माया की राज-नीति
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माया की राज-नीति

माया की राज-नीतिवासिन्द्र मिश्र

क्या बीएसपी सुप्रीमो मायावती अपने राजनैतिक जीवन के तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद स्वर्गीय कांशीराम के सियासी फलसफे को आगे बढ़ाने में लगी है? अगर मायावती के पिछले कुछ साल के राजनैतिक फैसलों पर नज़र डाला जाए तो इस सवाल का जवाब खुद-ब-खुद मिल जाता है।

कांशीराम कहा करते थे कि देश में कमजोर और मजबूर सरकार का रहना बहुजन समाज के हित में है। उनका ये भी मानना था कि देश में जितनी जल्दी-जल्दी चुनाव होंगे उतनी ही तेजी से बहुजन समाज की राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक तरक्की होगी और सत्ता में दलितों की भागीदारी बढ़ाने में मदद मिलेगी। मायावती अपने सियासी फैसलों के जरिए कांशीराम के इसी एजेंडे को आगे बढ़ाती नजर आ रही हैं। मायावती अपने वोटरों के फायदे के लिए साम, दाम, दंड, भेद हर नीति आजमाती हैं ।

उन्होंने लोकसभा में मल्टी ब्रांड रिटेल में विदेशी निवेश के मसले पर हुई वोटिंग से वॉकआउट कर यूपीए सरकार को संकट से उबारा और राज्यसभा में मुश्किल में फंसी सरकार के समर्थन में वोट डालकर सरकार को संजीवनी दी। इस एक फैसले के जरिए मायावती ने एक तीर से कई निशाना साधने की कोशिश की है।

दरअसल, यूपीए सरकार फिलहाल समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के समर्थन की बैसाखी पर टिकी है। लेकिन मनमोहन सरकार को कई मुद्दों पर समर्थन देने के मामले में समाजवादी पार्टी में भ्रम की स्थिति रही है। उधर समाजवादी पार्टी के धुर विरोधी बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने अपना रुख हमेशा साफ रखते हुए सरकार का समर्थन किया। माना जा रहा है कि इस समर्थन के बदले मायावती यूपीए सरकार से उम्मीद करती है कि सरकारी नौकरियों में एससी एसटी के लिए पदोन्नति में आरक्षण को लेकर संविधान संशोधन बिल इसी सत्र में पेश किया जाएगा। इसके जरिए मायावती अपने वोटरों को ये संदेश देना चाहती हैं कि उनकी पार्टी का अंतिम लक्ष्य दलितों का हित है और इसके लिए उन्हें सियासी सौदेबाजी से भी कोई परहेज नहीं है। कांशीराम की सियासत की भी यही फिलॉसफी रही है।

इससे पहले भी कई मौकों पर मायावती ने कांशीराम की इसी रणनीति के आधार पर फैसले लिए हैं। 2007 में राष्ट्रपति चुनाव में प्रतिभा पाटिल के पक्ष में यूपीए को बीएसपी ने समर्थन दिया था। कहा जाता है कि इस फैसले के बाद ही उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल टीवी राजेश्वर ने ताज कॉरिडोर मामले में मायावती के खिलाफ केस चलाने की इजाजत नहीं दी थी। इस साल भी राष्ट्रपति चुनाव में मायावती ने यूपीए उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी को समर्थन देने का ऐलान किया जिसके बाद उन्हें आय से अधिक संपत्ति के मामले में बड़ी राहत मिली थी।

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले में सीबीआई जांच ही खारिज कर दी थी और कहा था कि न्यायालय ने जांच एजेंसी को इस संबंध में कोई निर्देश नहीं दिए थे। इस फैसले के खिलाफ सीबीआई अपील कर सकती थी लेकिन जांच एजेंसी ने ऐसा नहीं किया। साफ है जितनी बार मायावती ने सरकार की मदद की है, सरकार से उन्होंने प्रत्यक्ष या फिर अप्रत्यक्ष रूप से फायदा लिया है।

(लेखक ज़ी न्यूज़ उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड के संपादक हैं)


First Published: Friday, December 07, 2012, 19:04

टिप्पणी

MAHESH MEGHWAL - KOTA
bahin mayavati is only one strong leed of dalits communit in our country that is provey
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Md furkan - K S A
bilkul sahi hye
जवाब

garbar.singh - Delhi
initially in free india, there had been major two political parties congress and b.j.p.(may be in other names).now samajwadi party snatched votes of muslims and b.s.p.of dalits.resultantly congress lose voters because muslim and dalit had been the voters of congress.congress is on forth position in u.p. b.j.p.s voter which did not shake now appears to be divided between s.p.and b.j.p.if b.j.p.supports s/c,s/t reservation in promotion bill.consequently b.j.p.may loose its voters and go on lower position.
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