...और कितने `तेलंगाना`

Last Updated: Friday, August 2, 2013 - 17:16

बिमल कुमार
तेलंगाना राज्‍य के गठन को हरी झंडी मिलने के बाद इसके छह माह के भीतर अस्तित्‍व में आने का रास्‍ता तो साफ हो गया, लेकिन इस फैसले से अब कई गंभीर सवाल उठने लगे हैं। अब दो दर्जन से भी ज्‍यादा राज्‍य अलग होने की मांग तेज करेंगे। देश के विभिन्‍न हिस्‍सों में नए राज्‍यों के गठन की मांग वैसे ही तेज होने लगी है और समय के अंतराल के साथ यह मांग और जोर पकड़ेगी। इसमें कोई संशय नहीं है कि आंदोलन के आधार पर नए राज्य के गठन से खतरनाक परिपाटी बनेगी, जिस पर रोक लगाना खासा मुश्किल होगा। यहां सवाल केवल राज्‍यों के पुनर्गठन का नहीं है बल्कि इससे देश के समक्ष आने वाली कई गंभीर चुनौतियां भी हैं।
जिन नए राज्‍यों के लिए `चिंगाड़ी` भड़कने की संभावना है, उसमें विदर्भ, गोरखालैंड, हरित प्रदेश, बुंदेलखंड, बोडोलैंड, मिथिलांचल, पूर्वांचल, सौराष्‍ट्र, कुर्ग, कोंगुनाडु, गोंडवाना, लद्दाख समेत आदि शामिल हैं। इसमें कोई शक नहीं कि राजनीतिक दल अपने-अपने हिसाब से फायदे को देखते हुए इसके लिए जोड़ तोड़ करेंगे क्‍योंकि अगला आम चुनाव सिर पर जो है। मकसद यह होगा कि इसे और हवा दिया जाए ताकि अपना सियासी समीकरण मनमुताबिक तय किया जा सके।
कई दूसरे राज्यों के गठन की मांग को लेकर मचे कोलाहल के बीच सौराष्ट्र संकलन समिति ने भी सौराष्ट्र राज्य के गठन के लिए आवाज बुलंद करनी शुरू कर दी है। वहीं, गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) ने पश्चिम बंगाल से अलग गोरखालैंड की मांग को लेकर दार्जिलिंग हिल्स में आंदोलन शुरू कर दी है। इनका तर्क यह है कि पृथक राज्य के लिए उनकी मांग तेलंगाना से भी पुरानी है। वहीं, विदर्भ को लेकर भी सुर तेज होने लगे हैं। यूपी के बंटवारे को लेकर सियासी रोटिंया अभी से सेंकी जाने लगी हैं। मांग की कतार में और भी कई हैं। इससे निश्चित ही अखंडता और शांति भंग होने का खतरा बनेगा। नए राज्‍यों की मांग भले पूरी न हो पर इससे देश के अन्य हिस्सों में उपद्रवों को प्रोत्साहन तो मिलेगा ही।
अभी तेलंगाना को बनने में छह माह लगेंगे पर आंध्र प्रदेश के कुछ कांग्रेस सांसद और विधायक पृथक तेलंगाना के गठन का खुलकर विरोध कर रहे हैं। कइयों ने तो इस्‍तीफा तक दे दिया है। इन हालातों में क्षेत्रीय शांति भंग होने और अस्थिरता पैदा होने का खतरा पैदा हो गया है। यदि नए राज्‍यों के गठन को थोड़ा भी बढ़ावा मिला तो यह देश के सामने एक नई मुसीबत बन सकती है। होना तो यह चाहिए कि राज्‍यों के बंटवारे में सियासत न हो। वरना, तेलंगाना का गठन न जानें कितने और राज्‍यों के लिए दरवाजे खोल देगी।
नए राज्‍य की घोषणा के साथ ही कानून व्‍यवस्‍था की स्थिति बिगड़ने लगी है। हो सकता है कि स्थिति गंभीर हो जाए। चूंकि हैदराबाद के तेलंगाना क्षेत्र में होने के कारण आपत्ति जताई जाने लगी है। हमें यह तथ्‍य नहीं भूलना चाहिए कि अलग तेलंगाना की मांग को लेकर अब तक करीब एक हजार से ज्‍यादा लोग आत्‍महत्‍या कर चुके हैं।
आंध्र प्रदेश के बंटवारे के समय को लेकर भी सवाल उठने लगा है। आम चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस का यह फैसला सियासत से अछूता नहीं कहा जाएगा। इस समय आंध्र में कुल 42 सीटें हैं, जिसमें से अब 25 आंध्र के पास रहेंगे और 17 तेलंगाना के पास। कांग्रेस को इन सीटों पर कितना लाभ मिल पाता है, यह तो आने वाला समय ही तय करेगा। हालांकि तेलंगाना की तुलना और राज्यों से नहीं की जा सकती क्योंकि पहले राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों में इसका संदर्भ था। वैसे तो पहले राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों में विदर्भ का भी संदर्भ था, तो फिर विदर्भ को लेकर भी सरकार को घोषणा कर देनी चाहिए। मगर फिलहाल ऐसा संभव नजर नहीं आता।
