क्यों कतराते हैं?

अंतिम अपडेट: May 20, 2017, 12:15 AM IST
Zee जानकारी: हम पाकिस्तान के खिलाफ ICJ जाने से क्यों कतराते हैं?

सवाल ये है कि पाकिस्तान के साथ लंबी दुश्मनी का इतिहास होने के बावजूद 2004 में सरकार ने एक पाकिस्तानी मूल के व्यक्ति को देश का वकील क्यों चुना? किसी विदेशी अदालत में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाला व्यक्ति, क्या भारतीय नहीं हो सकता था? क्या उस वक्त देश में कोई भी ऐसा वकील मौजूद नहीं था, जो International Court of Arbitration में भारत का पक्ष रख सकता? उस वक्त देश में कांग्रेस की सरकार थी और कांग्रेस पार्टी में तो बहुत बड़े-बड़े वकील मौजूद हैं. कपिल सिब्बल, पी चिदंबरम, सलमान खुर्शीद,  अभिषेक मनु सिंघवी वगैरह वगैरह तो फिर कांग्रेस ने अपने इन वरिष्ठ वकीलों को देश का पक्ष रखने के लिए क्यों नहीं भेजा? अगर ये मान भी लिया जाए कि कोई ऐसी Technicality थी कि इन लोगों को नहीं भेजा सकता था, तो सरकार देश के किसी दूसरे वरिष्ठ वकील को Hire कर सकती थी. अगर इसमें भी समस्या थी और देश में कोई ऐसा वकील मौजूद ही नहीं था, जो इस मामले पर भारत का पक्ष रख सके, तो फिर किसी विदेशी वकील को Hire किया जाना चाहिए था. 

ये बात वर्ष 2004 की है, जब दाभोल परियोजना में Enron कंपनी ने भारत सरकार पर 6 अरब अमेरिकी डॉलर यानी आज के हिसाब से करीब 38 हज़ार करोड़ रुपये का केस कर दिया था. और जब ये मामला International Court of Arbitration में गया, तो अपना केस लड़ने के लिए भारत सरकार ने इन्हीं खावर कुरैशी की सेवाएं ली थीं.

इस पूरे मामले को समझने के लिए हम आपको Flashback में लेकर चलते हैं और आपको ये बताते हैं कि ये पूरा विवाद था क्या? क्योंकि इस विवाद को समझे बगैर हम और आप आगे नहीं बढ़ सकते. महाराष्ट्र के रत्नागिरी में दाभोल पावर प्लांट बनाने वाली अमेरिकी कंपनी Enron ने आरोप लगाया कि भारत सरकार और महाराष्ट्र सरकार ने इस पूरे Project को लागू करने में कुछ करार तोड़े हैं और शर्तों को पूरा नहीं किया है. 

और 2003 में कंपनी इस पूरे मामले को लेकर ICC International Court of Arbitration में चली गई थी. ये भी एक तरह की अंतरराष्ट्रीय अदालत होती है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर के व्यापारिक विवाद सुलझाए जाते हैं. इसके बाद अगले वर्ष यानी 2004 में भारत में सरकार बदली और NDA की जगह केन्द्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली UPA की सरकार आ गई. 

2004 में नई सरकार ने आते ही सबसे पहले अपना Attorney General बदला और Milon Banerjee को नया Attorney General बना दिया. इसके बाद नये Attorney General ने दाभोल विवाद पर भारत का केस लड़ने वाली LAW FIRM, DLA PIPER को हटा दिया और FOX MANDAL को नियुक्त किया. FOX MANDAL ने Attorney General की सलाह पर खावर कुरैशी को अपना वकील चुना.  

लेकिन खावर कुरैशी भी अंतर्राष्ट्रीय अदालत में भारत के लिए ये केस नहीं जीत पाए और मई 2005 में अदालत ने भारत सरकार के खिलाफ फैसला दिया और कंपनी को 125 Million अमेरिकी डॉलर्स यानी आज के हिसाब से करीब 807 करोड़ रुपये का मुआवज़ा देने को कहा. हालांकि बाद में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर रोक लगा दी थी. 

5 साल पहले भारत और पाकिस्तान के बीच कारगिल युद्ध हुआ था. 1999 में ही इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट हाईजैक हुई थी, जिसमें भारत की तरफ से पाकिस्तानी आतंकवादियों को छोड़ा गया था, जिनमें मसूद अज़हर भी शामिल था. इसे कंधार हाईजैक कांड कहा जाता है. इसके अलावा 2001 में पाकिस्तानी आतंकवादियों ने भारतीय संसद पर हमला किया था. 

