नक्‍सल आंदोलन और मुख्यधारा

Last Updated: Monday, May 27, 2013 - 13:15

बिमल कुमार

हाल के कुछ सालों में नक्सली हिंसा की समस्या अधिक गंभीर तरीके से उभरी है और यह देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खासा मुश्किलें खड़ी कर रही है। पूरे मध्य भारत में नक्सल आंदोलन का विस्ता़र हो गया है और यह लाल गलियारे के नाम से चर्चित भी है। इस आंदोलन की शुरुआत एक विचारधारा के स्तर पर हुई थी। नक्सल हिंसा की घटनाएं पहले भी सामने आती थीं,पर इसका स्वरूप इतना विकराल नहीं था जितना आज है। आए दिन नक्सल प्रभावित राज्यों में कभी सुरक्षा बलों के जवानों तो कभी निर्दोष नागरिकों को मौत के घाट उतारे जाने की घटनाएं सामने आती रहती हैं। परंतु इस गंभीर समस्या का समुचित हल निकालने की ठोस कवायद आज तक अमल में नहीं लाई गई। यू कहें कि सरकार ने इस ओर कभी गंभीरता से देखा ही नहीं। जिसका परिणाम यह हुआ कि नक्सलवाद और पनपता गया और ग्रामीण क्षेत्रों में इसका खासा विस्तार हो गया।
नक्सली अपने उद्देश्यों को साधने के लिए आदिवासियों के क्षेत्र और मुद्दों का सहारा ले रहे हैं। पर इसे फैलने से रोकने के लिए आज भी पर्याप्त कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। झारखंड, छत्तीयसगढ़, ओडिसा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र आदि राज्यों में माओवादी कैडरों ने इतनी गहरी जड़ें जमा ली हैं कि इसे सिर्फ सुरक्षा बलों के सहारे अभियान चलाकर पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता है।
जरूरत इस बात की है कि इन कैडरों को समाज की मुख्यधारा में वापस लाए जाने के लिए हर स्तर पर ठोस पहल की जाए। नक्सवल प्रभावित क्षेत्रों में अभाव, उपेक्षा, गरीबी का दंश झेल रहे लोगों के लिए सरकारी स्तर पर सहूलियतें मुहैया करवाया जाना प्राथमिकता सूची में शीर्ष पर होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो समस्यांए खत्म होने की बजाय बढ़ती ही जाएगी। वैसे भी यह सरकारी तंत्र के लिए गले की फांस बन ही चुका है। हालांकि माओवादी कैडरों के लिए आत्म समर्पण की नई नीति अमल में लाई जा रही है,पर देखना यह होगा कि मुख्यधारा में इन कैडरों की वापसी की दिशा में यह कितना कारगर हो पाता है।
इस नीति को कामयाब बनाने के लिए सार्थक सोच का होना भी बहुत जरूरी है। जब कोई माओवादी सरेंडर करता है तो लाजिमी है कि उसकी समाज की मुख्यधारा में वापसी हो रही है। पर इसे बनाए रखने के लिए हर उस शख्स को सरकारी स्तर पर वह सुविधाएं मिलनी चाहिए ताकि वह फिर माओवाद की विचारधारा के गिरफ्त में नहीं आ सके।
नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में यदि कोई चीज सबसे कारगर हो सकती है तो वह है विकास। इलाकों में अभियान चलाकर विकास कार्यक्रमों पर जोर देना खासा जरूरी है। तभी हम नक्ससल विचारधारा से लोगों को दूर रखने में कुछ कामयाबी पा सकते हैं। आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर जो चुनौतियां गंभीर तरीके से उभरी हैं, उनसे निपटने के लिए काफी अधिक प्रयास करने की दरकार है।
बीते दिनों इस चर्चा ने जोर पकड़ लिया था कि आतंकवाद के मुकाबले नक्सलवाद ज्यादा बड़ा खतरा है। नक्सलवाद के रूप में आज ऐसे संगठनों से जूझना पड़ रहा है जो हिंसा के बल पर शासन और कानून तक को चुनौती दे रहे हैं। बीते दिनों नक्सलियों के खिलाफ प्रभावी अभियान चलाने एवं सीमावर्ती क्षेत्रों में आपसी समन्वय एवं सहयोग से सीमावर्ती क्षेत्रों को नक्सल मुक्त कराने को लेकर ठोस पहल की गई। परंतु इसके नतीजे कुछ खास सकारात्मक नजर नहीं आते। चूंकि माओवादी कैडर दिनोंदिन मजबूत होते जा रहे हैं। इस समस्याओ के निदान का एकमात्र विकल्प है इन कैडरों की मुख्याधारा में वापसी।
माआवोदियों की मंशा शुरू से ही बंदूक के बल पर समानांतर सत्ता कायम करने की रही है और पिछड़े इलाकों में ऐसा करने में इन्हें कुछ हद तक कामयाबी भी मिली है। प्रभावित क्षेत्रों में इनके समर्थक भी कम नहीं हैं। विचाराधारा के स्तर पर इनकी सक्रियता ऐसी है कि लोग झांसे में आकर कैडरों से जुड़ते चले जाते हैं। इन हालातों में लोगों को इससे प्रभावित होने से रोकने के लिए और कदम उठाए जाने चाहिए। महज समस्या की थाह लेने भर से ही उसका निदान होने वाला नहीं है। सवाल यह है कि माओवाद के खतरे से निपटने के लिए किस स्तर पर और कितने सार्थक कदम उठाए जा रहे हैं। नक्सल ग्रस्त इलाकों की समस्याओं का समाधान कतई आसान नहीं होगा,पर इसके लिए सतत कार्यक्रम योजनाबद्ध तरीके से चलाना होगा।
वैसे भी देश के तकरीबन साठ जिले नक्सलवाद की चपेट में हैं। नक्सोल प्रभावित राज्यों में उठाए जाने वाले सभी कदमों की जिम्मेदारी राज्य सरकार को भी लेनी चाहिए। नक्सलवाद से निपटने के लिए संयुक्त अभियान के अलावा राज्य अपने स्तर पर भी प्रयास करते हैं,परंतु यह नाकाफी साबित हो रही है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि केंद्र के सीमित संसाधनों से नक्सलियों का हौसला और बढ़ रहा है। राज्यों को केंद्र की मदद पर्याप्त साबित नहीं हो रही है। सवाल यह भी खड़ा होता है कि यदि राज्य सरकारें माओवादी संगठनों से निपटने में सक्षम होतीं तो नक्सलवाद बेकाबू क्यों होता।
नक्सलवाद को केवल कानून-व्यवस्था के नजरिए से देखना उचित नहीं है। इस समस्या से निपटने को विशेष प्रयास करने होंगे। खनिज एवं वन संपदा वाले आदिवासी इलाकों में नक्सलवाद की मूल वजह पिछड़ापन और विकास का अभाव है। नक्सल विचारधारा को माननेवाले लोकतंत्र, संवैधानिक मूल्यों, राजनीतिक व्यवस्था को नहीं मानते हैं। मौजूदा समय में माओवाद की समस्या दो तरीके से चुनौती पेश कर रही है। पहला विचारधारा के स्तर पर और दूसरा अपराध के स्तर पर जिसमें जबरन धन उगाही आदि शामिल है। आज नक्सली कई जगहों पर विकास योजनाओं में बाधा बनते हैं और इसके एवज में जबरन उगाही करते हैं। अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए वे हिंसक रास्ता अख्तियार कर रहे हैं। ऐसे में जरूरत है इन्हें मुख्यधारा में वापस लाने की। तब जाकर ही इस गंभीर समस्या से निपटने में मदद मिल पाएगी।

