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‘नार्वे में बच्‍चा संरक्षण का हल जून तक’

Thursday, March 29, 2012, 08:55
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नई दिल्ली : केंद्र सरकार ने अनिवासी भारतीय माता-पिता के दो बच्चों को लेकर नार्वे में चल रहे विवाद का जून तक कोई हल निकलने की उम्मीद जताई है। विदेश राज्य मंत्री परणीत कौर ने लोकसभा में बुधवार को विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज के ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पर संक्षिप्त चर्चा का जवाब देते हुए यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सरकार इस मुद्दे के त्वरित समाधान के लिए हरसंभव कदम उठा रही है और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी हाल में सोल में नार्वे के प्रधानमंत्री के साथ इस मुद्दे को उठाया है।
 
विदेश राज्य मंत्री ने मुद्दे को बेहद संवेदनशील बताया और कहा कि इसी बात से सरकार की गंभीरता का पता चलता है कि नार्वे के प्रधानमंत्री ने जहां सोल में व्यापार वाणिज्य की बात प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से की तो प्रधानमंत्री सिंह ने उनके समक्ष बच्चों का मुद्दा उठाया। कौर ने बताया कि नार्वे की जिस अदालत को इस मामले के समाधान पर विचार करना था, वह कुछ कारणों से सुनवाई नहीं कर सकी और अब इस मामले की सुनवाई जून में होने की उम्मीद है। उन्होंने बताया कि 23 मार्च 2012 को बच्चों के माता पिता तथा बच्चों के चाचा ने एक करार पर हस्ताक्षर किए जिसे भारतीय दूतावास ने भी प्रमाणित किया। इस करार को बच्चों की देखभाल कर रही नार्वे की बाल कल्याण सेवा को उपलब्ध कराया गया है ताकि वह सुनवाई की तारीख के दिन इसे अदालत में पेश कर सकें।
 
विदेश मंत्री ने उम्मीद जताई कि जून में सुनवाई के बाद संभव है कि बच्चे अपने प्राकृतिक परिवेश में लौट आएं। विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने इससे पूर्व ध्यानाकषर्ण प्रस्ताव के जरिए यह मुद्दा उठाते हुए इसे न केवल बाल अधिकारों और मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया बल्कि इसे भारत के सार्वभौमिक सांस्कृतिक मूल्यों का भी हनन करार दिया। उन्होंने बच्चों के माता-पिता के बीच में तलाक और बच्चों के चाचा द्वारा आवेदन वापस लिए जाने संबंधी तमाम खबरों को दुष्प्रचार बताया और इस मामले में केन्द्र सरकार से कहा कि वह आंखें तरेर कर कड़ाई के साथ नार्वे सरकार से बात करे।
 
सुषमा ने कहा कि 121 करोड़ की आबादी वाला देश 45 लाख की आबादी वाले देश के सामने गिड़गिड़ा रहा है। उन्होंने सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि पिछले दिनों दो इतालवी आकर हमारे दो लोगों को मारकर चले जाते हैं और सरकार कुछ नहीं करती है। विपक्ष की नेता ने बच्चों को 18 साल तक नार्वे में बाल कल्याण सेवा के तहत रखे जाने के संभावित कदम को अस्वीकार्य बताया और कहा कि यह केवल दो बच्चों का सवाल नहीं है बल्कि आज पूरा देश इस मुद्दे को लेकर उद्वेलित है।
 
कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि दो मासूम बच्चे नार्वे की न्यायिक प्रणाली का शिकार हो रहे हैं। उन्होंने सरकार से इस मामले में अब तक की प्रगति के साथ ही यह भी जानना चाहा कि सरकार के राजनयिक प्रयास सफल हो रहे हैं या नहीं। माकपा के रामचंद्र डोम ने इसे बेहद संवेदनशील मुद्दा बताया और सरकार से तुरंत बच्चों को भारत लाने के प्रयास करने की मांग की। उधर इसी पार्टी के पी करूणाकरन ने इसे भारत सरकार के लिए शर्मनाक बताया और कहा कि नार्वे सरकार अपनी मनमानी कर रही है।
 
गौरतलब है कि नार्वे में अनिवासी भारतीय दंपति अनुरूप भट्टाचार्य और सागरिका चक्रवर्ती के दो बच्चे तीन वर्षीय अभिज्ञान और एक वर्षीय एश्वर्या भट्टाचार्य को मई 2011 में नार्वे की शिशु कल्याण सेवा ने माता पिता से अलग करके उन्हें अपनी आपातकालीन देखभाल में ले लिया है।
(एजेंसी)


First Published: Thursday, March 29, 2012, 14:25

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