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पाकिस्तान में कौन साबित होगा सुप्रीम ?


 
खुशदीप सहगल
 
आजकल एक चुटकुला बड़ा चल रहा है- भारत में सेना प्रमुख की उम्र सरकार तय करती है और पाकिस्तान में सरकार की उम्र वहां के सेना प्रमुख तय करते हैं । पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने 13 फरवरी को प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी के विरुद्ध अदालत की अवमानना के मामले में आरोप तय कर दिए हैं । क्योंकि उन्होंने राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामलों में स्विटज़रलैंड के अधिकारियों को पत्र नहीं लिखा । गिलानी कोर्ट के आदेश का पालन न करने के पीछे लगातार दलील देते आए हैं कि राष्ट्रपति को संविधान के 248 के तहत संरक्षण हासिल है । इसके चलते उन पर देश-विदेश में आपराधिक मामलों में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता ।
 
ताजा घटनाक्रम से चार साल पीछे भी जाएं तो देखा जा सकता है कि गिलानी सरकार और सीनियर जजों के बीच कभी भी संबंध सहज नहीं रह पाए हैं । पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस इफ्तिखार चौधरी भूल नहीं पाए होंगे कि किस तरह ज़रदारी ने राष्ट्रपति बनने के बाद उन्हें पद पर बहाल करने में ना-नकुर की थी। जस्टिस चौधरी को पूर्व सैनिक हुक्मरान परवेज़ मुशर्रफ़ ने बर्ख़ास्त कर दिया था और उसके बाद देश भर में हुए व्यापक विरोध प्रदर्शनों के चलते ही मुशर्रफ़ का नौ साल का शासन समाप्त हुआ था । उस वक्त पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ़ ने जस्टिस चौधरी के समर्थन में लॉन्ग मार्च भी निकाला था ।
 
विवादास्पद मेमोगेट कांड में पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी कारोबारी मंसूर इज़ाज़ ने ज़रदारी के खासमखास समझे जाने वाले पूर्व राजदूत हक्कानी का नाम लेकर गंभीर आरोप लगाए तो सुप्रीम कोर्ट ने जांच के लिए हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिसों का उच्च स्तरीय पैनल गठित करने में देर नहीं लगाई । ये मेमोगेट उस कथित मेमो को लेकर है जो मंसूर इज़ाज़ के मुताबिक पिछले साल अमेरिकी कार्रवाई में अल कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद ज़रदारी ने अमेरिकी सैन्य प्रशासन तक भिजवाया था। आरोप के मुताबिक ज़रदारी हुकूमत की ओर से आशंका जताई गई थी कि सेना प्रमुख जनरल कियानी लोकतांत्रिक सरकार का तख्ता पलट कर सकते हैं । कथित मेमो में अमेरिका से अपने प्रभाव का इस्तेमाल करने की गुज़ारिश भी की गई थी। इस मेमोगेट कांड के बाद से ही पाकिस्तान की सियासत में भूचाल आया हुआ है। जहां सेना प्रमुख कियानी और आईएसआई चीफ शुजा पाशा इस मुद्दे पर सरकार से खुली नाराजगी जता चुके हैं । वहीं विपक्ष के नेताओं में पूर्व क्रिकेटर इमरान ख़ान और नवाज शरीफ़ भी इस मुद्दे पर सरकार की बर्खास्तगी और नए चुनाव की मांग कर चुके हैं।
 
मेमोगेट के अलावा भी ऐसे कई मुद्दे उभरे जिन पर सुप्रीम कोर्ट और सरकार के बीच खींचतान देखी गई ।मगर इस बार लग रहा है कि मामला किसी अंजाम तक जाएगा। ये किसी से छुपा नहीं है कि पाकिस्तान के वजूद में आने के बाद से ही वहां देश को चलाने और विदेश नीतियां बनाने में सेना का काफ़ी दखल रहा है । चुनी हुई सरकारों का शक्तिशाली सेना प्रमुखों ने कई बार तख्ता पलट किया। सुप्रीम कोर्ट भी अक्सर इस तरह के तख्ता पलटों को सही ठहराता रहा है। इसलिए अमूमन कोर्ट को सेना की सहयोगी की तरह ही देखा जाता रहा है ।
 
