आडवाणी की `लालसा`

Last Updated: Monday, June 17, 2013 - 10:09

वासिंद्र मिश्र
लालकृष्ण आडवाणी के इस्तीफे के बाद बीजेपी में मचे सियासी बवंडर के बीच राजनीति के जानकार इसे आडवाणी की दूरगामी रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं। आडवाणी और उनकी राजनीति को जानने वाले लोगों का मानना है कि अभी भी लालकृष्ण आडवाणी की नज़र 2014 के लोकसभा चुनावों पर हैं। आडवाणी को लगता है कि 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद देश के सामने एक बार त्रिशंकु लोकसभा सामने आएगी और ऐसे हालात आने पर आडवाणी खुद को गैर कांग्रेसी और गैर मोदी विकल्प के तौर पर देश के सामने अपनी मौजूदगी को दर्ज कराने की ख्वाहिश रखते हैं।
शायद लालकृष्ण आडवाणी के सामने साल 1989 की वो सियासी तस्वीर है जब दो धुर सियासी ध्रुवों ने विश्वनाथ प्रताप सिंह को देश का प्रधानमंत्री बना दिया था। ये वो समय था जब कांग्रेस को सत्ता से दूर करने के लिए वामदलों और बीजेपी दोनों ने यूनाइटेड फ्रंट की सरकार को अपना समर्थन दे दिया था।
वास्तव में आडवाणी ने अपनी इस रणनीति की आधारशिला जून के ही महीने में साल 2005 में पाकिस्तान में रखी थी जब उन्होंने ना सिर्फ जिन्ना की मजार पर चादर चढ़ाई बल्कि जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष तक ठहरा दिया और इसके बाद भारत आने पर संघ के साथ साथ बीजेपी में भी उन्हें तीखा विरोध झेलना पड़ा और बीजेपी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा तक देना पड़ा था।

अब अगर आडवाणी के इस्तीफे की पंक्तियों पर गौर करें तो उसी के मुताबिक ये साफ है कि वो पार्टी के सांगठनिक पदों से तो त्यागपत्र दे रहे हैं लेकिन पार्टी की प्राथमिक सदस्यता उन्होने अपने पास रखी है। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, नानाजी देशमुख, पंडित अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं के जिन सिद्धांतों की बात आडवाणी कर रहे हैं, अगर बीजेपी वाकई उन पर नहीं चल रही हैं तो वो ऐसी सिद्धांतविहिन पार्टी की प्राथमिक सदस्यता क्यों नहीं छोड़ देते।
ऐसा लगता है कि पार्टी की सदस्यता बरकरार रखने के पीछे भी आडवाणी की भविष्य की राजनीति छिपी है वो आज भी एनडीए के चेयरमैन हैं और ये पद उनके पास तब तक है जब तक वो बीजेपी के सदस्य है क्योकि बीजेपी एनडीए में सबसे बड़ा घटक दल है। लिहाजा एनडीए का चेयरमैन बीजेपी का ही चुना जाना स्वाभाविक है।
आडवाणी बहैसियत एनडीए के चेयरमैन ही 2014 का सपना देख रहे हैं जिसमें ऐसी पार्टियां जो गैर कांग्रेसी हैं और मोदी की विरोधी हैं वो उन्हे सर्वमान्य नेता मान लें और आम सहमति से त्रिशंकु लोकसभा आने पर भी अपना दावा आडवाणी मजबूती के साथ रख सकें। आडवाणी कितना कामयाब होते हैं ये तो वक्त ही बता पाएगा लेकिन फिर भी बीजेपी के `लाल` के मन में ये लालसा जरूर है कि अगर उनकी सियासी गणित सही बैठी तो देश में एक बार फिर से यूनाइटेड फ्रंट मॉडल की सरकार बनाने का उनका सपना पूरा हो सकेगा।
लेखक ज़ी रीजनल चैनल्स (हिंदी) के संपादक हैं।



First Published: Monday, June 10, 2013 - 21:26


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