तो क्या सिर मुंडाते ही ओले पड़े?

अपने कामकाज को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भले ही कहें कि हमारी सरकार को हनीमून मनाने का भी मौका नहीं मिला, लेकिन भाजपा की सेहत और देश के हालात इस बात को बयां करने के लिए काफी हैं कि मोदी सरकार ने हनीमून मनाने में कोई कोताही नहीं बरती और दो महीने बाद भी उसकी खुमारी उतर नहीं रही। तभी तो एक तरफ जहां आलू-प्याज-टमाटर की तिकड़ी मोदी सरकार को आंखें दिखा रही हैं, वहीं अगस्त महीने में बिहार में 10 सीटों पर होने वाले उपचुनाव को लेकर जेडीयू-राजद-कांग्रेस की तिकड़ी भाजपा को डरा रही है। डर स्वभाविक इसलिए है कि इसका ट्रेलर उत्तराखंड में विधानसभा उपचुनाव में दिख चुका है जहां सभी तीन सीटें कांग्रेस ने कब्जा लिए हैं, जबकि भाजपा इन सीटों पर जीत की स्वभाविक दावेदार थी। बिहार के अलावा पंजाब, मध्यप्रदेश और कर्नाटक में भी विधानसभा के उपचुनाव अगस्त में होने हैं।

सिर्फ दो महीने पहले उत्तराखंड में जीत का परचम लहराने वाले नरेंद्र मोदी के लिए यह बुरी और चिंताजनक खबरें है कि उत्तराखंड के तीन विधानसभा उपचुनाव में भाजपा बुरी तरह हार गई है। हार ऐसी कि भाजपा अपनी दो सीटें भी नहीं बचा पाई है। भाजपा के रमेश पोखरियाल निशंक और अजय टम्टा के सांसद बनने से डोईवाला और सोमेश्वर विधानसभा सीट खाली हुई थी। जबकि धारचूला से कांग्रेसी विधायक हरीश धामी ने मुख्यमंत्री हरीश रावत के लिए सीट छोड़ी थी। भाजपा के राष्ट्रीय सचिव त्रिवेन्द्र रावत भी डोईवाला से अपनी सीट नहीं बचा पाए। जबकि धारचूला से मुख्यमंत्री रावत ने भाजपा के बी.डी. जोशी का हराया। रिजर्व सीट सोमेश्वर पर कांग्रेस की रेखा आर्या ने भाजपा के मोहन राम आर्या को मात दी है। तीनों सीटें जीतने से हरीश रावत की सरकार को संजीवनी दी है। अब 70 विधायकों वाली विधानसभा में कांग्रेस के 35 विधायक हो गए हैं। एक एंग्लो इंडियन विधायक के सहारे कांग्रेस अकेले 36 के बहुमत का आंकड़ा पा रही है। वहीं अब भाजपा विधायकों की संख्या घटकर 28 रह गई है। 2012 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के 32 और बीजेपी के 31 विधायक थे। गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव में मोदी का जादू सिर चढ़कर बोल रहा था। दो महीने में यह छू मंतर कैसे हो गया है? ऐसा क्यों हुआ ये मोदी सरकार के लिए मंथन का विषय है।

बिहार में अगस्त महीने की 21 तारीख को विधानसभा की 10 सीटों पर उपचुनाव होने वाले हैं। इस चुनाव में क्या होगा यह कहना बेहद मुश्किल है चूंकि बिहार में लोकसभा चुनाव के बाद नए समीकरण बन गये हैं। नए समझौते के तहत लालू की राजद और नीतीश की जेडीयू 4-4 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे जबकि कांग्रेस 2 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। इस नए महागठबंधन के मुताबिक लालू यादव के धुर विरोधी नीतीश कुमार ने लालू के साथ गलबहियां कर ली हैं। लालू यादव ने सिर्फ नीतीश सरकार को बचाने का काम नहीं किया है बल्कि हाल में दो राज्यसभा सीटों के उपचुनाव में भी नीतीश के उम्मीदवार को जिताने का भी काम किया है। नीतीश लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस के साथ मिलकर भाजपा को कड़ी टक्कर देंगे यानी नीतीश-लालू और कांग्रेस एक साथ मिलकर मोदी को चुनौती देंगे।

