कटघरे में 60 साल का 'पंचशील'

By Pravin Kumar | Last Updated: Saturday, June 28, 2014 - 15:22
 
Pravin Kumar  

पंचशील यानी शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पांच सिद्धांत। वर्तमान युग में शांति, सुरक्षा और सहयोग के शक्ति स्तंभ। 28 जून,1954 को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और चीन के प्रथम प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई की बातचीत के बाद दोनों देशों ने जो संयुक्त बयान जारी किया था, उसी से ये पांच सिद्धांत पहली बार चर्चा में आया था। पंचशील के सिद्धांतों की पृष्टभूमि में भारत और चीन के बीच संबंधों के छह दशक पूरे हो गए हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि दोनों देशों के रिश्तों को लेकर ईजाद किया गया पंचशील का सिद्धांत क्या सैद्धातिक या व्यवहारिक किसी भी रूप में सफल हो पाया?

भारत के प्रति चीन की नीति और नीयत पर गौर करें तो 1962 से लेकर अब तक के घटनाक्रम पंचशील के सिद्धांत को ही कटघरे में खड़ा करता है।   दरअसल, इस तरह के सिद्धांतों पर जो समझौते होते हैं वो एकतरफा पालन करने के लिए नहीं होते हैं। ताली एक हाथ से तो बजने से रही और ताली नहीं बजी तो ऐसे एकतरफा संबंधों को क्या कहेंगे। दुर्भाग्य से भारत-चीन के कथित रिश्तों की कहानी कुछ ऐसी ही है। भारत लगातार पंचशील के इन सिद्धांतों का पालन करता रहा है और चीन लगातार इन सिद्धांतों की धज्जियां उड़ाता रहा है। कभी भारत पर हमला तो कभी वास्तविक नियंत्रण रेखा को पार कर भारतीय सीमा में अवैध तरीके से घुसपैठ करना। आज की बात करें तो एक और जहां भारत के उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी एक प्रतिनिधिमंडल के साथ पंचशील की 60वीं वर्षगांठ समारोह में शिरकत करने बीजिंग में हैं तो ठीक इसी समय भारतीय राज्य अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा बताते हुए चीन ने विवादित नक्शा जारी कर दिया है। और खास बात यह कि यह सब पूरे होशो हबाश में होता है।  

पंचशील शब्द ऐतिहासिक बौद्ध अभिलेखों से लिया गया है जो कि बौद्ध भिक्षुओं का व्यवहार निर्धारित करने वाले पांच निषेध होते हैं। तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने वहीं से ये शब्द लिया था। इस समझौते के बारे में 31 दिसंबर 1953 और 29 अप्रैल 1954 को बैठकें हुई थीं जिसके बाद अंततः बीजिंग में इस पर हस्ताक्षर हुए। समझौता मुख्य तौर पर भारत और तिब्बत के व्यापारिक संबंधों पर केंद्रित है, लेकिन इसे याद किया जाता है इसकी प्रस्तावना की वजह से जिसमें पांच सिद्धांत हैं--

1. एक दूसरे की अखंडता और संप्रभुता का सम्मान
2. परस्पर अनाक्रमण
3. एक दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना
4. समान और परस्पर लाभकारी संबंध
5. शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व

इस समझौते के तहत भारत ने तिब्बत को चीन का एक क्षेत्र स्वीकार कर लिया। उस समय इस संधि ने भारत और चीन के संबंधों के तनाव को काफी हद तक दूर कर दिया था। भारत को 1904 की ऐंग्लो तिब्तन संधि के तहत तिब्बत के संबंध में जो अधिकार मिले थे भारत ने वे सारे अधिकार इस संधि के बाद छोड़ दिए। हालांकि बाद में ये भी सवाल उठे कि इसके एवज में भारत ने सीमा संबंधी सारे विवाद निपटा क्यों नहीं लिए। लेकिन इसके पीछे भी भारत की मित्रता की भावना मानी जाती है कि उसने चीन के शांति और मित्रता के वायदे को मान लिया और निश्चिंत हो गया।

पंडित नेहरू ने अप्रैल 1954 में संसद में इस संधि का बचाव करते हुए कहा था, 'ये वहां के मौजूदा हालात को सिर्फ एक पहचान देने जैसा है। ऐतिहासिक और व्यावहारिक कारणों से ये क़दम उठाया गया। हमने क्षेत्र में शांति को सबसे ज़्यादा अहमियत दी और चीन में एक विश्वसनीय दोस्त देखा।' नेहरू की विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा था उनका पंचशील का सिद्धांत जिसमें राष्ट्रीय संप्रभुता बनाए रखना और दूसरे राष्ट्र के मामलों में दखल न देने जैसे पांच महत्वपूर्ण शांति सिद्धांत शामिल थे।