माओवादियों के आत्मसमर्पण को लेकर केंद्र की ओर से जो नई नीति बनाई गई है,उसके उत्साहजनक परिणाम कुछ हद तक सामने आ सकते हैं। हिंसा छोड़ने की इच्छा रखने वाले नक्सलियों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने, उनके रोजगार की व्यवस्था करने और उन्हें आर्थिक मदद देने की पेशकश उन्हें हथियार डालने के लिए निश्चित तौर पर प्रेरित करेगी।
माओवादी कैडरों का एक बड़ा वर्ग है, जो मुश्किल हालात से मुक्त होना चाहता है और हिंसा का रास्ता त्यागने की मंशा रखता है। हालांकि कई बार निर्णय नहीं ले पाने के कारण ये कैडर हथियार डालने से डरते हैं,लेकिन सरकार की नई आत्मसमर्पण नीति उसे अवश्य प्रेरित करेगी। इस नीति में आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को अधिक आर्थिक मदद की पेशकश की गई है। उनके हथियार की किस्म के मुताबिक उन्हें राशि देने का भी प्रस्ताव है। साथ ही उन्हें पेशेवर प्रशिक्षण प्रदान कर समाज की मुख्यधारा से जोड़ने और अपने दम पर आजीविका कमाने के अवसर देने का प्रावधान है।
माओवादियों को वार्ता के लिए तैयार करने में विफल रहने के बाद सरकार की तरफ से धनराशि बढ़ाने का कदम भी उठाया गया है। बीते दिनों कुछ ऐसी भी खबरें आई थीं कि माओवादियों में गुटबाजी के चलते भी कई कैडर अब अलग होना चाहते हैं। ऐसे में यह नीति उन अलग हो रहे कैडरों के लिए मुफीद साबित होगी।
आत्मसमर्पण और पुनर्वास की नई नीति के तहत योग्य पाये जाने वाले कैडरों को पुनर्वास शिविर में रखा जाएगा और रोजगारपरक प्रशिक्षण दिया जाएगा। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें चार हजार रुपये मिलेंगे जो तीन साल तक मिलते रहेंगे। इससे पहले की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीतियों में आत्मसमर्पण करने वाले नक्सली को डेढ़ लाख रुपये मिलते थे और मासिक मेहनताना दो से साढ़े तीन हजार रुपये के बीच था। नई नीति के तहत हथियार के साथ आत्मसमर्पण करने वाले माओवादी को हथियार के बदले रुपये तक मिल सकते हैं।
राज्यों को भेजी गई नई नीति में कहा गया है कि वे आत्मसमर्पण करने वाले नक्सल कैडरों को अदालत में चल रहे मुकदमों में मदद के लिए कानूनी सहायता और वकील मुफ्त मुहैया कराएं। केंद्र का यह सुझाव भी है कि आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों पर चल रहे मुकदमों की तेज कार्यवाही सुनिश्चित करने के लिए फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन किया जाए। इन नीतियों का निश्चित तौर पर प्रतिफल सामने आएगा बशर्ते कि इसे सम्यक तरीके से लागू किया जाए। आपसी तालमेल और बेहतर कार्ययोजना ही माओवादियों को मुख्यलधारा में वापस लाने में कारगर होगा।



First Published: Tuesday, April 30, 2013 - 23:27


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