बीते दशक में तीन नए राज्‍यों झारखंड, उत्‍तराखंड और छत्‍तीसगढ़ का गठन हुआ, पर अभी तक वहां के सामाजिक-आर्थिक जीवन में कोई खास बदलाव नहीं आया। सामाजिक-आर्थिक विकास के पैमाने पर इन राज्‍यों की स्थिति राष्‍ट्रीय औसत से बेहतर नहीं है। जबकि खनिज संपदाओं से भरपूर इन राज्‍यों की स्थिति अपने मूल राज्‍यों से बेहतर होनी चाहिए थी। इन राज्‍यों के गठन में दशक से ज्‍यादा का समय भी बीता पर असल तस्‍वीर नहीं बदली। राजनेताओं को कुर्सी तो मिल गई पर जनता अभी तक खाली हाथ ही है। क्‍या तेलंगाना में इससे उलट स्थिति बन पाएगी। राजनीतिक आका इस प्रांत का अब वाकई कल्‍याण चाहेंगे।
आंध्र प्रदेश से तेलंगाना को अलग करने के फैसले से इस क्षेत्र के निवासियों का पांच दशक पुराना सपना साकार तो हो गया, लेकिन असली सवाल यह है कि मौजूदा परिप्रेक्ष्‍य में तेलंगाना का सही मायनों में विकास हो पाएगा। चूंकि सूबे के अधिकांश पिछड़े क्षेत्र इसी के तहत आते हैं। इन क्षेत्रों में कितनी समृद्धि आती है, यह‍ तो समय ही बताएगा। हालांकि, सवाल तेलंगाना के संसाधन को लेकर भी था। जिसका लाभ आंध्र प्रदेश के अन्‍य हिस्‍सों को ज्‍यादा मिला और यह क्षेत्र इससे वंचित रह गया।
भाषाई आधार पर गठित आंध्र प्रदेश देश का ऐसा पहला राज्य होगा जिसका विभाजन होगा। साल 1948 में तेलंगाना सहित हैदराबाद रियासत को भारत में मिलाया गया। फिर 1956 में मद्रास स्टेट से तेलंगाना को अलग कर आंध्र स्टेट में शामिल कर तेलुगूभाषियों के लिए एक अलग राज्य आंध्र प्रदेश की स्थापना की गई। हालांकि क्षेत्रों का यह सम्मिलन कभी सुखदायी नहीं रह पाया। तेलंगाना को अलग राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर 1969 में `जय तेलंगाना` आंदोलन की शुरुआत हुई, जिसके बाद सैकड़ों लोग मारे गए। तेलंगाना आंदोलन को जीवित रखने के लिए के. चंद्रशेखर राव ने तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) की स्थापना की। पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी के दुर्घटना में निधन के कारण राज्य राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति बन गई। फिर साल 2009 में चंद्रशेखर राव ने पृथक तेलंगाना के लिए जोरदार आमरण अनशन शुरू किया। अंतत: कांग्रेस ने पृथक तेलंगाना राज्य के गठन का निर्णय लिया। अब इस निर्णय को सियासी समीकरण कहें या जन दबाव, लेकिन हकीकत यह है कि 57 वर्षों के बाद आंध्र प्रदेश इतिहास के पन्नों में समाना अब तय हो गया है।
समान भाषा होने के बावजूद आंध्र और तेलंगाना के बीच व्यापक सांस्कृतिक और समाजिक-आर्थिक भिन्नताएं हैं। वहीं, तटीय आंध्र और रायलसीमा क्षेत्रों में भी सांस्कृतिक भिन्नताएं हैं। बंजर जमीन और सिंचाई के अभाव के कारण तेलंगाना आज तक पिछड़ा है। सूखा प्रभावित और हत्याओं के लिए कुख्यात रहा रायलसीमा क्षेत्र भी पिछड़ा है। तेलंगाना का समुचित विकास ही राजनेताओं की प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं हो पाता है तो फिर राज्‍यों के बंटवारे का कोई मतलब ही नहीं रह जाता। महज राज्‍यों का विभाजन कर देना ही समस्‍या का असली समाधान नहीं है। चूंकि एक नए राज्‍य के गठन के बाद लाखों करोड़ रुपये की जरूरत होगी, जिससे वहां सभी जरूरी बुनियादी ढांचा और जरूरी तंत्र विकसित किया जा सके। साथ ही पूरे सूबे में नए सिरे प्रशासनिक व्‍यवस्‍था भी एक गंभीर चुनौती होती है। अभी तक का इतिहास यही दर्शाता है कि राज्‍यों का पुनर्गठन न देश और न ही जनहित में साबित हुआ है।
तेलंगाना का गठन कहीं अन्‍य नए राज्‍यों के लिए दरवाजे न खोल दे। आज देश के कई हिस्सों से अलग राज्य बनाने की मांग उठ रही है। तो क्‍या महज विरोध प्रदर्शनों के आधार पर ही राज्य को बना दिया जाए। सबसे पहले ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का अध्ययन करना जरूरी होता है। साथ ही वहां की जरूरतें और स्थितियां क्‍या हैं, उसे भी ध्‍यान में रखा जाना चाहिए। राज्‍यों के पुनर्गठन में सियासत को पूरी तरह दरकिनार करना चाहिए। देश में वैसे ही क्षेत्रीय, भाषाई, भौगोलिक, सांस्‍कृतिक, सामाजिक आधार पर नए राज्‍यों की मांगें उठती रही हैं।



First Published: Friday, August 2, 2013 - 17:16


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