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यूपी सीएम के 'जनता दर्शन' से बढ़ी मुश्किलें

Sunday, May 06, 2012, 06:21
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लखन: वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में जोरदार जीत हासिल कर दिल्ली की गद्दी पर कब्जा जमाने के मुख्य लक्ष्य को ध्यान में रखकर उत्तर प्रदेश में जनता के बीच सरकार की अच्छी छवि बनाने के इरादे से शुरू किये गये मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के ‘जनता दर्शन’ के कई नकारात्मक पहलू वक्त के साथ और शिद्दत से उभर रहे हैं।
 
पिछली 15 मार्च को प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने वाले अखिलेश यादव ने अपनी पूर्ववर्ती बसपा प्रमुख मायावती द्वारा खत्म की गयी ‘जनता दर्शन’ की परम्परा को पुनर्जीवित करने का ऐलान किया था। इस दौरान दो बार यह कार्यक्रम हुआ भी, मगर अब तक के अनुभव इस कहावत के चरितार्थ होने का संकेत दे रहे हैं- ‘‘मर्ज बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की।’’ सपा द्वारा वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करने की जोर-शोर से तैयारी किये जाने के बीच जनता में पार्टी की छवि सुधारने के लिये शुरू किये गये जनता दर्शन के सिलसिले की पहली कड़ी में ही मुख्यमंत्री आवास पर करीब 20 हजार लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। मुख्यमंत्री के मकान जैसे कड़े सुरक्षा घेरे वाले स्थल पर इस मजमे को नियंत्रित करने के लिये पुलिस को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी।
 
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा कि जनता दर्शन से पुलिस के सामने दोहरी मुसीबत खड़ी हो गयी है। पुलिस अगर मुख्यमंत्री आवास जैसे कड़े सुरक्षा घेरे वाले स्थल पर व्यवस्था बनाए रखने के लिये किसी फरियादी को जबरन रोकती है तो वह व्यक्ति मुख्यमंत्री से शिकायत कर देगा और सम्बन्धित पुलिसकर्मी पर निलम्बन का खतरा मंडराने लगेगा और अगर आवास पर कोई अप्रिय घटना हो जाती है तो उसे नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है।
 
मोटे तौर पर देखें तो मुख्यमंत्री के जनता दर्शन के कई नकारात्मक पहलू हैं। पहला यह, कि इससे जनता में यह संदेश जा रहा है कि जिलों में तैनात अधिकारी बिल्कुल नाकारा हैं और दूसरा यह कि पुलिस के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने और किसी भी फरियादी को शिकायत का मौका भी नहीं देने की कठिन चुनौती पैदा हो गयी है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि मुख्यमंत्री के जनता दर्शन से सपा को भले ही चुनावी फायदा हो लेकिन इससे जिलों में बैठे अधिकारियों के मनोबल पर बुरा असर पड़ रहा है।
 
उन्होंने कहा कि जनता दर्शन में अर्जियों के ढेर से लोगों में यह संदेश जा रहा है कि जिलों में बैठे अधिकारी बिल्कुल नाकारा है। इससे अफसरों के मनोबल पर तो बुरा असर पड़ ही रहा है, साथ ही अधिकारियों पर काम का बोझ भी बढ़ गया है।  (एजेंसी)


First Published: Sunday, May 06, 2012, 11:52

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