लंबी जुदाई पर चली गईं हरदिल अजीज फनकार रेशमा

Last Updated: Monday, November 4, 2013 - 12:39

इस्लामाबाद/लाहौर: अपनी सुरली आवाज से हिंदुस्तान और पाकिस्तान के आवाम के दिलों को छूने वाली मशहूर फनकार रेशमा का रविवार को इंतकाल हो गया। वह गले के कैंसर से पीड़ित थीं। ‘दमा दम मस्त कलंदर’ और ‘लंबी जुदाई’ जैसे गीतों को अपनी रेशमी आवाज से यादगार बनाने वाली रेशमा का जन्म राजस्थान के बीकानेर में 1947 में एक बंजारा परिवार में हुआ था। कैंसर का पता चलने के बाद उनका कई साल से इलाज चल रहा था और वह बीते करीब एक माह से कोमा में थीं। उनके परिवार में उनके पुत्र उमैर और पुत्री खदीजा हैं।
रेशमा का जिस अस्पताल में इलाज चल रहा था उसके चिकित्सक रहीम ने कहा, वह गत एक महीने से कोमा में थीं और उन्हें कैंसर होने का पता कुछ वर्ष पहले चला था। पाकिस्तानी गायक तैमुर रहमान ने कहा, इस तरह के फनकार अपने आप में संस्थान की तरह होते हैं और उनके जाने के साथ ही एक पूरे युग का अंत हो गया है। यह बहुत बड़ी क्षति है।
रेशमा का कबीला विभाजन के कुछ ही समय बाद कराची चला गया था। उन्होंने एक समय कहा था कि मेरे लिए सीमा के कोई मायने नहीं हैं क्योंकि कलाकार सभी के होते हैं। उन्होंने भारत में अपने मूल को याद करते हुए कहा था, भारत में लोग मेरी काफी प्रशंसा करते हैं। पाकिस्तान में लोगों ने मुझे सम्मान दिया लेकिन भारत में भी लोग मुझे प्यार से सुनते हैं। यह उनके लिए मायने नहीं रखता कि मैं एक पाकिस्तानी गायिका हूं।
रेशमा ने संगीत की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली थी और वह दरगाह पर गाती थीं। ऐसे ही, शहबाज कलंदर की दरगाह पर 12 साल की नन्हीं रेशमा को गाते सुन कर एक टीवी एवं रेडियो प्रोड्यूसर ने पाकिस्तान के सरकारी रेडियो पर चर्चित गीत ‘लाल मेरी’ रेशमा से गवाने की व्यवस्था की। यह गीत बेहद लोकप्रिय हुआ और रेशमा पाकिस्तान के लोकप्रिय लोक गायकों में शामिल हो गईं। 1960 के दशक में रेशमा का जादू सिर चढ़कर बोल रहा था और उन्होंने पाकिस्तानी तथा भारतीय फिल्म उद्योग में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।
पाकिस्तानी बैंड ‘लाल’ के प्रमुख गायक शहराम अजहर ने बताया, वह अपने आप में एक संस्थान थीं और उनकी जैसी गायिका के जाने का मतलब एक युग का अवसान है। उनका जाना संगीत जगत की बहुत बड़ी क्षति है। हाय ओ रब्बा नहीं लगदा दिल मेरा और अंखियां नू रहने दे अंखियों दे कोल कोल जैसे गीत रेशमा की रेशमी आवाज में सज कर मानो खुद पर इठलाते थे। उनकी आवाज में अलग ही तरह की कशिश थी जो उनको सबसे अलग पहचान देती थी।
पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने उन्हें ‘सितारा ए इम्तियाज’ और ‘लीजेंड्स ऑफ पाकिस्तान’ सम्मान प्रदान किया था। उन्हें और भी कई राष्ट्रीय सम्मान मिले थे। भारत और पाकिस्तान के कलाकारों को जब 1980 के दशक में एक दूसरे के यहां अपनी प्रस्तुति देने की अनुमति मिली, रेशमा ने भारत में लाइव परफार्मेन्स दिया था।फिल्म निर्माता सुभाष घई ने उनकी आवाज को अपनी फिल्म ‘हीरो’ में इस्तेमाल किया था और वह गीत ‘लंबी जुदाई’ था जिसे आज भी श्रोता पसंद करते हैं। उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलने के लिए बुलाया गया था।
एक दौर ऐसा भी आया जब रेशमा आर्थिक परेशानियों में घिर गईं। तब पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति और संगीत प्रेमी परवेज मुशर्रफ ने उन्हें दस लाख रूपये दिए ताकि वह अपना रिण चुका सकें। बाद में मुशर्रफ ने रेशमा के लिए प्रति माह 10,000 रूपये की सहायता भी निर्धारित कर दी। रेशमा को जब 6 अप्रैल 2013 को लाहौर के डॉक्टर्स हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था तो नजम सेठी की अगुवाई वाली तत्कालीन कार्यवाहक सरकार ने उनके चिकित्सकीय खर्च का भुगतान करने का फैसला किया था।
रेशमा ने कहा था, मैं अमेरिका, कनाडा सहित कई देशों में गई। उसके बाद मैं भारत गई जहां लोगों ने मुझे काफी सम्मान दिया। भारतीय और पाकिस्तानी संगीत जगत ने लोकप्रिय गायिका रेशमा के निधन पर आज शोक जताते हुए उन्हें कई के लिए प्रेरणा बताते हुए कहा कि उनकी आवाज मदहोश कर देने वाली थी। पाकिस्तानी बैंड जुनून के पूर्व गिटार वादक सलमान अहमद ने लिखा, मदहोश करने वाली आवाज अब इस धरती पर नहीं रही, हायो रब्बा। हिंदी सिनेमा के संगीतकार विशाल डडलानी ने ट्विटर पर लिखा, रेशमा का निधन दुखद है। (एजेंसी)



First Published: Monday, November 4, 2013 - 12:36


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