पाकिस्तान के कई जानकार मानते हैं कि न्यायपालिका और सरकार के बीच संघर्ष का मौजूदा दौर एक तरह से नागरिक और सैनिक शासन के बीच सत्ता संघर्ष का ही नतीजा है जो कि न्यायपालिका के ज़रिए सामने आ रहा है । क्या जनरल कियानी यही मंसूबा बांधे बैठे है कि पहले सरकार का  न्यायिक तख्तापलट हो और फिर वे खुद सामने आकर देश की कमान संभाले या किसी कठपुतली को राजनीतिक नुमाइंदे के तौर पर आगे कर पर्दे के पीछे से कमान संभाले । पाकिस्तान में ये आरोप लगाने वालों की भी कमी नहीं है कि पूर्व क्रिकेटर इमरान ख़ान की रैलियों में जो भीड़ नज़र आ रही है वो आईएसआई का ही कमाल है।
 
दूसरी तरफ, पाकिस्तान सरकार का ज़ोर है कि वह मार्च में प्रस्तावित सीनेट के चुनाव तक सत्ता में बनी रहे । अगर वह तब तक सत्ता में रह गई तो किसी चुनी हुई सरकार को पिछले तीस साल मे पहली बार ऊपरी सदन यानी सीनेट में भी बहुमत मिल जाएगा। इस रास्ते में कोई रुकावट फिलहाल नज़र नहीं आ रही। सुप्रीम कोर्ट किसी भी सूरत में राष्ट्रपति ज़रदारी के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामले फिर से शुरू करना चाहता है । कुछ वकीलों की राय के मुताबिक अगर अप्रैल तक ऐसा नहीं हुआ तो 'लॉ ऑफ़ लिमिटेशन' के ज़रिए ज़रदारी को बड़ी राहत मिल जाएगी। जाहिर है ऐसी सूरत में सरकार इस मामले को किसी न किसी तरह लटकाना ही चाहेगी।
 
अगर गिलानी मुकदमा शुरु होने के बाद अवमानना के दोषी करार दिए जाते हैं तो छह महीने जेल की सज़ा के साथ उन्हें अपनी संसदीय सीट से भी हाथ धोना पड़ सकता है। साथ ही वो प्रधानमंत्री समेत किसी भी सार्वजनिक पद को संभालने के अयोग्य भी करार दिए जा सकते हैं। लेकिन गिलानी के वकीलों का तर्क है कि वो तब तक प्रधानमंत्री बने रह सकते हैं जब तक पाकिस्तान का चुनाव आयोग उन्हें अयोग्य करार नहीं देता। एक सूरत ये भी जताई जा रही है कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से गिलानी को दोषी करार देने के साथ ही राष्ट्रपति ज़रदारी अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए उन्हें माफ़ी दे सकते हैं।
 
सवाल है कि सुप्रीम कोर्ट गिलानी पर स्विस अधिकारियों को चिट्ठी लिखने के लिए इतना ज़ोर क्यों दे रहा है। स्विट्जरलैंड की एक अदालत ने 2003 में ज़रदारी और पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो को नब्बे के दशक से जुड़े मनी लान्ड्रिंग के आरोप में दोषी करार दिया था। दोनों पर कस्टम घोटाले में दो स्विस कंपनियों से घूस लेने के आरोप थे। ज़रदारी और बेनज़ीर की गैर मौजूदगी मे सुनाए गए इस फैसले में पचास हज़ार डालर का जुर्माना भी किया गया था, लेकिन बेनज़ीर भुट्टो के साथ एक समझौते के तहत तत्कालीन राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने 2007 में ज़रदारी, बेनज़ीर समेत आठ हज़ार से ज़्यादा राजनेताओं और नौकरशाहों को आम माफी दे दी थी । साथ ही स्विस अधिकारियों से भी ज़रदारी और बेनज़ीर के खिलाफ मामलों को बंद करने के लिए कहा था।
 