दरअसल भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू चाहते थे कि भारत दोनों महाशक्तियों में से किसी के भी दबाव में न रहे और भारत स्वतंत्र आवाज और पहचान बने। यह महत्वपूर्ण था क्योंकि तब तक दुनिया के बहुत से देशों को भारत की आजादी पर भरोसा नहीं था और वे सोचते थे कि यह कोई ब्रितानी चाल है और भारत पर असली नियंत्रण तो ब्रिटेन का ही रहेगा। नेहरू के बयानों और वक्तव्यों ने उन देशों को विश्वास दिलाया कि भारत वास्तव में स्वतंत्र राष्ट्र है और अंतरराष्ट्रीय मामलों में अपनी एक राय रखता है।

नेहरू की विदेश नीति में दूसरा महत्वपूर्ण बिंदू गुट निरपेक्षता का था। भारत ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह दो महाशक्तियों के बीच झगड़े में नहीं पड़ना चाहता और स्वतंत्र रहना चाहता है। हालांकि इस सिंद्धांत पर नेहरू ने 50 के दशक के शुरुआत में ही अमल शुरू कर दिया था लेकिन 'गुट निरपेक्षता' शब्द उनके राजनीतिक जीवन के बाद के हिस्से में 1961 के करीब सामने आया। यहां तक तो ठीक था। दिक्कत इस बात की थी कि नेहरू की विदेश नीति की कमज़ोरियां यह थी कि एक तो यह नीति सिद्धांतों पर आधारित थी और इसीलिए यह पश्चिमी देशों को बहुत बार जननीतियों के नैतिक प्रचार की तरह लगती थी। इस वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को मित्र देश नहीं मिल रहे थे। कोई भी भारत से सीधी तरह से जुड़ नहीं रहा था।

दूसरी कमज़ोरी यह थी कि सिंद्धातों पर आधारित होने के कारण इस नीति का संबंध राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास के साथ सीधी तरह नहीं जुड़ पाया। इस कारण यह विदेश नीति भारत की जनता के आर्थिक विकास में कोई योगदान नहीं दे सकी। इस समय गुट निरपेक्षता का मसला भी महत्वहीन हो गया है क्योंकि गुट में रहने का विकल्प ही खत्म हो गया है। रणनीति की दृष्टि से भी दुनिया बहुत बदल चुकी है। आज आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में भारत बहुत से ऐसे देशों के साथ खड़ा है जिनका नेहरू के जमाने में आलोचक हुआ करता था।

पंचशील सिद्धांत का विषय है देशों के बीच एक दूसरे की प्रभुसत्ता व प्रादेशिक अखंडता का सम्मान, एक दूसरे का अनाक्रमण, एक दूसरे के घरेलू मामलों में अहस्तक्षेप और आपसी लाभ तथा शांतिपूर्ण सहजीवन। इन सभी विषयों को जोड़कर देखा जाए तो अन्य देशों के इतर भारत-चीन के बीच रिश्ते बेहतर होने की बजाय दूरियां बढ़ी हैं। चीन सीधे तौर पर तो भारत को अक्सर आंख दिखाता ही रहता है, अप्रत्य़क्ष तौर पर मौका पाकर भारत के खिलाफ पाकिस्तान को आर्थिक और सामरिक ताकत देने से भी नहीं चूकता है। देश के नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभालते ही अपनी विदेश नीति को साफ कर दिया है।

हालांकि चीन ने भारत में सत्ता परिवर्तन के साथ ही विदेश नीति को यू-टर्न देते हुए दोस्ती का हाथ बढ़ाया है, मोदी भी चीन से दोस्ती गांठने को इच्छुक हैं लेकिन क्या 60 साल पुराने पंचशील को आधार बनाकर यह संभव है? कतई नहीं। क्योंकि नेहरू-चाऊ का पंचशील का 60 साल का इतिहास सवालों के घेरे में है। जरूरत है एक नए पंचशील की वो भी बाजार आधारित। नेहरू के पंचशील से बीते छह दशकों में भारत ने जितना नुकसान सहा है उसकी भरपाई बाजार की बुनियाद पर एक नए पंचशील सिद्धांत के निर्माण से ही संभव है।

एक्सक्लूसिव

First Published: Saturday, June 28, 2014 - 15:22
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