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दवा परीक्षणों पर SC ने जताई चिंता

Monday, March 26, 2012, 09:00
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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने देश में दवाओं के गैर कानूनी क्लिनिकल परीक्षण पर चिंता जताई है और सरकार से इसे रोकने के लिए कदम उठाने को कहा है।
 
पीठ ने इंडियन सोसायटी फॉर क्लिनिकल रिसर्च को फिलहाल मामले में उन्हें एक पक्ष बनाने से इंकार कर दिया और इसका औचित्य सिद्ध करने को कहा।
 
आईएससीआर की तरफ से पीठ के सामने पेश हुए वकील यू यू ललित का कहना था कि अदालत को इस मामले में उनका पक्ष भी सुनना चाहिए। अदालत ने इस मामले में दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान आईएससीआर का पक्ष फिलहाल सुनने से इंकार करते हुए कहा, ‘लोग मर रहे हैं। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है।’
 
आईएससीआर क्लिनिकल अनुसंधान विशेषज्ञों की संस्था है जो भारत में क्लिनिकल अनुसंधान में लगे लोगों को एक मंच प्रदान करती है। पीठ ने केन्द्र, भारतीय चिकित्सा परिषद से इस मामले में छह सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने को कहा और मामले की अगली सुनवाई की तारीख 13 जुलाई मुकर्रर कर दी।
 
शीर्ष अदालत डाक्टरों के एक समूह द्वारा दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि गरीबों, आदिवासियों और दलितों पर गैर कानूनी तरीके से दवाओं के क्लिनिकल परीक्षण किए जा रहे हैं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा बनाई गई दवाओं के परीक्षण के लिए इन गरीब लोगों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इनमें बहुत से कम उम्र के हैं।
 
याचिका में आरोप लगाया गया है कि दवा बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां देश को अवैध क्लिनिकल परीक्षणों के लिए इस्तेमाल कर रही हैं क्योंकि यहां कानूनों के अनुपालन में ढिलाई बरती जाती है।
 
न्यायालय ने इससे पहले एक गैर सरकारी संगठन द्वारा दाखिल इसी तरह की याचिका पर केन्द्र और चिकित्सा परिषद को नोटिस जारी किया। याचिका दायर करने वालों ने एक विशेषज्ञ समिति गठित करने के संबंध में न्यायालय से निर्देश देने का अनुरोध किया है। इस समिति में समाज के लोग शामिल होंगे और यह भारत और विदेशों में क्लिनिकल परीक्षणों के कानूनी प्रावधानों के अध्ययन के बाद इस मामले में दिशानिर्देश तय करने के संबंध में सिफारिशें देगी।
 
किसी दवा को इनसानों के इस्तेमाल के लिए जारी करने से पूर्व कंपनी को इसके असर के अध्ययन के लिए इसके क्लिनिकल परीक्षण करने होते हैं। इंदौर में अवैध दवा परीक्षणों से जुड़े कई मामलों का जिक्र करते हुए याचिका में कहा गया है कि परीक्षणों के दौरान कई लोगों की जान चली गई।
 
याचिका के अनुसार 3,300 से ज्यादा मरीजों पर दवा के परीक्षण किए गए। इनमें 15 सरकारी डाक्टरों ने भाग लिया। 10 निजी अस्पतालों के करीब 40 डाक्टर इसमें शामिल हुए। मानसिक रूप से बीमार 233 मरीजों का परीक्षण किया गया। एक दिन से 15 वर्ष की आयु के 1,833 बच्चे इस परीक्षण में इस्तेमाल किए गए। परीक्षणों के लिए अकेले सरकारी डाक्टरों को साढ़े पांच करोड़ रुपये दिए गए। इन परीक्षणों से 2008 में 288 मौते हुईं, 2009 में 637 लोग मरे और 2010 में यह आंकड़ा 597 था। (एजेंसी)


First Published: Monday, March 26, 2012, 14:31

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