पुलिस vs पुलिस

Last Updated: Saturday, January 26, 2013 - 21:04

वासिन्‍द्र मिश्र
पुलिस सिस्टम प्रणाली में सुधार की बात कई बार उठी है, लेकिन हाल ही में दिल्ली पुलिस की कार्यशैली ने एक बार फिर से बहस छेड़ दी है कि देश के कुछ शहरों में जारी पुलिस कमिश्नरेट सिस्टम कितना प्रभावशाली है। दिल्ली, मुंबई औऱ बंगलुरु जैसे शहरों में पुलिस कमिश्नरेट सिस्टम लागू है, जहां पर मजिस्ट्रियल पावर के अलावा भी पुलिस को कई अतिरिक्त अधिकार मिले हुए हैं। मुद्दा ये है कि पुलिस कमिश्नरेट सिस्टम बेहतर है या मौजूदा समय में जो मजिस्ट्रियल प्रणाली है वो ज्यादा बेहतर हैं।
पुलिस प्रणाली में सुधार और पुलिस कमिश्नरेट सिस्टम को लागू करने की बातें कई बार उठती रही हैं, लेकिन मुद्दा ये है कि क्या दिल्ली पुलिस की कार्यशैली पर उठे सवालों के बाद सभी राज्यों में पुलिस कमिश्नरेट सिस्टम लागू होना चाहिए? मौजूदा वक्त में पूरे देश में 47 पुलिस कमीश्नर हैं जबकि बाकी जगह डीजीपी और आईजी समेत एसएसपी स्तर के अफसर कानून व्यवस्था संभालते हैं। पुलिस कमिश्‍नर प्रणाली की तहत अधिकारियों के पास ज्यादा अधिकार रहते हैं, जबकि मौजूदा वक्त में जो व्यवस्था है उसके तहत मजिस्ट्रेट के पास व्यापक अधिकार रहते हैं। लिहाज़ा जिले में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस को मजिस्ट्रेट पर निर्भर रहना पड़ता है।
क्या है पुलिस कमिश्नरेट सिस्टम?
दरअसल ये व्यवस्था अंग्रेजों के ज़माने की है।
1. जिन शहरों की आबादी 10 लाख से ज्यादा है वहां कमिश्‍नर की नियुक्ति की जाती है।
2. दिल्ली में 1979 में जेएन चतुर्वेदी को पहला पुलिस कमिश्नर नियुक्त किया गया।
3. पुलिस के पास सीआरपीसी के तहत कई अधिकार आ जाते हैं, जिसमें भीड़ पर लाठीचार्ज, फायरिंग, धारा 144, होटल बार लाइसेंस, आर्म्स लाइसेंस जारी करने के अधिकार रहते हैं।
4. आरोपी पर ज़ुर्माना लगाकर उसे जेल भेजने, राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, नारकोटिक्स, एक्साइज़ संबंधी शक्ति भी पुलिस कमिश्नर के पास रहती है।
5. मजिस्ट्रियल सिस्टम में धारा 144, 07 और 51 की पावर डीसी के पास होती है।

पुलिस कमिश्नरेट सिस्टम कोलकाता में अंग्रेज़ों के ज़माने से लागू है, दक्षिण भारतीय राज्यों में इसे प्रमुखता से लागू किया गया है। इसके अलावा हरियाणा के अबाला और फरीदाबाद में हाल ही में इसे लागू किया गया है। बाकी उत्तरी भारतीय राज्यों यूपी और बिहार में ये व्यवस्था नहीं है। यूपी में लंबे अरसे से पुलिस कमिश्‍नर प्रणाली लागू करने की मांग होती रही है, लेकिन ऐसा माना जाता है कि आईएएस अधिकारी इसका पुरजोर विरोध करते आए हैं। 2007 में विधान सभा में भी ये मुद्दा उठा था तो बीएसपी ने इसे अपने घोषणापत्र में शामिल कर लिया था। हालांकि इस पर अब तक कुछ बात आगे नहीं बढ़ पाई। मध्य प्रदेश की बात करें तो कमीशनरी सिस्टम यहां की पुलिस की पुरानी हसरत है।
पुलिस कमिश्‍नर प्रणाली से आईएएस अफसरों के अधिकार छिनने का खतरा बना रहता है। लेकिन ये भी कहा जाता है कि पुलिस इस प्रणाली के बाद नेताओं और अफसरों के हाथ का खिलौना नहीं रह जाएगी। लोगों का पुलिस पर विश्वास बढ़ेगा। इस सिस्टम को लागू नहीं करने वाले राज्यों का तर्क है कि पुलिस कमिश्नर सिस्टम से पुलिस निरंकुश हो जाएगी।
जानकारों की माने तो इस प्रणाली को प्रभावशाली बनाने के लिए पुलिस बल की संख्या बढ़ाने और काम को बोझ को कम करने की ज़रूरत है। पुलिस के जवानों का वेतन बढ़ाने औऱ उन्हें आधुनिक करने की भी ज़रूरत है। जहां तक पुलिस प्रणाली में सुधार और संशोधित एक्ट को लागू करने की बात है तो अब तक कई राज्यों ने इस पर अमल नहीं किया है। 5 साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने संशोधित पुलिस एक्ट को लागू करने के आदेश भी दिए थे, जिसमें-
1. नए एक्ट के तहत राज्य सुरक्षा आयोग का गठन करना होगा, जो पुलिस के कामकाज की निगरानी करेगा और सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपेगा।
2. आयोग की रिपोर्ट मानने के लिए सरकार बाध्य होगी और उसकी मनमर्ज़ी पर लगाम लगेगी।
3. नए एक्ट में डीजीपी की नियुक्ति वरिष्ठता और सेवा रिकॉर्ड को देखकर की जानी चाहिए। यही प्रक्रिया, आईजी, डीआईजी रेंज के लिए भी होगी।
पुलिस सुधार प्रणाली पर सुप्रीम कोर्ट का पहला आदेश यही था कि पुलिस के कामकाज से राजनैतिक हस्तक्षेप खत्म किया जाए। कोर्ट के आदेश के बावजूद राज्य सरकारों ने एक्ट के कुछ ही बिन्दुओं पर अमल किया। हालांकि राज्य पुलिस कमिश्‍नर प्रणाली को लागू करने के लिए लंबे समय से इंतज़ार में है, लेकिन आईएएस अधिकारियों का तबका ये नहीं होने देना चाहता। उस पर दिल्ली पुलिस की कारस्तानी ने इस पर नए सिरे से बहस छेड़ दी है।
(लेखक ज़ी न्यूज़ उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड के संपादक हैं)



First Published: Thursday, January 10, 2013 - 19:24


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