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सियासत की पिच पर सचिन

Sunday, April 29, 2012, 03:26
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राकेश उपाध्याय
 
सचिन तेंदुलकर राज्यसभा के जरिए राजनीति के मैदान में कदम बढ़ा चुके हैं। यूपीए सरकार ने उन्हें विशिष्ट श्रेणी के लिए आरक्षित सीटों के जरिए संसद में मनोनीत कर देश को चौंकाने वाली खबर दी। खबरों के मुताबिक, उन्हें राज्यसभा में भेजे जाने की बुनियाद बीते एक दो महीने पहले ही तैयार की गई थी जिस पर मास्टर ब्लास्टर ने शुरुआती हिचक के बाद आखिरकार हामी भर दी। उम्र के 39 वें पड़ाव और अपने आध्यात्मिक गुरु श्री सत्यसाई की महासमाधि की पहली बरसी पर इससे अच्छी सौगात और क्या हो सकती थी?  इधर प्रधानमंत्री कार्यालय ने उन्हें राज्यसभा में नामित करने की सिफारिश गृहमंत्रालय को भेजी, उधर 10 जनपथ में कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी से मुलाक़ात कर सचिन ने भी सीधा संकेत कर दिया कि वो जिंदगी की अगली पारी के लिए पूरी तरह से तैयार हैं।
 
सचिन उपलब्धियों के जिस मुक़ाम पर पहुंच चुके हैं, जाहिर तौर पर उस कड़ी में राज्यसभा की सदस्यता मिलना कोई बड़ी बात नहीं। हालांकि आलोचकों में नाराजगी इस बात को लेकर है कि जिसे भारत रत्न देकर सियासी चकल्लस से दूर रखा जाना चाहिए था, उसे राज्यसभा नवाज कर कांग्रेस के रणनीतिकारों ने विवाद और अनावश्यक बहस का मुद्दा बना दिया। बेशक, भारत ही नहीं दुनिया भर में अपने बेजोड़, उम्दा खेल की बदौलत सचिन ने न सिर्फ महान ख्याति बटोरी बल्कि दुनियाभर में भारत की प्रतिभा का डंका बजाया। उसमें भी बड़ी बात ये है कि वो देश के एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार में पले बढ़े, क्रिकेट को जीवन का मिशन बनाया, बगैर आगे-पीछे सोचे वो अपनी ईश्वर प्रदत्त प्रतिभा को निखारते निखारते वो असाधारण बन गए। साधारण से असाधारण बनने की उनकी जीवनयात्रा उन करोड़ों लोगों के लिए बेहद दिलचस्प और प्रेरक किंवदंती बन चुकी है, जिन्हें विरासत में धन्य होने का गौरव हासिल नहीं है। लेकिन राज्यसभा की दहलीज लांघते वक्त सचिन को क्या ये मालूम है कि वो आखिर किन लोगों के बीच और क्या करने जा रहे हैं? आखिर ऐसा कौन सा रुतबा है जो उनके पास नहीं है और अब हासिल हो जाएगा।
 
सचिन को राज्यसभा में जाने की जरूरत क्या है, ये सवाल उठना भी लाजिमी है? सचिन के राज्यसभा में जाने का सीधा फायदा आखिर किसे मिलेगा? सियासी नफे-नुक़सान के सौदागरों में खलबली साफ तौर पर दिखने लगी है । खुद सचिन ने इसका मौका मनोनीत होने के पहले 10 जनपथ में हाजिरी लगाकर दे दिया। होना तो ये चाहिए था कि वो विपक्ष के नेताओं के घर भी जाते, लेकिन वो सिर्फ 10 जनपथ गए, जाहिर तौर पर विपक्ष ने मनोनयन पर कहीं कहीं तल्खी दिखाई तो एक वजह ये भी है। सचिन देश के करोड़ों नौजवानों के दिलों पर राज करते हैं, उनके ख्यालों और सोचने के तरीके को प्रभावित करते हैं, लिहाज़ा वो बतौर सांसद क्या बोलेंगे और क्या करेंगे, उस पर सियासी क्रिया-प्रतिक्रिया होना भी तय है। बड़ा सवाल इस बात पर है कि सियासत की मुश्किल पिच पर वो बैटिंग किसके पक्ष में करेंगे। उनकी मेहनत किस पार्टी के स्कोर में उछाल लाएगी? या फिर वो चतुराई से राजनीतिज्ञों की भीड़ में अपनी मोहिनी मुस्कान बिखेरते हुए चुपचाप कार्यकाल पूरा करेंगे, ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर की तर्ज पर सियासी भीड़ में रहते हुए भी सियासत का मोहरा नहीं बनेंगे? मराठी अस्मिता की सियासत करने वाले धुरंधरों से लगायत दक्षिणपंथ की राजनीति के दिग्गज सचिन की नई पारी को किस रुप में आंकते हैं, देखना दिलचस्प होगा।
 
