शर्मिंदगी की इंतहा

Last Updated: Monday, April 9, 2012 - 08:49

संजीव कुमार दुबे

 

रेप और गैंगरेप की घटना इंसानियत को शर्मसार करती है। इस बात से आप इंकार तो हर्गिज नहीं करेंगे। ऐसी खबरे पढने के बाद दुख होता है और मन ही मन आप कहते होंगे ऐसा नहीं होना चाहिए था, यह शर्मनाक है। लेकिन यही घटनाएं जब अबोध मासूमों के साथ हो, बच्चों के साथ घटती हो तो शायद इस प्रकार की घिनौनी वारदातों पर प्रतिक्रिया देने के लिए आपको काफी सोचना होगा। हो सकता है कि इस मसले पर उस दौरान उठ रहा गुस्सा और झुंझलाहट की वजह से आप प्रतिक्रिया दे भी ना पाएं।

 

कुछ ही दिनों पहले इलाहाबाद के राजकीय बाल गृह में रह रही मासूम बच्चियों से बलात्कार की वारदात हमें सोचने को विवश करती है। क्या ऐसे लोगों को आप और हम इंसानों की श्रेणी में रखेंगे। क्या उन्हें इंसान कहलाने और मानव समाज में रहने का हक है।  मासूमों के साथ वह जो दरिंदगी कर रहे है क्या उनकी यह वहशियाना करतूत उन्हें मानव समाज में स्थान देगी।

 

सबसे बड़ी दुखदायक बात यह रही कि यहां तो रक्षक ही भक्षक निकला। जिस शख्स ने इन मासूम बच्चियों से बलात्कार किया वह यहां का चपरासी था। आरोपी विद्याभूषण ओझा बहला-फुसला कर अबोध बच्चियों से शर्मनाक कुकर्म करता रहा। जब मामले का खुलासा हुआ तो कोर्ट हरकत में आई। चपरासी को जेल भेज दिया गया। उसे नौकरी से निलंबित किया गया। जांच की कमेटी बना दी गई और कोर्ट ने जल्द रिपोर्ट सौंपने को कहा।

 

यह मामला उजागर भी नहीं होता। जब एक दंपति ने 6 वर्षीय बच्ची को गोद लिया तो उसने किशोर गृह के अंदर चल रही शर्मनाक करतूत की दास्तां बया की। तब जाकर पता चला कि मासूम बच्चियां ना जाने कितने समय से चपरासी के हवस को झेलने के लिए विवश है।

 

लेकिन सबसे बड़ा सवाल उठता है कि सरकार के अधीन चल रहे बाल गृह में क्या मासूम महफूज है। क्या वह बेखौफ जीवन जी रहे है। असहाय और अनाथ लड़कियों को शरण देने की जिम्मेदारी जहां निभाई जाती है वहां का हाल ऐसा है कि रक्षक ही भक्षक बनकर मासूम बच्चियों से बलात्कार कर रहा है। तो फिर बच्चियों के संरक्षक होने का दावा हम क्यों कर रहे हैं ?  जिन जगहों पर मासूमों की बेहतरी के लिए रखा जाता है वहीं जगह उनके लिए नासूर बन जाए तो इस प्रकार के बाल-गृह का भला क्या मतलब रह जाता है।

 

देश में बच्चों के खिलाफ होनेवाले अपराधों में तेजी से इजाफा होता चला जा रहा है जो बड़ी चिंता का विषय है। बलात्कार जैसे घिनौने अपराध की बात करें तो वर्ष 2009 में बच्चों के खिलाफ 5368 मामले दर्ज किए गए जबकि वर्ष 2010 में यह संख्या बढ़कर 5484 हो गई। बच्चों पर अपराध का दूसरा पहलू अपहरण का है। ना जाने कितने मासूम लापता हो जाते है और उनका पता वर्षों बाद भी नहीं चलता।  वर्ष 2009 में 8945 बच्चों का देश में अपहरण हुआ और 2010 में यह आंकड़ा 10 हजार को पार कर 10670 तक पहुंच गया। शिशुओं की हत्या की वारदातों में कमी आने का नाम नहीं ले रही है। वर्ष 2009 की बात करें तो 63 शिशओं की हत्या करने का मामला सामने आया जबकि 2010 में यह आंकड़ा 100 तक जा पहुंचा। बाल विवाह जैसे अन्य अपराधों का आंकड़ा तो हमें नए सिरे से सोचने के लिए विवश करता है कि हम इक्कीसवीं सदी में आखिर किस ओर जा रहे हैं।

 

बाल विवाह जैसे अन्य अपराधों का आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2009 में ऐसे लगभग 7 हजार मामले दर्ज किए गए जबकि 2010 में यह इस प्रकार के वारदातों की संख्या 7253 रही। बाल अपराधों की श्रेणी में खुदकुशी के लिए उकसाना और वेश्यावृति के लिए खरीदफरोख्त के मामले भी आते है और दुर्भाग्य की बात यह है कि ऐसे मामले ज्यादातर दर्ज तो नहीं होते लेकिन तेजी से बढ़ते चले जा रहे है। बाल-तस्करी से जुड़े गिरोहों का भंडाभोड़ कभी-कभी होता है। गिरोह का सरगना भी पकड़ा जाता है लेकिन इस तरह के रैकेट के भंडाफोड़ से ऐसे मामले में कमी नहीं आती और बच्चों की तस्करी के धंधे का सिलसिला चलता रहता है।

 

इन आंकड़ों को देखकर ऐसा लगता है कि मासूमों के खिलाफ होनेवाले अपराधों में कमी की बात तो करना भी बेमानी है। अब सवाल उठता है कि अनाथालय में फिर इन मासूमों की हिफाजत कौन करे ?  संविधान के कानून तो है जिससे इन अपराधों पर लगाम कुछ हद तक संभव हो पाता है लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि कमजोर और लचर कानूनों की वजह ऐसे अपराध की वजह बनती है। आरोपी बनने के बाद अभियुक्त साबित होने की प्रक्रिया आमतौर पर देश की अदालतों में इतनी लंबी है कि उसके बाद मिलनेवाली सजा का कोई मतलब ना के बराबर होता है। हालांकि यह भी सच है कि देर से ही सही इन अदालतों से ही लोगों को न्याय मिलता है। लेकिन अब जरूरत इस बात की भी है इस तरह के मामलों का निपटारा फॉस्ट ट्रैक कोर्ट में ही होना चाहिए ताकि अपराधी को जल्द-से-जल्द सजा दी जा सके।

 

 

एक बात और भी है कि वीआईपी और खासमखास लोगों को छोड़कर सुरक्षा हर आम लोगों को भला कहां और कैसे मुहैया हो सकती है। मानव जीवन में उसकी नैतिकता ही सही मायने में उसकी पूंजी है। नैतिक पतन के बाद अमुक व्यक्ति में कुछ भी नहीं बचता जिससे वह खुद को इंसान कह सके और इंसानियत की श्रेणी में शुमार कर सकें। वह चपरासी इन मासूम बच्चियों का यौन शोषण करते वक्त शायद यह भूल गया कि उसकी भी ऐसी ही तीन बेटियां है। हवस नैतिकता पर इस कदर हावी हो गई जो एक ऐसे अपराध का कारण बनी जिसके लिए फांसी की सजा भी कम नजर आती है। कानून, प्रशासन अपनी जगह है। लेकिन सवाल अभी भी वही कि इस तरह के घिनौने अपराध के बाद इंसानियत, नैतिकता और मानव मूल्यों को किस तरह परिभाषित किया जाएगा ?



First Published: Monday, April 9, 2012 - 15:02
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