Opinion : BJP की दक्षिण विजय की राह में आने वाले रोड़े!

दक्षिण भारत में कर्नाटक एकमात्र राज्य है जहां भाजपा एक बार सत्ता में रह चुकी है, और पार्टी यहां की जीत के बल पर दक्षिण के राज्यों में अपनी पैठ बनाने की संभावनाओं के द्वार खोलना चाहती है.

Opinion : BJP की दक्षिण विजय की राह में आने वाले रोड़े!

भारतीय जनता पार्टी के लिए केंद्र में चार साल पहले सरकार बनाने के बाद से देश के जितने भी राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए हैं, वे सभी अंततः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का प्रश्न बन ही जाते हैं. यह कुछ तो पीएम मोदी के व्यक्तित्व और उनके द्वारा जगाई गई उम्मीदों की वजह से है, और कुछ विपक्ष के बनते-बिगड़ते एकता के समीकरणों की वजह से. अगले महीने (मई में) होने वाले कर्नाटक विधानसभा चुनाव के साथ भी कुछ ऐसा ही होने वाला है. दक्षिण भारत का यह एकमात्र राज्य है जहां भाजपा एक बार सत्ता में रह चुकी है, और पार्टी यहां की जीत के बल पर दक्षिण के राज्यों में अपनी पैठ बनाने की संभावनाओं के द्वार खोलना चाहती है.

चुनाव 12 मई को प्रस्तावित हैं और सत्तारूढ़ कांग्रेस का मुकाबला भाजपा और जनता दल (सेक्युलर) से है. बाकी दोनों दल अलग-अलग समय पर सत्ता में रह चुके हैं, और जेडीएस के लिए यह अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने का आखिरी मौका है. जेडीएस ने काफी पहले फरवरी में ही पहली सूची जारी कर दी थी और भाजपा ने 224 सदस्यों वाली विधानसभा के लिए 72 प्रत्याशियों की पहली सूची जारी की है, कांग्रेस में अभी भी नामों पर मंथन चल रहा है.

भाजपा के प्रत्याशियों के नाम सार्वजनिक होते ही हर चुनाव की तरह असंतुष्ट नेताओं की सक्रियता बढ़ गई है और टिकट-वंचितों के बागी होने की चर्चा तेज हो गई है. ऐसा होना किसी भी चुनाव के पहले कोई नई बात नहीं है क्योंकि कोई भी पार्टी चुनाव लड़ने के इच्छुक सभी प्रत्याशियों को खुश नहीं कर सकती, लेकिन कर्नाटक में कोई खतरा उठाने से बचने के बावजूद भाजपा की सूची पर स्थानीय नेता नाराज़ हैं. पहली सूची में पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा, जगदीश शेट्टार और केएस ईश्वरप्पा जैसे दिग्गज नेताओं के नाम शामिल हैं. विशेष तौर पर बीजापुर से अपु शेट्टी के स्थान पर बसवन्ना गौड़ पाटिल को टिकट देना, और बेलगांव के बैलहोंगल से जगदीश मेटगुट की जगह विश्वनाथ पाटिल को प्रत्याशी बनाने से इन जगहों पर भाजपा के लिए मुश्किल बढ़ सकती है.

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भाजपा की ओर से बाकी नाम भी अगले कुछ दिनों में घोषित किए जा सकते हैं. पर सवाल एक ही है - क्या भाजपा कर्नाटक में सत्ता में वापसी कर पाएगी? पार्टी ने येदियुरप्पा की लिंगायत समुदाय के अलावा अन्य लोगों के बीच लोकप्रियता पर भरोसा कर उन्हें अपना मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित किया है, लेकिन वे भाजपा के चुनाव प्रचार में प्रमुख भूमिका नहीं निभा रहे. उनकी जगह पार्टी में उनके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार ही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की सभाओं में साथ दिख रहे हैं. लिंगायत समुदाय में येदियुरप्पा को केंद्र में मंत्री न बनाए जाने और इस प्रचार में किनारे रखे जाने पर असंतोष है. साथ ही मुख्यमंत्री सिद्धरमैया द्वारा लिंगायत समुदाय को अलग धर्म का दर्जा दिए जाने के प्रस्ताव पर भी इस समुदाय के साधु-संतों ने संतोष प्रकट किया है. ऐसे में भाजपा के लिए दक्षिण की इस राह पर आगे बढ़ना उतना आसान नहीं है जितना चुनावी सभाओं में दावा किया जा रहा है.

