'अन्ना हजारे, बाबा रामदेव के मुद्दों से सहमत'

Last Updated: Sunday, July 22, 2012 - 21:02

पटना : राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के संस्थापक एवं संरक्षक के एन गोविंदाचार्य ने आज कहा कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के मुद्दों से सहमत हूं, लेकिन उनकी कार्यनीति एवं रणनीति से सहमत नहीं हूं। राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के संस्थापक एवं संरक्षक के एन गोविंदाचार्य ने आज यहां संवाददाताओं से कहा कि वे अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के मुद्दों से सहमत हैं, लेकिन उनकी कार्यनीति एवं रणनीति से सहमत नहीं हैं।
उन्होंने कहा कि जनलोकपाल बनना चाहिए और विदेशों में जमा कालाधन भारत के विकास में लगना चाहिए तथा भ्रष्टाचार एवं कालाधन के विरोध में जारी इन आंदोलन में राष्ट्रीय स्वाभिमान के कार्यकर्ता सहभागी हैं और उनकी कोशिश है कि इन आंदोलनों को बाहर से मजबूती दे सकें।
गोविंदाचार्य ने कहा कि संसदीय समिति में शामिल होने से जनलोकपाल का मामला अटक गया है और इसके लिए आंदोलन का नेतृत्व भी जिम्मेदार है। उन्होंने कहा कि उसी प्रकार विदेशों में जमा कालाधन को लेकर वापस लाने की एक सू़त्रीय मांग पर ही डटे रहना चाहिए।
गोविंदाचार्य ने कहा कि देश का गरीब तबका आंदोलन से कैसे जुड़े कार्यनीति में इन दोनों आंदोलनों के नेतृत्व को ध्यान देना चाहिए कि यह केवल मध्यवर्ग का आंदोलन ही बनकर न रह जाए। उन्होंने कहा कि चाहे वह जन लोकपाल का या फिर कालाधन का मामला हो सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों की नकारात्मक भूमिका रही है और मुद्दे पर गंभीर नहीं रहकर वे दलीय हितों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
गोविंदाचार्य ने कहा कि जिन प्रांतों में विपक्षी दल सत्ता में है, वहां वे इन आंदोलनों को मजबूत नहीं करते और सरकारों को जवाबदेह बनाने के लिए गंभीर कदम नहीं उठाते। जहां ये विपक्ष में रहते हैं, वहां उनके लिए ये मुद्दे महत्वपूर्ण हो जाते हैं और इस दोहरेपन को जनता समझती है, इसलिए साथ देने से कतराती है। उन्होंने कहा कि दलों का यह दोहरा रवैया उनके लिए आत्मघाती है और लोकतंत्र को भी कमजोर कर रहा है। इसलिए देश में आज सत्ता में आने से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है सशक्त जवाबदेह विपक्ष। वर्तमान दौर में सोशल इंजीनियरिंग का महत्व को लेकर पूछे गए एक प्रश्न पर गोविंदाचार्य ने कहा कि इस प्रयोग को तार्किक निष्कर्षों तक पहुंचाया ही नहीं गया।
उन्होंने आरोप लगाया, आज सभी महापुरूषों के वारिस अपने-अपने महापुरूषों को दगा दे चुके हैं। कांग्रेस के लोगों ने गांधी जी को दगा दिया। लोहिया जी के चेलों ने उन्हें धोखा दिया। आज अम्बेडकर अपना माथा पीट रहे होंगे बहुजन समाज पार्टी को देखकर और दीन दयाल अपना सिर खुजला रहे होंगे भाजपा की स्थितियों को देखकर। गोविंदाचार्य ने कहा कि ऐसा विचारधारा से मुक्ति और सत्ता से युक्ति के कारण हुआ। इसलिए राजनीतिक दलों के जनता से कट गए हैं और सत्ता से जुड़ गए हैं, जिस वजह से राजनीति समाज में बदलाव का औजार बनने के बजाए सत्ता के निरंकुश खेल का हिस्सा बन गया है। उन्होंने कहा कि गांधी जी, लोहिया जी, दीन दयाल जी और जय प्रकाश जी सत्ता एवं संपत्ति के विकेंद्रीकरण के हिमायती थे, जो सही सोच है।
गोविंदाचार्य ने कहा कि सत्ता और विपक्ष में नीतियों के स्तर पर भेद खत्म हो गया है और वे विकास के पूंजीवादी माडल से प्रेरित हो गए हैं तथा गरीबों के हक एवं हित की रक्षा करने में असफल हैं। उन्होंने कहा कि हरियाणा में मारूति कारखाने की दुर्घटना इसका सबूत है कि देश अराजकता के कगार पर हैं और इसके लिए विदेशपरस्त और अमीरपरस्त नीतियां अपना रहे सत्तापक्ष एवं विपक्ष दोनों जिम्मेदार हैं।
गोविंदाचार्य ने आरोप लगाया कि लोहिया के विचारों के बजाए उत्तर प्रदेश और बिहार की वर्तमान सरकारें बिल गेट्स को आदर्श मान रही हैं और किसानों से प्ररामर्श के बजाए कारपोरेट को मसीहा मान बैठी हैं।
उन्होंने कहा कि कुपोपषण और बेरोजगारी जैसी समस्याओं से मुकाबले के बजाए ग्लोबल समिट एवं विदेशी पूंजी निवेश को रामबाण मान रही है और विकास के इस छलावा से बेरोजगारी, गैर बराबरी एवं अपसंस्कृति बढेगी।
भाजपा में अपनी वापसी को लेकर पूछे गए एक प्रश्न पर गोविंदाचार्य ने कहा कि उन्होंने किसी शिकवा-शिकयत या उपेक्षा-अपेक्षा के तहत नहीं बल्कि देश के संदर्भ में और बेहतर तरीके तलाशने के लिए अध्ययन अवकाश लिया था और उस निर्णय में किसी बदलाव की जरूरत नहीं महसूस करते। उन्होंने कहा कि भाजपा के उठाव-गिराव के कारण उनका निर्णय नहीं बदलेगा और वे सत्ता और दलीय राजनीति का हिस्सा नहीं बनेंगे। (एजेंसी)



First Published: Sunday, July 22, 2012 - 21:02


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