इन सबके बीच बड़ा सवाल ये भी है कि सचिन राज्यसभा में सिर्फ सदन की रौनक ही बढ़ाएंगे या फिर कुछ सार्थक करेंगे भी? बतौर सांसद वो जो भी बोलेंगे, जो भी करेंगे, उसका सुर्खियों में रहना तय है। राजनीतिक तौर पर सचिन वामपंथ और दक्षिणपंथ के बारे में क्या सोच रखते हैं, अभी तक साफ नहीं है। उनकी विचारधारा अभी तक खेल के रोमांच में देशभक्ति के रंग में ही देखी जाती रही है लेकिन दिल से सचिन किस रंग में रंगे हैं, इस पर अभी तक खुद उनकी ओर से कोई बयान नहीं आया है। आर्थिक सुधारों समेत देश की सुरक्षा, विदेश नीति से उनका पाला अब तक नहीं पड़ा है क्योंकि उनकी जिंदगी का हर पल क्रिकेट और सिर्फ क्रिकेट से ही प्रेरित होता रहा है लेकिन उन्हें बतौर सांसद सार्थक भूमिका निभाने के लिए वैचारिक तौर पर स्पष्टता तो रखनी ही पड़ेगी, जाहिर तौर पर देश उनके लिए अहम है लेकिन देश के भविष्य का रास्ता क्या है, उस रास्ते को लेकर सचिन की सोच जानने की हसरत देश तो पालेगा ही क्योंकि सचिन ने अब पैर खेल की दुनिया से ‘ नेतागिरी’ की ओर बढ़ाए हैं। देश की खेल नीति को लेकर वो क्या सुझाव देंगे, इस पर भी लोगों की निगाह जरूर रहेगी, क्योंकि जिस क्रिकेट की बदौलत वो दुनिया भर में छा गए, उसी क्रिकेट पर देश के बाकी खेलों की दुर्गति का आरोप भी लगता रहा है। क्रिकेट को किसी सरकारी खैरात की दरकार नहीं है तो भी, इस सवाल से किसी को इंकार नहीं हो सकता कि क्रिकेट की नियामक संस्थाओं में बदलाव की बड़ी गुंजाइश है जिस पर खिलाड़ियों से ज्यादा कॉरपोरेट और राजनीतिज्ञों का कब्जा बना हुआ है, लेकिन बतौर राज्यसभा सदस्य सचिन इसमें बदलाव लाने की हिम्मत जुटा पाएंगे। सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि खेल को राजनीति और कॉरपोरेट जुगलबंदी से छुड़ाकर हर स्तर पर सही प्रतिभाओं और खिलाड़ियों के लिए रास्ता बनाने की कोशिश आज वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है। लेकिन सच्चाई ये भी है इस ओर उठने वाला कोई भी क़दम बड़े विरोध और विवाद की वजह बन जाता है। उम्मीद है कि सचिन इस ओर कुछ ध्यान देंगे, देश के खेल वातावरण में सुधार की दिशा में सांसद के रुतबे का सही और सार्थक इस्तेमाल करेंगे।
 
सवाल है कि क्या सचिन ऐसा कर पाएंगे? कहीं हम उनसे कुछ ज्यादा ही उम्मीदें तो नहीं लगा रहे? देश की सियासत में अहम बदलाव जब बड़े समर्पित राजनीतिक दलों कांग्रेस, बीजेपी के साथ वामपंथ की बड़ी मौजूदगी के बावजूद नहीं हो पा रहा है तो एक अदद सचिन के सामने उम्मीदों का पहाड़ खड़े कर देना भी गलत है। 750 से ज्यादा सांसदों की भीड़ में सचिन की आवाज़ संसद में क्या गुल खिलाएगी, वो खुद संसद की गैररोमांचक किंतु गंभीर कार्यवाही में कितना रुचि दिखाएंगे, संसद में कलाकारों और खिलाड़ियों से जुड़े पहले के अनुभवों से भी ये सवाल उठ खड़ा हुआ है। खैर, तमाम सवालों से इतर सचिन को देश बधाई दे रहा है क्योंकि एक प्यारा इंसान, सबके दिलों पर राज करने वाला, सांसद जो बन गया है।
 


First Published: Sunday, April 29, 2012, 16:04

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