2002 में गुजरात के अक्षरधाम मंदिर पर आतंकवादी हमला हुआ था. ये हमला भी पाकिस्तानी आतंकवादियों ने ही किया था. इस हमले में भारत के 33 लोग मारे गए थे. 2003 में मुंबई में धमाके हुए थे, जिनमें 54 लोग मारे गए थे और वो Blast भी पाकिस्तानी आतंकवादियों ने ही किए थे. लेकिन इन तमाम आतंकी घटनाओं को नज़रअंदाज़ करते हुए तत्कालीन भारत सरकार ने पाकिस्तानी मूल के वकील को ही नियुक्त किया.

इसमें एक खतरा और था, जो उस वक्त की सरकार को ध्यान में रखना चाहिए था. दाभोल केस में जैसे ही सरकार ने पाकिस्तानी मूल के विदेशी वकील को नियुक्त किया, उसे इस केस से जुड़े हुए ज़रूरी दस्तावेज़ दिये गये होंगे. जिनमें बहुत गोपनीय CABINET NOTES भी शामिल रहे होंगे. इनमें कई संवेदनशील जानकारियां भी रही होंगी. अब इस बात की क्या गारंटी है कि इस वकील ने ऐसी जानकारियां किसी दूसरे देश या पाकिस्तान को नहीं सौंपी होंगी? हालांकि ऐसे मामलों में वकील लिखित आश्वासन देते हैं कि वो ऐसी जानकारियां Leak नहीं करेंगे, लेकिन इस बात की क्या गारंटी है, कि ऐसा नहीं हुआ होगा? 

1999 में कारगिल युद्ध के दौरान कैप्टन सौरभ कालिया को पाकिस्तानी फौजियों ने पकड़ लिया था. पाकिस्तानी सेना ने उन्हें बहुत Torture किया, उन्हें जलती हुई सिगरेट से जलाया गया था, कानों में गर्म सलाखें डाली गई थीं, हड्डियां और दांत तोड़े गए थे और उनकी आंखे भी निकाल ली गई थीं. किसी भी युद्ध बंदी के साथ ऐसा व्यवहार करना Geneva Convention के तहत गलत है लेकिन उस वक्त भारत इस मामले को लेकर अंतरराष्ट्रीय अदालत में नहीं गया.

2013 में UPA सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि सरकार 1972 के शिमला Agreement से बंधी हुई है और सौरभ कालिया के केस को WAR CRIME नहीं माना जा सकता. अगर सरकार ने उस वक्त भी आज जैसी तत्परता और हिम्मत दिखाई होती और हम अंतरराष्ट्रीय अदालत में गए होते, तो शायद आज तस्वीर कुछ और होती. इसी तरह से एक और भारतीय नागरिक सरबजीत को 1990 में पाकिस्तान ने गिरफ्तार किया था. सरबजीत पर पाकिस्तान ने जासूसी का आरोप लगाया था. और उसे मौत की सज़ा सुनाई थी. इसके बाद अप्रैल 2013 में पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में सरबजीत पर दूसरे कैदियों ने हमला किया और उसकी हत्या कर दी. हालांकि सरबजीत की मौत एक तरह से कूटनीतिक हत्या ही थी. लेकिन इसके बावजूद भारत की तत्कालीन सरकार सरबजीत के मामले को अंतर्राष्ट्रीय अदालत में लेकर नहीं गई. हमारा सवाल है कि क्यों नहीं गई. क्या सरकार में हिम्मत की कमी थी. क्या सरकार में आत्मविश्वास की कमी थी.

सय्यद अली शाह गिलानी के बेटे नईम गिलानी, पाकिस्तान के रावलपिंडी में Medical Practitioner हैं. उनके दूसरे बेटे ज़हूर गिलानी भारत की प्राइवेट एयरलाइन्स में Crew Member हैं. जबकि उनकी बेटी सउदी अरब के शहर जेद्दाह में एक Teacher हैं. मिरवायज़ उमर फारुक की बहन राबिया फारुक एक डॉक्टर हैं और लंडन में रहती हैं. गिलानी के क़रीबी मोहम्मद अशरफ के बेटे आबिद सेहराई दुबई में Computer Engineer हैं.

आसिया अंद्राबी की बहन मरियम अंद्राबी अपने पूरे परिवार के साथ मलेशिया में रहती हैं. आसिया अंद्राबी अपने बड़े बेटे को पढ़ाई के लिए मलेशिया भेजना चाहती थीं, लेकिन उसे पासपोर्ट देने से इंकार कर दिया गया. सय्यद अली शाह गिलानी के एक और क़रीबी अयाज़ अकबर के बेटे सरवर याकूब पुणे में Management Student हैं.