भाजपा रणनीतिकारों की कोशिश है कि बिहार में 10 में से हर हाल में 6 सीटें जरूर मिलनी चाहिए। क्योंकि, इन सीटों में कमी हुई, तो इसका राजनीतिक संदेश यही जाएगा कि अब प्रदेश में ‘मोदी का जादू’ उतार पर है। दरअसल, छह सीटों की चुनौती इसलिए हैं, क्योंकि ये सीटें भाजपा विधायकों के इस्तीफे के चलते ही खाली हुई हैं। विधायक रहे भाजपा के ये नेता लोकसभा का चुनाव जीत चुके हैं। जिन सीटों को लेकर भाजपा ज्यादा फोकस्ड है उनमें हाजीपुर, जाले, मोहिउद्दीननगर, छपरा, भागलपुर और नरकटियागंज शामिल हैं। चार अन्य सीटें मोहनिया पर जहां जेडीयू का दावा है वहीं परबत्ता, राजनगर और बांका की सीट आरजेडी से खाली हुई हैं।

उत्तर प्रदेश में एक दर्जन सीटों पर संभवत: आगामी अक्टूबर में विधानसभा उपचुनाव होने हैं। इन्हीं एक दर्जन सीटों में मैनपुरी संसदीय क्षेत्र में भी उपचुनाव होने हैं। यह सीट सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के इस्तीफे से खाली हुई है। उल्लेखनीय है कि सपा प्रमुख ने आजमगढ़ और मैनपुरी दो सीटों से चुनाव जीता था। उन्होंने आजमगढ़ की सीट बरकरार रखी है। जबकि, अपनी ‘घरेलू’ सीट मैनपुरी को खाली किया है। माना जा रहा है कि यह सीट जीतना सपा के लिए काफी आसान है। क्योंकि यहां से मुलायम सिंह लंबे समय से बड़ी जीत हासिल करते रहे हैं। मुलायम का सजातीय वोट बैंक भी यहां बहुत मजबूत है। इस सीट से मुलायम ने अपने दिवंगत भाई रणवीर सिंह के पौत्र को टिकट दिया है। भाजपा के रणनीतिकार यहां इस कोशिश में हैं कि सपा की परिवारवादी राजनीति को मुद्दा बनाकर मैनपुरी में बड़ी चुनौती पेश की जाए।

बहरहाल, उत्तराखंड विधानसभा उपचुनाव में भाजपा की पराजय और आने वाले बिहार, उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में होने वाले उपचुनाव की पृष्टिभूमि में ‘अच्छे दिन’ आने का जुमला मोदी सरकार के लिए दोधारी तलवार बनता दिख रहा है। सरकार के खिलाफ विपक्ष ने इसी ‘अच्छे दिन’वाले जुमले को अपना सबसे कारगर हथियार बनाने की कवायद शुरू कर दी है। बड़ा सवाल यह उठता है कि दो महीने के अल्प अवधि की मोदी सरकार से लोगों का मोहभंग आखिर क्यों हो रहा है। क्या उन्होंने जो चुनाव के पहले वायदे किये था कि अच्छे दिन आने वाले हैं, तो अच्छे दिन नहीं आने की वजह से जनता निराशा हुई है या जनता को ये लगने लगा है कि चुनाव जीतने के लिए नरेंद्र मोदी ने शायद झूठा वायदा किया था।

भाजपा नीत मोदी सरकार की कथनी और करनी में जमीन और आसमान का फर्क दिख रहा है। रेलवे किराया, पेट्रोल की कीमत और आलू-टमाटर-प्याज की कीमत से जनता भाजपा को वोट देकर खुद को ठगा महसूस कर रही है। भाजपा के रणनीतिकारों को उम्मीद थी कि सत्ता में आने के 60 दिनों के बाद ही जरूर कुछ ऐसा दिखने लगेगा ताकि जनता में यह भरोसा होने लगेगा कि मोदी के राज में ‘अच्छे दिन’ जरूर आएंगे लेकिन, मोदी सरकार के कार्यकाल में तो ‘सर मुंडाते ही ओले पड़ने’ वाली कहावत चरित्रार्थ होने लगी है।