वीरप्पन के चार साथियों की फांसी पर बुधवार तक रोक

Last Updated: Monday, February 18, 2013 - 19:07

नई दिल्ली :कर्नाटक में बारूदी सुरंग में विस्फोट करके 22 पुलिसकर्मियों की हत्या के जुर्म में मौत की सजा पाए चंदन तस्कर वीरप्पन के चार साथियों को आज उस समय अस्थाई राहत मिल गयी जब उच्चतम न्यायालय ने उन्हें फांसी देने पर रोक लगा दी। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इन चारों मुजरिमों की दया याचिका पिछले सप्ताह ही खारिज कर दी थी।
प्रधान न्यायाधीश अलतमस कबीर, न्यायमूर्ति अनिल आर दवे और न्यायमूर्ति विक्रमजीत सेन की तीन सदस्यीय खंडपीठ इन मुजरिमों की दया याचिका पर फैसला करने में आठ साल के विलंब के आधार पर उनकी याचिका पर विचार करने और मौत की सजा को उम्र कैद में तब्दील करने के अनुरोध पर विचार करने के लिये तैयार हो गयी। न्यायाधीशों ने अपने संक्षिप्त आदेश में कहा, ‘‘इस दौरान चार मुजरिमों की मौत की सजा पर अमल पर रोक लगी रहेगी।
कर्नाटके के पालर मे 1993 में हुये इस कांड के सिलसिले में वीरप्पन के बड़े भाई ज्ञानप्रकश और उसके सहयोगी साइमन, मीसेकर मदैयाह और बिलवेन्द्रन को 2004 में मौत की सजा सुनायी गयी थी। कर्नाटक की बेलगाम जेल में बंद इन चारों मुजरिमों की दया याचिका राष्ट्रपति ने 13 फरवरी को अस्वीकार कर दी थी। मैसूर स्थित टाडा की विशेष अदालत ने 2001 में इन चारों को उम्र कैद की सजा सुनायी थी लेकिन उच्चतम न्यायालय ने इसे बढ़ाकर मौत की सजा कर दिया था। इस गिरोह का सरगना वीरप्पन अक्तूबर 2004 में तमिलनाडु में पुलिस मुठभेड़ में मारा गया था।
इन मुजरिमों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कालिन गोन्सालविज ने न्यायालय से इनकी फांसी की सजा पर रोक लगाने का अनुरोध करते हुये कहा कि दया याचिकाओं के निबटारे में विलंब के सवाल पर पहले से ही कई याचिकाओं पर शीर्ष अदालत का निर्णय प्रतीक्षित है। गोन्सालविज ने बहस के दौरान देवेन्द्रपाल सिंह भुल्लर, और एम एन दास की याचिकाओं का जिक्र किया। इन मुजरिमों ने विलंब के आधार पर मौत की सजा को उम्र कैद में तब्दील करने का अनुरोध करते हुये याचिका दायर कर रखी हैं। इन याचिकाओं पर न्यायालय ने पिछले साल अप्रैल में सुनवाई पूरी की थी। (एजेंसी)





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