2009 में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने मुशर्रफ़ के आम माफ़ी के आदेश को गैर-संवैधानिक करार देते हुए खारिज कर दिया। साथ ही गिलानी सरकार से मामले फिर से खोलने के लिए कदम उठाने को कहा। लेकिन सरकार तभी से इसे टालती आ रही है।गिलानी सरकार के मुखिया है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट उन्हें ही अदालत के आदेश की अवमानना के ज़िम्मेदार के तौर पर देख रहा है ।
 
सवाल ये भी है कि आखिर गिलानी जेल जाकर खुद को राजनीतिक शहीद​ बनाने पर क्यों तुले हैं। क्या वो पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी में अपना कद ज़रदारी से ऊपर लाने के लिए ये कर रहे है । गिलानी 2008 में प्रधानमंत्री बनने के बाद पाकिस्तान में लोकतांत्रिक सरकार के मुखिया के तौर पर सबसे लंबे कार्यकाल की उपलब्धि हासिल कर चुके हैं। गिलानी और ज़रदारी के संबंध कभी ज़्यादा घनिष्ठ नहीं माने गए हैं। ऐसे में गिलानी का ज़रदारी के लिए खुद को दांव पर लगाना राजनीतिक जानकारों को भी हैरत में डाले हुए है। क्या गिलानी खुद को ज़रदारी की छाया में रहने की जगह अब खुद का कद इतना बढ़ाना चाहते हैं कि पार्टी की कमान पूरी तरह उनके हाथ में आ जाए। गिलानी पाकिस्तान के पंजाब के मुल्तान के रसूखदार परिवार से संबंध रखते हैं ।
 
26 साल की उम्र में राजनीति शुरू करने वाले गिलानी को बेनज़ीर भुट्टो ने नब्बे के दशक में अपने पहले कार्यकाल के दौरान नेशनल असेंबली का स्पीकर बनवाया था। इसी कार्यकाल में पद दुरुपयोग के आरोप के चलते मुशर्रफ़ ने 2001 में गिलानी को जेल में डाल दिया था। पांच साल जेल में रहने के बाद गिलानी 2006 में जेल से रिहा हुए। अगर गिलानी ​फिर जेल जाते हैं तो पहले से ही कमज़ोर लोकतांत्रिक सरकार के लिए तो ये झटका होगा ही पाकिस्तान में अनिश्चितता के माहौल को और बढ़ावा देगा। वो भी ऐसे वक्त में जब पाकिस्तान इस्लामी चरमपंथियों की चुनौती के साथ आर्थिक संकट और बिजली की भारी किल्लत का सामना कर रहा है।
 
मेरा अपना मानना है की पकिस्तान में मेन टू वाच बैरिस्टर ऐतज़ाज़ अहसान हैं ।  वो गिलानी के वकील होने के साथ अच्छी साख भी रखते हैं ।  ज़रदारी ने बेटे बिलावल भुट्टो  के लिए  ऐतज़ाज़ अहसान को ही मेंटर नियुक्त किया है ।  ऐतज़ाज़ को चीफ जस्टिस इफ्तिखार चौधरी का भी करीबी माना जाता है, ऐसे में अगर गिलानी को प्रधानमंत्री की कुर्सी छोडनी पड़ती है तो ऐतज़ाज़ को उनकी जगह लाने  का दांव ज़रदारी खेल सकते हैं ।
(लेखक ज़ी न्‍यूज में सीनियर प्रोड्यूसर हैं)
 
 

First Published: Thursday, February 16, 2012, 18:20

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