चुनाव प्रचार में अमित शाह और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी राष्ट्रीय मुद्दों को ही उठा रहे हैं, जबकि सिद्धरमैया ने अपने कार्यकाल में गरीबों के कल्याण के लिए तमाम योजनाएं चलाकर समाज के एक वर्ग में कांग्रेस के पक्ष में समर्थन जुटाया है. प्रदेश के अधिकतर राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि अमित शाह और राहुल अपने-अपने दलों में मजबूत प्रत्याशी का दावा और मजबूत तो कर सकते हैं, लेकिन अपने दम पर किसी की जीत सुनिश्चित नहीं कर सकते. दोनों ही नेता लोगों से संवाद करने के लिए दुभाषिए की मदद लेते हैं, और स्थानीय मुद्दों पर बात करने की बजाए एक दूसरे के प्रादेशिक नेताओं (सिद्धरमैया और येदियुरप्पा) की आलोचना ही करते सुनाई देते हैं. जहां अमित शाह के पास मोदी सरकार की उपलब्धियों का सहारा है, तो वहीं राहुल मोदी सरकार के वादा न पूरा कर पाने पर हमला बोलते हैं.

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जातिगत समीकरणों को देखें तो अधिकतर प्रमुख जातियों, पिछड़े और कमजोर वर्ग के बीच कांग्रेस का पलड़ा भारी है. भाजपा लिंगायत समुदाय के अलावा तटीय कर्नाटक के उडिपी और दक्षिण कन्नड़ में शेट्टी, जैन, गौड़ और वोक्कालिगा समुदाय के बीच अपने समर्थन पर निर्भर है. उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश के हुबली और बेंगलुरू में सभाएं कर बहुसंख्यक समुदाय को लुभाने की कोशिश की थी. लेकिन इन इलाकों में रहने वाले तमिल व केरल मूल के लोगों व अनुसूचित जाति के लोगों के बीच योगी के बीफ-विरोधी बयान का अपेक्षित असर होने पर सवाल उठ रहे हैं.

कांग्रेस के लिए कर्नाटक में जीत हासिल करना राहुल गांधी के नेतृत्त्व के मजबूत होने के लिए जरूरी है, अन्यथा कांग्रेस के अंदर और अन्य विपक्षी दलों में मोदी-विरोधी गठजोड़ बनाने के लिए उनकी क्षमता के प्रति विश्वास कम होगा. जेडीएस के लिए बाहरी बनाम स्थानीय के मुद्दे के बल पर उतनी सीटें जीतना जरूरी है कि उसके बिना कोई सरकार न बन पाए. और भाजपा के लिए तो यह एक बार फिर मोदी की ही परीक्षा है. पिछले चार सालों में गुजरात में असहज जीत से लेकर त्रिपुरा में अप्रत्याशित जीत के बीच केवल दिल्ली और बिहार के चुनाव में ही भाजपा को हार का सामना करना पड़ा (हालांकि बिहार में पार्टी फिर सत्ता में है), जबकि पश्चिम बंगाल व केरल में पार्टी सत्ता की दौड़ में नहीं थी. लेकिन इन सभी चुनावों में पीएम मोदी की विश्वसनीयता ही दांव पर लगी थी. कर्नाटक में भी कुछ ऐसा ही होगा इसमें संदेह नहीं है.

(रतनमणि लाल वरिष्ठ लेखक और स्‍तंभकार है)
(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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